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NRI Foreign Currency Inflows: भारतीय बैंकिंग सिस्टम में इस समय भरपूर नकदी है. इसका कारण आरबीआई (RBI) की तरफ से पिछले दिनों शुरू की गई डॉलर स्वैप स्कीम (dollar swap scheme) है. इस स्कीम को रिजर्व बैंक ने विदेशी मुद्रा भंडार को मजबूत करने के लिये शुरू किया था. रिजर्व बैंक की इस स्कीम का ही असर है कि बैंकों में विदेशी करेंसी जमकर आ रही है और देश का फॉरेक्स रिजर्व अब तक के रिकॉर्ड लेवल 740 अरब डॉलर के पार पहुंच गया. इससे बैंकों में नकदी का फ्लो बढ़ गया है और अब इसे संभालने के लिए आरबीआई (RBI) को आगे आना पड़ रहा है. एनआरआई (NRI) डिपॉजिट और डॉलर इनफ्लो के कारण बैंकों के पास रिकॉर्ड नकदी जमा हो गई है.
बैंकों के पास आ रहे नकदी को कंट्रोल करने और महंगाई को काबू में रखने के लिए आरबीआई (RBI) 7 सितंबर से 7 लाख करोड़ की अतिरिक्त नकदी को 30 दिन के लिए सिस्टम से बाहर निकालने का प्रोसेस शुरू करने जा रहा है. ब्लूमबर्ग इकोनॉमिक्स के अनुमान के अनुसार बैंकों के पास करीब 10.5 लाख करोड़ रुपये का एक्स्ट्रा कैश पड़ा है. इतने बड़े पैमाने पर नकदी जमा होने का कारण एनआरआई (NRI) से मिलने वाला भारी विदेशी मुद्रा डिपॉजिट है.
आरबीआई की योजना के तहत एनआरआई जमा से रिकॉर्ड 127 अरब डॉलर की रकम आई है. दूसरे विदेशी कर्जों को मिलाकर सिस्टम में 136.4 अरब डॉलर की नकदी आई है. इस लिक्विडिटी को कंट्रोल करने के लिए आरबीआई (RBI) 7 सितंबर को 30 दिन की वेरिएबल रेट रिवर्स रेपो (VRRR) नीलामी आयोजित कर रहा है. इसके जरिये बैंकिंग सिस्टम से ₹7 लाख करोड़ (करीब 74.1 अरब डॉलर) के फ्लो को
सेंट्रल बैंक कम करेगा. इससे पहले आरबीआई आमतौर पर 15 दिन के लिए ऐसी नीलामी करता था. लेकिन इस बार आरबीआई (RBI) की मंशा 30 दिन के लिये बाजार से अतिरिक्त नकदी को बाहर रखने की है.
सिस्टम में नकदी बढ़ने का असर मनी मार्केट पर दिखने लगा है. बैंकों के बीच आपस में रातोंरात लोन लेनदेन की दर यानी वेटेड एवरेज कॉल रेट आरबीआई (RBI) के तय पॉलिसी रेट से नीचे आ गई है. बाजार में सस्ते और अत्यधिक कैश की उपलब्धता से रिजर्व बैंक की मौद्रिक नीति का असर कमजोर होने का खतरा रहता है. इसके साथ ही इससे महंगाई बढ़ने की आशंका भी बनी रहती है. ऐसे में आरबीआई (RBI) के लिए इस एक्स्ट्रा कैश को बिना किसी उथल-पुथल के पैसे को वापस खींचना जरूरी हो गया है.
बाजार में जब-जब नकदी बढ़ती है तो महंगाई दर में भी उछाल देखा जाता है. सरप्लस लिक्विडिटी (Surplus Liquidity) से महंगाई बढ़ने का मुख्य कारण इकोनॉमिक्स का बेसिक नियम है. इसे आप इस तरह समझ सकते हैं जब बैंकों के पास भरपूर लिक्विडिटी होती है तो वे आसानी से और सस्ते में लोन बांटते हैं. इससे आम जनता और कंपनियों के हाथ में खर्च करने के लिए ज्यादा पैसा आ जाता है. जेब में पैसा बढ़ने पर लोग घर, गाड़ियां, मोबाइल, कपड़े, रेस्टोरेंट में खाना और आउटिंग पर ज्यादा खर्च करने लगते हैं. इसका असर यह होता है कि महंगाई बढ़ने लगती है.
VRRR यानी वेरिएबल रेट रिवर्स रेपो नीलामी, भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) का ऐसा जरिया है, जिसके माध्यम से आरबीआई कमर्शियल बैंकों के पास पड़े अतिरिक्त पैसों (नकदी) को कुछ समय के लिए अपने पास जमा कर लेता है. इससे बाजार में पैसों और ब्याज दर को बैलेंस करने में मदद मिलती है. इसे आप स्पंज (Sponge) के उदाहरण से समझ सकते हैं. जैसे स्पंज फर्श पर फैले एक्स्ट्रा पानी को सोख लेता है, ठीक उसी तरह RBI भी VRRR के जरिये बैंकों के पास जमा अतिरिक्त पैसों को 30 दिन के लिए सोखकर (Lock करके) अपने पास रख लेता है.
आरबीआई (RBI) को VRRR की जरूरत बैंकिंग सिस्टम से सरप्लस लिक्विडिटी (अतिरिक्त पैसा) को बैलेंस करने और महंगाई को स्थिर रखने के लिए पड़ती है. आरबीआई की तरफ से चलाई गई स्पेशल डिपॉजिट फैसिलिटी के तहत करीब 136.4 अरब डॉलर आए. इसमें से 127 अरब डॉलर केवल FCNR-B के जरिये आए. जब RBI ने इन डॉलर को खरीदा और बैंकों को बदले में रुपये दिये तो बैंकिंग सिस्टम में लाखों करोड़ रुपये की नई नकदी पहुंच गई. रिपोर्ट के अनुसार बैंकों के पास करीब 10.5 लाख करोड़ रुपये का सरप्लस कैश पड़ा है. इतना ज्यादा सरप्लस कैश होने से बैंकिंग सिस्टम का बैलेंस बिगड़ने का खतरा है.
रिवर्स रेपो रेट (Reverse Repo Rate) के तहत जब बैंक अपने पास रखे अतिरिक्त पैसे को आरबीआई (RBI) के पास जमा करते हैं तो आरबीआई उन्हें इस पैसे पर ब्याज देता है. वेरिएबल रेट नीलामी (Auction) में ब्याज की दर पहले से फिक्स नहीं होती. इसके लिए आरबीआई (RBI) नीलामी का आयोजन करता है, जिसमें बैंक बोली लगाते हैं कि वे किस ब्याज दर पर अपना पैसा आरबीआई (RBI) के पास रखने को तैयार हैं. आमतौर पर RBI इस पैसे को 7 या 14 दिन के लिए अपने पास रखता है. लेकिन जब बैंकों में बहुत ज्यादा पैसा आ जाता है तो RBI इसे 30 दिन के लिए लॉक कर देता है.
RBI का स्टैंडर्ड स्ट्रक्चर 14 दिन के VRRR का है. लेकिन जब बैंकिंग सिस्टम में नकदी ज्यादा जमा हो जाती है तो आरबीआई लंबी अवधि की नीलामी का सहारा लेता है. 2021 में COVID-19 महामारी के दौरान दिए गए प्रोत्साहन पैकेज के कारण सिस्टम में 8–9 लाख करोड़ रुपये की भारी नकदी हो गई थी. उस समय रिजर्व बैंक ने सिस्टेमेटिक तरीके से नकदी को कंट्रोल करने के लिए 14 दिन के साथ ही 28 दिन की VRRR नीलामियां शुरू की थीं. साल 2022 में भी आरबीआई ने 28 दिन का VRRR लागू किया था. अब 7 सितंबर से आरबीआई की तरफ से 30 दिन का VRRR लागू करने की तैयारी की जा रही है. यह अब तक का सबसे लंबा VRRR होने का अनुमान है.
रिजर्व बैंक (RBI) 30 दिन से ज्यादा लंबी अवधि के लिए वेरिएबल रेट रिवर्स रेपो (VRRR) की नीलामी इसलिए नहीं करता, क्योंकि VRRR का मकसद शॉर्ट टर्म (short-term) में कैश को मैनेज करना है. यदि RBI 30 दिन से ज्यादा मसलन 60, 90 या 180 दिन के लिए बैंकों का पैसा लॉक करेगा तो इससे बैंकिंग सिस्टम और फाइनेंशियल मार्केट में कई तरह की समस्याएं बन सकती हैं.
विदेशी मुद्रा इनफ्लो ने देश की बाहरी फाइनेंशियल सिचुएशन को मजबूत किया है. हालांकि, अब यह अतिरिक्त रुपया लिक्विडिटी मैनेजमेंट के लिए बड़ी चुनौती बन गया है. VRRR के तहत बैंक अपनी इच्छा से पैसा RBI के पास रखते हैं. ऐसे में यदि बैंकों ने पूरा फंड जमा नहीं किया तो आरबीआई (RBI) को और भी सख्त कदम उठाने पड़ सकते हैं. इन कदम को उठाने के पीछे आरबीआई का मकसद बाजार में स्थिरता बनाए रखना और महंगाई पर लगाम लगाना है.