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देश का पहला पेट्रोग्लिफ पार्क....अब खुलेंगे लद्दाख की चट्टानों में कैद आदिमानव के राज, जानिए कैसे महफूज होगी सदियों पुरानी विरासत

लद्दाख में देश का पहला ओपन-एयर पेट्रोग्लिफ पार्क बना है. यहां हजारों साल पुराने आदिमानवों के शैलचित्रों को उनकी असली जगह पर ही संरक्षित किया है. आइए जानते हैं यह कैसे अलग है और क्यों खास है.

Written ByBhoopendra Rai
Published: Oct 14, 2026, 09:49 PM IST|Updated: Oct 14, 2026, 10:04 PM IST
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देश का पहला पेट्रोग्लिफ पार्क....अब खुलेंगे लद्दाख की चट्टानों में कैद आदिमानव के राज, जानिए कैसे महफूज होगी सदियों पुरानी विरासत
Image Credit: देश का पहला ओपन-एयर पेट्रोग्लिफ पार्क

About the Author

Bhoopendra Rai

Bhoopendra Rai

पत्रकारिता में 9 साल से सक्रिय भूपेंद्र कुमार राय Zee News में सीनियर सब एडिटर के तौर पर न्यूज टीम का हिस्सा हैं, देश विदेशी की खबरें कवर करते हैं. 2017 में ETV Bharat (हैदराबाद) से करियर की शुरुआत करने के बाद वे 2020 में Zee News पहुंचे, जहां 2022 तक काम किया. 2023 में News24 की स्पोर्ट्स टीम को लीड करने का मौका मिला. इसके बाद India Daily Live में बतौर चीफ सब एडिटर स्पोर्ट्स टीम के साथ जुड़े. 2024 में दोबारा News24 लौटे और नई स्पोर्ट्स वेबसाइट लॉन्चिंग का अहम हिस्सा रहे. अक्टूबर 2025 में News24 से अलविदा लेकर एक बार फिर Zee News पहुंचे हैं. खेलों में गहरी रुचि रखते हैं और क्रिकेट वर्ल्ड कप, एशियन गेम्स, ओलंपिक गेम्स, हॉकी वर्ल्ड कप समेत बड़े खेल इवेंट को कवर करने का अनुभव है. ब्रेकिंग न्यूज, क्रिकेट एनालिसिस और किस्से-कहानियों पर अच्छी पकड़ है. जी न्यूज में खेल से जुड़ी खबरों के बाद अब न्यूज टीम के साथ रियलटाइम न्यूज पर काम कर रहे हैं. एक्सप्लेनर और किसी भी मुद्दे पर रिसर्च के साथ उसे आसान भाषा में पाठकों तक पहुंचा रहे हैं. आप Bhoopendra.Rai@zeemedia.com पर सीधे ईमेल या फिर नीचे X और Facebook से जुड़ सकते हैं.
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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी लद्दाख में करीब 3,350 करोड़ रुपये के 5 बड़े प्रोजेक्ट्स की सौगात देने जा रहे हैं. लेह एयरपोर्ट के नए टर्मिनल और सामरिक सड़कों के साथ-साथ इस लिस्ट में सबसे अनोखा तोहफा है देश का पहला पेट्रोग्लिफ संरक्षण पार्क. यह कोई बंद कमरों वाला म्यूजियम नहीं बल्कि खुले आसमान के नीचे बना ऐसा पार्क है, जहां हजारों साल पहले आदिमानवों ने अपने हाथों से पत्थरों पर जो चित्र उकेरे थे, उन्हें सुरक्षित रखा गया है. सालों पुरानी विरासत को बचाने के लिए इस पार्क को बनाया गया है. देश का यह पहला पेट्रोग्लिफ पार्क है. यह कैसे अलग और खास है? आइए डिटेल से जानते हैं..

दरअसल, अब तक भारत में ऐसा कोई पार्क नहीं था, जहां हजारों साल पुराने पत्थरों को उनकी असली जगह पर ही संजोया गया हो. ये वही पत्थर हैं, जिन पर आदिमानवों ने अपने हाथों से चित्र उकेरे थे. अब तक हम देखते हैं कि पार्कों में म्यूजियम बने होते हैं, जिनमें कांच के बक्सों में इतिहास संजोकर रखा जाता है, लेकिन देश का पेट्रोग्लिफ पार्क ऐसा पहला 'ओपन-एयर' पार्क है, जहां खुले आसमान के नीचे पत्थरों को उनकी असली जगह पर ही संजोया गया है.

पेट्रोग्लिफ क्या होते हैं और लद्दाख की चट्टानों पर क्या बना है?

पेट्रोग्लिफ उन चित्रों को कहते हैं, जिन्हें आदिमानवों ने हजारों साल पहले अपने हाथों से खुरचकर उकेरा था. उस वक्त आदिमानव नुकीले औजारों से चट्टानों को खुरचकर अपनी बातें दर्ज करते थे. लद्दाख के इन पत्थरों पर आपको उस दौर के शिकार के नज़ारे, तीर-कमान, जंगली याक, पहाड़ी बकरे और उस ज़माने के कबीलाई इंसानों के रहन-सहन की तस्वीरें देखने को मिल जाती हैं.

इन पत्थरों में कैद इतिहास कितना पुराना है?

इस पार्क में जो प्राचीन पत्थर सहेजे गए हैं, वे पाषाण काल और कांस्य युग के दौर के बताए जाते हैं. इसका मतलब यह है कि ये चित्र करीब 2 हज़ार से 5 हज़ार साल पुराने हैं. कुछ शैलचित्रों का इतिहास तो 7 हज़ार साल पुराना माना जाता है. ये शैलचित्र बताते हैं कि हजारों साल पहले इस इलाके में आदिमानव रहा करते थे.

इस पार्क को बनाने की जरूरत क्यों पड़ी?

कहते हैं न कि जिस चीज की कद्र न हो, वह एक वक्त के बाद बर्बाद हो जाती है. यही हाल इस इलाके का होता अगर इन शैलचित्रों को न सहेजा जाता. बॉर्डर पर सड़कें और इंफ्रास्ट्रक्चर बनने की वजह से इन बेशकीमती पत्थरों के टूटने, चोरी होने और बर्फीले मौसम में घिसकर मिटने का खतरा बढ़ गया था, इसलिए इस पार्क के जरिए उन्हें हमेशा के लिए सुरक्षित कर लिया गया है.

Ladakh Petroglyph Park

यह पार्क काम कैसे करेगा और पत्थरों को कैसे बचाया जाएगा?

  1. लद्दाख में सर्दियों में खून जमा देने वाली बर्फ गिरती है, जबकि गर्मियों में तेज धूप होती है. ऐसे में पार्क में जो शैलचित्र खुले में रखे जाएंगे, उन पर उकेरे गए चित्रों के घिसने का डर रहता है. इसलिए पत्थरों पर एक खास वैज्ञानिक केमिकल कोटिंग चढ़ाई जाएगी, यह परत चित्रों को खराब किए बिना उन्हें पानी, बर्फ और धूल से ढाल की तरह सुरक्षित रखेगी.
  2. पार्क में मौजूद हर बड़े और छोटे पत्थर की जीपीएस मैपिंग की जाएगी. इसका मतलब यह है कि किस पत्थर पर कौन सा चित्र बना है, वह किस काल का है और पार्क में कहां रखा है? इसका पूरा डिजिटल डेटा तैयार होगा. ऐसा होने पर पत्थर के चोरी होने या गायब होने का खतरा नहीं रहेगा.
  3. पूरे पार्क में 24 घंटे कैमरों से नज़र रखी जाएगी, इसके अलावा ट्रेंड लोकल गाइड तैनात रहेंगे, जो हर पत्थर और उस पर बने जानवरों या कबीलों के प्रतीकों की कहानी बताएंगे. इस तरह लोगों को जानकारी भी मिलेगी और शैलचित्रों के साथ कोई छेड़छाड़ भी नहीं कर पाएगा.

टूरिस्ट्स और रिसर्चर्स के लिए यह क्यों खास होगा?

1. लद्दाख घूमने का बिल्कुल नया अनुभव मिलेगा: जो लोग अब तक लद्दाख जाते थे वे पैंगोंग झील, बर्फीले पहाड़ और बौद्ध मठ देखते थे, लेकिन अब उन्हें यहां हजारों साल पुराने आदिमानव के दौर को अपनी आंखों से देखने का मौका मिलेगा.

2. दुनिया भर के रिसर्चर्स के लिए खुला मैदान: यह पार्क दुनियाभर के रिसर्चर्स के लिए खास होने वाला है, क्योंकि यह इतिहास, आर्कियोलॉजी और मानव विकास पर एक जीती-जागती लैब की तरह है. यहां रिसर्चर्स आसानी से प्राचीन शैलचित्रों की स्टडी कर पाएंगे.

3. टूरिस्ट्स को मिलेगी 'टाइम ट्रैवल' वाली फील: पूरे पार्क में वॉकवे और इंफॉर्मेशन बोर्ड्स लगे होंगे, जिनके जरिए पर्यटकों को यह आसानी से समझ आएगा कि 5,000 साल पहले लद्दाख के कबीले कैसे शिकार करते थे, वे कैसे रहते थे.

4. मध्य एशिया और भारत के पुराने कनेक्शन की समझ: लद्दाख हमेशा से सिल्क रूट और प्राचीन व्यापार का चौराहा कहलाता रहा है. यहां के पत्थरों पर उकेरे गए चित्र यह समझाएंगे कि हजारों साल पहले मध्य एशिया, तिब्बत और भारत के बीच इंसानी संपर्क कैसा रहा था.

5. लोकल टूरिज्म और रोजगार को नई रफ्तार: इस पार्क से लेह में हेरिटेज टूरिज्म को बढ़ावा मिलना स्वाभाविक है. इसके साथ ही स्थानीय लोगों को रोजगार मिलेगा.

Ladakh Petroglyph Park

रॉक-आर्ट टूरिज्म के ग्लोबल नक्शे पर भारत का नाम

दरअसल, दुनिया भर में ऐसे पेट्रोग्लिफ पार्कों का बहुत क्रेज़ है. अज़रबैजान का 'गोबुस्तान पार्क' और मंगोलिया का रॉक आर्ट कॉम्प्लेक्स इसके बड़े उदाहरण हैं. इन्हें देखने के लिए दुनिया भर से लोग जाते हैं. अब तक भारत में इन शैलचित्रों को सिर्फ किताबों और रिसर्च तक सीमित रखा गया था. लेकिन लेह में बने इस पार्क के बाद भारत भी प्रागैतिहासिक और रॉक-आर्ट टूरिज्म के ग्लोबल नक्शे पर मजबूती से नजर आने वाला है.

रॉक-आर्ट टूरिज्म का मतलब है, पत्थरों और गुफाओं पर बनी हजारों साल पुरानी कलाकारी को देखने का सफर, यह एक खास तरह का हेरिटेज टूरिज्म है, जिसमें लोग उन ऐतिहासिक जगहों पर जाते हैं जहां आदिमानवों ने चट्टानों को कुरेदकर या उन पर रंग भरकर अपनी जिंदगी के किस्से दर्ज किए थे.

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