Explainer: क्या आपने दुनिया को गलत नक्शे में देखा! 500 साल पुराने Map पर अब घमासान, क्या 'एटलस' में बदलाव को मिलेगी UN की मंजूरी?
संयुक्त राष्ट्र महासभा में दुनिया के पारंपरिक नक्शे यानी मर्केटर के मानचित्र को बदलने के लिए लाए गए- 'करेक्ट द मैप' प्रस्ताव को अमेरिका के विरोध के बावजूद भारी बहुमत से पास कर दिया है. एटलस वाले नक्शे में क्या खामिया थीं, इस अभियान की अगुवाई किसने की और नए नक्शे से क्या फायदा होगा, आइए जानते हैं.
'कैसे आकाश में सुराख नहीं हो सकता, एक पत्थर तो तबीयत से उछालो यारों.' पश्चिमी अफ्रीकी देश टोगो ने मशहूर कवि दुष्यंत कुमार की इन पंक्तियों को चरितार्थ कर दिखाया है. सबसे बड़ी वैश्विक 'पंचायत' संयुक्त राष्ट्र महासभा (यूएनजीसी) ने दुनिया का नक्शा देखने के हमारे सदियों पुराने नजरिए को बदलने की दिशा में एक अहम कदम उठा लिया है. यानी दुनिया का नक्शा अब बदलने जा रहा है.
पश्चिम अफ्रीकी देश टोगो का लक्ष्य था कि इसी साल के आखिर यानी 31 दिसंबर, 2026 तक स्कूलों में 'इक्वल अर्थ' मैप का इस्तेमाल शुरू हो जाए. कुछ देश यूएन में हुई वोटिंग से अनुपस्थित रहे. यह प्रस्ताव भारत, फ्रांस और ब्रिटेन समेत 164 देशों के समर्थन से पास हुआ. अमेरिका एकमात्र ऐसा देश था जिसने धरती का नक्शा बदलने के खिलाफ वोट दिया.
टोगो की अगुवाई वाले प्रस्ताव में क्या था?
कार्टोग्राफर जेरार्डस मर्केटर ने सबसे पहले दुनियाभर के मानचित्रों के संग्रह को 'एटलस' नाम दिया था. यूएनजीसी ने अब उस प्रस्ताव को मंजूरी दी, जिसमें 16वीं सदी से इस्तेमाल हो रहे कार्टोग्राफर मर्केटर मैप की जगह ऐसा नक्शा अपनाने की पैरवी की गई थी, जिसमें देशों और महाद्वीपों का आकार वास्तविकता के ज्यादा करीब नजर आए. टोगो ने अफ्रीकी संघ की उस मुहिम को आगे बढ़ाया है, जिसका मकसद स्कूलों और दूसरी जगहों पर मर्केटर मैप के इस्तेमाल को कम करना है.
अपने देश की बात करें तो मर्केटर मैपिंग में भारत के क्षेत्रफल यानी एरिया को कम दिखाया गया था, जबकि इक्वल अर्थ मानचित्र में भारत का एरिया थोड़ा बड़ा है. वहीं मर्केटर स्केल में भारत अलास्का से भी छोटा दिखता है. जबकि अलास्का, भारत से छोटा है.
नक्शा पहले कैसा था और प्रस्तावित नक्शा कैसा होगा?
टोगो के विदेश मंत्री रॉबर्ट डुसे ने वोटिंग ने रॉयटर्स को दिए एक इंटरव्यू में एक नए एंगल पर दुनिया का ध्यान दिलाते हुए कहा- 'एक निष्पक्ष दुनिया की शुरुआत एक निष्पक्ष नक्शे से होती है.'टोगो का कहना है कि नक्शा सिर्फ भूगोल दिखाने का माध्यम नहीं है. सदियों से इस्तेमाल होने वाले नक्शे दुनिया के बारे में हमारी सोच को भी प्रभावित करते हैं.'
1569 में बना मर्केटर का नक्शा प्रोजेक्शन एंगल और दिशाओं को संरक्षित रखता है. सभी मानचित्र एक जैसे नहीं होते. जिस तरह से हम गोलाकार पृथ्वी को एक सपाट सतह पर प्रोजेक्ट करते हैं, उससे दुनिया को देखने का हमारा नजरिया बदल जाता है. यानी टोगो की मांग ये सिर्फ सौंदर्यशास्त्र से संबंधित नहीं, बल्कि देशों के आकार, उनकी गरिमा और संबंधित क्षेत्रों की धारणा और हमारे मानचित्र (MAP) की सटीकता को भी प्रभावित करती है.
मैप प्रोजेक्शन और मर्केटर मैप में गड़बड़ी
मैप प्रोजेक्शन, धरती की टू-डायमेंशनल और थ्री-डायमेंशनल यानी त्रि-आयामी संरचना को समतल सतह पर दर्शाने का तरीका है.
पृथ्वी गोल है, इसलिए मर्केटर के नक्शों का हर प्रोजेक्शन कुछ न कुछ विकृति उत्पन्न करता है.
यानी मैप प्रोजेक्शन दरअसल गोल पृथ्वी को सपाट कागज या स्क्रीन पर दिखाने का तरीका है. लेकिन ऐसा करते ही आकार, दूरी या दिशा में कुछ न कुछ बदलाव आ जाता है.
जिस विश्व मानचित्र (एटलस) को हम अपने स्कूलों की किताबों में देखते आए हैं, वह मर्केटर प्रोजेक्शन अनुमान पर आधारित है. 16वीं सदी में बने इन नक्शे में जैसे-जैसे कोई भूभाग भूमध्य रेखा से दूर और ध्रुवों के करीब जाता है, उसका आकार नक्शे पर जरूरत से ज्यादा बड़ा दिखाई देने लगता है.
इसका सबसे चर्चित उदाहरण अफ्रीका और ग्रीनलैंड हैं. एटलस वाले नक्शे में दोनों लगभग बराबर आकार के दिख सकते हैं, जबकि वास्तविकता में अफ्रीका ग्रीनलैंड से करीब 14 गुना बड़ा है. यही वजह है कि अफ्रीकी देश लंबे समय से ऐसे विश्व मानचित्र की मांग कर रहे हैं, जो महाद्वीपों के वास्तविक आकार को ज्यादा सही ढंग से दिखाए.
चौंकाने वाले तथ्य
- ध्रुवों के पास के क्षेत्रों का कृत्रिम रूप से बड़ा दिखना.
- ब्राजील का आकार लोगों की सोच से कहीं अधिक है.
- न्यूजीलैंड के नक्शे का अक्सर गायब हो जाना.
दुनिया के कई बड़े नक्शों जैसे - IKEA स्टोर्स, BBC और यहां तक कि UN के डिजिटल दस्तावेजों में भौगोलिक स्थिति के कारण अक्सर न्यूजीलैंड का नक्शा गायब कर दिया जाता था. 2018 में न्यूजीलैंड की तत्कालीन प्रधानमंत्री जसिंदा अर्डेन ने इस विषय पर एक बेहद मजेदार कैंपेन चलाते हुए वीडियो पोस्ट करते हुए एक बेहद मजाकिया कॉन्सपिरेसी थ्योरी देते हुए कहा था कि ऑस्ट्रेलिया उनके पर्यटक चुराना चाहता है और इंग्लैंड अपनी रग्बी टीम 'ऑल ब्लैक' से डरकर न्यूजीलैंड को गायब कर रहा है.
इस मजाक को आगे बढ़ाते हुए न्यूज़ीलैंड सरकार ने अपनी आधिकारिक वेबसाइट के '404 एरर - पेज नॉट फाउंड' पर एक ऐसा दुनिया का नक्शा लगाया जिसमें से जानबूझकर न्यूज़ीलैंड गायब था और नीचे लिखा था— 'कुछ गायब है...'(Something's missing...)
यानी मर्केटर का प्रोजेक्शन समुद्री रास्तों के जरिए दुनिया का भ्रमण करने, व्यापार के लिए दुनिया घूमने और नई खोज करने के लिहाज से तो बढ़िया था, लेकिन पैमाने यानी आकार नापने के हिसाब से एकदम खराब था. क्योंकि भूमध्य रेखा से जितनी दूर जाते हैं, यह भूभागों के आकार को बुरी तरह से विकृत कर देता है. अपनी खामियों के बावजूद, कई डिजिटल मानचित्रों में मर्कैटर डिफ़ॉल्ट रूप से उपयोग किया जाता है.
कौन सा नक्शा आएगा?
UN के प्रस्ताव में Equal Earth projection को बढ़ावा देने की बात कही गई है. इस प्रोजेक्शन में महाद्वीपों के आकार को मर्केटर मैप की तुलना में ज्यादा वास्तविक रूप में दिखाया जाता है.
हालांकि इसका मतलब यह नहीं है कि अब पूरी दुनिया के नक्शे तुरंत बदल जाएंगे.
हालांकि, यूएन का प्रस्ताव कानूनी रूप से बाध्यकारी नहीं है. साथ ही, इसमें यह भी स्पष्ट किया गया है कि समुद्री और हवाई नेविगेशन में मर्केटर प्रोजेक्शन का इस्तेमाल जारी रह सकता है, क्योंकि वहां ये अभी भी उपयोगी है.
इस बदलाव के बाद यूरोप और उत्तरी अमेरिका पहले से छोटे और अफ्रीका बड़ा दिखाई देगा. नए नक्शे पर भारत का साइज भी अब दूसरे देशों के मुकाबले ज्यादा साफ नजर आएगा.
स्कूलों में सबसे पहले बदलेगा नक्शा
टोगो अब दूसरे देशों की सरकारों, स्कूलों, अंतरराष्ट्रीय संगठनों और टेक्नोलॉजी कंपनियों से भी पुराने मर्केटर मैप से आगे बढ़ने की अपील करेगा.
आने वाले छह महीनों में टोगो अफ्रीकी संघ के सदस्य देशों और दूसरे क्षेत्रों के समर्थक देशों के साथ इस दिशा में आगे की रणनीति पर चर्चा करेगा.
Google Maps और GPS तक पहुंचेगी बहस
अफ्रीकी देशों की नजर सिर्फ स्कूलों पर नहीं है. उसका मानना है कि नक्शों में बदलाव की यह बहस मैपिंग, GPS और दूसरी लोकेशन आधारित तकनीकों से जुड़ी कंपनियों तक भी पहुंचनी चाहिए. अमेरिका ने इस प्रस्ताव का विरोध किया है और टेक सेक्टर में अमेरिका का वर्चस्व है, ऐसे में ये देखना होगा कि अमेरिकी कंपनियां नए बदलाव को कैसे अपने सिस्टम में उतारेंगी.
गूगल और एप्पल जैसी बड़ी इंटरनेशनल कंपनियां भी अपने प्लेटफॉर्म पर डिजिटल वर्ल्ड मैप में बदलाव कर सकती हैं.
हालांकि नासा और नेशनल ज्योग्राफिक जैसी संस्था पहले से ही इक्वल अर्थ प्रोजेक्शन की आधार पर काम कर रही है.
यानी आने वाले समय में सवाल सिर्फ यह नहीं होगा कि स्कूल की किताब में दुनिया कैसी दिखती है, बल्कि यह भी होगा कि डिजिटल दुनिया में हम दुनिया को किस नक्शे के जरिए देखते हैं.
'दुनिया बदल रही है'
अफ्रीकी देशों का ये अभियान को औपनिवेशिक दौर की विरासत से जोड़ता है, लेकिन उसका कहना है कि यह यूरोप या किसी दूसरी सभ्यता के खिलाफ अभियान नहीं है. उसका तर्क है कि मर्केटर मैप का दुनिया भर में इतना व्यापक इस्तेमाल ऐतिहासिक रूप से उपनिवेशवाद के दौर से जुड़ा रहा है. अफ्रीकी देशों की चाहत है कि दुनिया को देखने का तरीका तो बदल चुका है अब दुनिया को दिखाने का तरीका भी बदलना चाहिए. अपने मन की इस बात को टोगो के विदेश मंत्री ने बड़े कमाल की बात कही- 'दुनिया बदल रही है, अफ्रीका भी बदल रहा है.'