अमेरिका या सऊदी अरब? तेल का सबसे बड़ा खरीदार और विक्रेता कौन; आंकड़े कर देंगे हैरान!
दुनिया में कच्चे तेल का सबसे बड़ा खरीदार और विक्रेता कौन है? अमेरिका, सऊदी अरब और पश्चिमी देशों उत्पादन, भंडार व आयात-निर्यात के आधिकारिक आंकड़े यहां देखें.
कच्चा तेल आज की ग्लोबल इकॉनमी की सबसे अहम जरूरतों में शामिल है. गाड़ियां चलाने से लेकर फैक्ट्रियों तक, पेट्रोकेमिकल इंडस्ट्री से लेकर रोजमर्रा की जरूरतों तक, तेल की भूमिका हर जगह दिखाई देती है. लेकिन तेल की दुनिया का एक दिलचस्प पहलू यह है कि जो देश सबसे ज्यादा तेल निकालता है, जरूरी नहीं कि वही सबसे ज्यादा तेल दूसरे देशों को बेचता भी हो. मिसाल के तौर पर अमेरिका को ही देख लीजिए. अमेरिका दुनिया का सबसे बड़ा कच्चा तेल उत्पादक है और सबसे बड़ा तेल उपभोक्ता भी. वहीं सऊदी अरब और रूस जैसे देश अपनी घरेलू जरूरतों से कहीं ज्यादा तेल का उत्पादन करते हैं, इसलिए अंतरराष्ट्रीय बाजार में उनकी भूमिका एक बड़े सप्लायर की होती है.
दुनिया में कच्चे तेल के उत्पादन की बात करें तो अमेरिका फिलहाल सबसे ऊपर है. वैश्विक उत्पादन में उसकी हिस्सेदारी करीब 21 से 22 फीसदी के आसपास है. अमेरिका में रोजाना 13.5 मिलियन बैरल से ज्यादा कच्चे तेल का उत्पादन होता है. अमेरिका की इस ताकत के पीछे कई वजहें हैं. देश में शेल ऑयल का बड़े पैमाने पर उत्पादन होता है. इसके अलावा आधुनिक ड्रिलिंग और एक्सट्रैक्शन तकनीक के साथ-साथ मजबूत ऊर्जा इन्फ्रास्ट्रक्चर ने भी अमेरिका को इस मुकाम तक पहुंचाने में बड़ी भूमिका निभाई है.
तेल उत्पादन में कौन सबसे आगे?
अमेरिका के बाद सऊदी अरब का नंबर आता है. वैश्विक तेल उत्पादन में उसकी हिस्सेदारी करीब 11 फीसदी है. रूस इसके बाद तीसरे स्थान पर है, जबकि कनाडा भी दुनिया के बड़े तेल उत्पादक देशों में शामिल है. इन देशों में उत्पादन का स्तर इतना बड़ा है कि इनके फैसलों का असर सिर्फ घरेलू बाजार पर नहीं, बल्कि पूरी दुनिया के तेल बाजार पर पड़ सकता है.
अमेरिका में तेल की खपत भी सबसे ज्यादा
अमेरिका की कहानी सिर्फ तेल उत्पादन तक सीमित नहीं है. तेल की खपत के मामले में भी वह दुनिया में सबसे आगे है. अमेरिका का ट्रांसपोर्टेशन सेक्टर बहुत बड़ा है. इसके अलावा वहां का इंडस्ट्रियल बेस और ऊर्जा की कुल मांग भी काफी ज्यादा है. यही वजह है कि देश में पैदा होने वाले तेल का एक बड़ा हिस्सा घरेलू जरूरतों में ही खप जाता है. तेल खपत के मामले में चीन दूसरे नंबर पर आता है. चीन की बड़ी इंडस्ट्री, विशाल ट्रांसपोर्ट नेटवर्क और लगातार बढ़ती ऊर्जा जरूरतों ने उसे दुनिया के सबसे बड़े तेल उपभोक्ताओं में शामिल कर दिया है.
तेल खपत के मामले में किस नंबर पर है भारत?
भारत इस सूची में तीसरे नंबर पर है. लेकिन भारत और अमेरिका के बीच एक बड़ा अंतर है. अमेरिका खुद बड़ी मात्रा में तेल पैदा करता है, जबकि भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा दूसरे देशों से खरीदता है. भारत की कच्चे तेल की 80 फीसदी से ज्यादा जरूरत आयात के जरिए पूरी होती है. ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमत बढ़ने या सप्लाई में किसी तरह की रुकावट आने का सीधा असर भारतीय अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है.
- जापान और रूस भी दुनिया के बड़े तेल उपभोक्ताओं में शामिल हैं.
- सबसे ज्यादा तेल निकालने वाला देश सबसे बड़ा निर्यातक क्यों नहीं?
- यह सवाल अक्सर लोगों के मन में आता है कि अगर अमेरिका दुनिया में सबसे ज्यादा तेल पैदा करता है तो फिर सबसे बड़ा तेल निर्यातक भी वही क्यों नहीं है?
- इसका सीधा जवाब है - उत्पादन और निर्यात एक ही चीज नहीं हैं.
तेल की खपत कहां ज्यादा सऊदी या अमेरिका?
किसी देश के पास तेल का उत्पादन बहुत ज्यादा हो सकता है, लेकिन अगर उसकी घरेलू खपत भी उतनी ही बड़ी है तो निर्यात के लिए बचने वाला तेल कम हो सकता है. दूसरी तरफ किसी देश का उत्पादन बहुत बड़ा हो और उसकी घरेलू खपत तुलनात्मक रूप से कम हो, तो वह अपनी अतिरिक्त मात्रा को दूसरे देशों को बेच सकता है. अमेरिका और सऊदी अरब की तुलना से इसे आसानी से समझा जा सकता है. अमेरिका भले ही सऊदी अरब से ज्यादा कच्चा तेल पैदा करता हो, लेकिन उसके यहां तेल की घरेलू मांग भी बहुत बड़ी है. सऊदी अरब की स्थिति अलग है. उसकी आबादी अमेरिका के मुकाबले काफी कम है और घरेलू खपत उसकी उत्पादन क्षमता की तुलना में सीमित है. इसलिए उसके पास अंतरराष्ट्रीय बाजार में बेचने के लिए बड़ी मात्रा में कच्चा तेल उपलब्ध रहता है.
तेल निर्यात में सऊदी अरब की मजबूत पकड़
सऊदी अरब लंबे समय से दुनिया के सबसे बड़े कच्चे तेल निर्यातकों में शामिल रहा है. उसके पास विशाल तेल भंडार हैं और उत्पादन क्षमता भी काफी मजबूत है. यही वजह है कि वैश्विक पेट्रोलियम बाजार में सऊदी अरब का प्रभाव काफी ज्यादा है. सऊदी अरब के उत्पादन या निर्यात से जुड़ा कोई बड़ा फैसला दुनिया के दूसरे हिस्सों में भी तेल की कीमतों को प्रभावित कर सकता है. रूस भी तेल के बड़े निर्यातकों में शामिल है.
पश्चिमी देशों के प्रतिबंधों के बावजूद रूसी तेल की सप्लाई अंतरराष्ट्रीय बाजार में जारी रही है. खासकर एशियाई बाजार रूस के लिए बेहद महत्वपूर्ण बन गया है. चीन और भारत रूसी तेल के प्रमुख खरीदारों में शामिल हैं. इराक भी कच्चे तेल के बड़े निर्यातकों में है. इसके अलावा संयुक्त अरब अमीरात और कनाडा की भी वैश्विक तेल व्यापार में महत्वपूर्ण हिस्सेदारी है.
भारत के लिए तेल की कीमत क्यों है इतनी अहम?
भारत की स्थिति बाकी बड़े तेल उपभोक्ताओं से कुछ अलग है. देश में तेल की खपत बहुत ज्यादा है, लेकिन घरेलू उत्पादन उस जरूरत को पूरा करने के लिए पर्याप्त नहीं है.
भारत की अर्थव्यवस्था में परिवहन, विनिर्माण और दूसरे कई सेक्टर तेल पर निर्भर हैं. इसलिए देश को लगातार बड़ी मात्रा में कच्चे तेल की जरूरत पड़ती है. चूंकि भारत अपनी कच्चे तेल की 80 फीसदी से ज्यादा जरूरत आयात से पूरी करता है, इसलिए अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों का उतार-चढ़ाव सीधे भारत को प्रभावित करता है.
तेल महंगा होने पर भारत में कैसे बढ़ती है मंहगाई?
तेल महंगा होता है तो भारत का इंपोर्ट बिल बढ़ सकता है. इसका असर महंगाई पर भी पड़ सकता है और ईंधन की कीमतों के साथ-साथ ट्रांसपोर्टेशन और उत्पादन की लागत भी बढ़ सकती है. यही वजह है कि भारत के लिए सिर्फ यह देखना काफी नहीं है कि दुनिया में कितना तेल पैदा हो रहा है. यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि तेल कहां से आ रहा है, किस कीमत पर मिल रहा है और अंतरराष्ट्रीय सप्लाई लाइन कितनी सुरक्षित है.
उत्पादन, खपत और निर्यात की तस्वीर अलग-अलग है
दुनिया के तेल बाजार को समझने के लिए उत्पादन, खपत और निर्यात को अलग-अलग देखना जरूरी है. अमेरिका उत्पादन और खपत दोनों में सबसे आगे है. सऊदी अरब दुनिया के सबसे प्रभावशाली तेल निर्यातकों में शामिल है. रूस उत्पादन और निर्यात दोनों में बड़ी ताकत रखता है. वहीं चीन और भारत दुनिया के सबसे बड़े तेल उपभोक्ताओं में शामिल हैं. यही वजह है कि तेल की दुनिया का समीकरण सिर्फ आंकड़ों तक सीमित नहीं है. किसी बड़े तेल उत्पादक देश में राजनीतिक संकट हो, समुद्री रास्ते में तनाव बढ़े या किसी इलाके से तेल की सप्लाई बाधित हो जाए, तो उसका असर हजारों किलोमीटर दूर बैठे देशों पर भी पड़ सकता है.
उत्पादन, खपत और निर्यात मिलकर तय करते हैं वास्तविक स्थिति
तेल की कीमत में अचानक उछाल से लेकर सप्लाई में कमी तक, इसका असर परिवहन, उद्योग, महंगाई और पूरी अर्थव्यवस्था पर दिखाई दे सकता है. यानी दुनिया के तेल बाजार में असली ताकत सिर्फ ज्यादा तेल निकालने में नहीं है. उत्पादन कितना है, घरेलू खपत कितनी है और दुनिया को कितना तेल बेचा जा सकता है - इन तीनों का संतुलन ही किसी देश की वास्तविक स्थिति तय करता है.