प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी लद्दाख में करीब 3,350 करोड़ रुपये के 5 बड़े प्रोजेक्ट्स की सौगात देने जा रहे हैं. लेह एयरपोर्ट के नए टर्मिनल और सामरिक सड़कों के साथ-साथ इस लिस्ट में सबसे अनोखा तोहफा है देश का पहला पेट्रोग्लिफ संरक्षण पार्क. यह कोई बंद कमरों वाला म्यूजियम नहीं बल्कि खुले आसमान के नीचे बना ऐसा पार्क है, जहां हजारों साल पहले आदिमानवों ने अपने हाथों से पत्थरों पर जो चित्र उकेरे थे, उन्हें सुरक्षित रखा गया है. सालों पुरानी विरासत को बचाने के लिए इस पार्क को बनाया गया है. देश का यह पहला पेट्रोग्लिफ पार्क है. यह कैसे अलग और खास है? आइए डिटेल से जानते हैं..
दरअसल, अब तक भारत में ऐसा कोई पार्क नहीं था, जहां हजारों साल पुराने पत्थरों को उनकी असली जगह पर ही संजोया गया हो. ये वही पत्थर हैं, जिन पर आदिमानवों ने अपने हाथों से चित्र उकेरे थे. अब तक हम देखते हैं कि पार्कों में म्यूजियम बने होते हैं, जिनमें कांच के बक्सों में इतिहास संजोकर रखा जाता है, लेकिन देश का पेट्रोग्लिफ पार्क ऐसा पहला 'ओपन-एयर' पार्क है, जहां खुले आसमान के नीचे पत्थरों को उनकी असली जगह पर ही संजोया गया है.
पेट्रोग्लिफ उन चित्रों को कहते हैं, जिन्हें आदिमानवों ने हजारों साल पहले अपने हाथों से खुरचकर उकेरा था. उस वक्त आदिमानव नुकीले औजारों से चट्टानों को खुरचकर अपनी बातें दर्ज करते थे. लद्दाख के इन पत्थरों पर आपको उस दौर के शिकार के नज़ारे, तीर-कमान, जंगली याक, पहाड़ी बकरे और उस ज़माने के कबीलाई इंसानों के रहन-सहन की तस्वीरें देखने को मिल जाती हैं.
इस पार्क में जो प्राचीन पत्थर सहेजे गए हैं, वे पाषाण काल और कांस्य युग के दौर के बताए जाते हैं. इसका मतलब यह है कि ये चित्र करीब 2 हज़ार से 5 हज़ार साल पुराने हैं. कुछ शैलचित्रों का इतिहास तो 7 हज़ार साल पुराना माना जाता है. ये शैलचित्र बताते हैं कि हजारों साल पहले इस इलाके में आदिमानव रहा करते थे.
कहते हैं न कि जिस चीज की कद्र न हो, वह एक वक्त के बाद बर्बाद हो जाती है. यही हाल इस इलाके का होता अगर इन शैलचित्रों को न सहेजा जाता. बॉर्डर पर सड़कें और इंफ्रास्ट्रक्चर बनने की वजह से इन बेशकीमती पत्थरों के टूटने, चोरी होने और बर्फीले मौसम में घिसकर मिटने का खतरा बढ़ गया था, इसलिए इस पार्क के जरिए उन्हें हमेशा के लिए सुरक्षित कर लिया गया है.

1. लद्दाख घूमने का बिल्कुल नया अनुभव मिलेगा: जो लोग अब तक लद्दाख जाते थे वे पैंगोंग झील, बर्फीले पहाड़ और बौद्ध मठ देखते थे, लेकिन अब उन्हें यहां हजारों साल पुराने आदिमानव के दौर को अपनी आंखों से देखने का मौका मिलेगा.
2. दुनिया भर के रिसर्चर्स के लिए खुला मैदान: यह पार्क दुनियाभर के रिसर्चर्स के लिए खास होने वाला है, क्योंकि यह इतिहास, आर्कियोलॉजी और मानव विकास पर एक जीती-जागती लैब की तरह है. यहां रिसर्चर्स आसानी से प्राचीन शैलचित्रों की स्टडी कर पाएंगे.
3. टूरिस्ट्स को मिलेगी 'टाइम ट्रैवल' वाली फील: पूरे पार्क में वॉकवे और इंफॉर्मेशन बोर्ड्स लगे होंगे, जिनके जरिए पर्यटकों को यह आसानी से समझ आएगा कि 5,000 साल पहले लद्दाख के कबीले कैसे शिकार करते थे, वे कैसे रहते थे.
4. मध्य एशिया और भारत के पुराने कनेक्शन की समझ: लद्दाख हमेशा से सिल्क रूट और प्राचीन व्यापार का चौराहा कहलाता रहा है. यहां के पत्थरों पर उकेरे गए चित्र यह समझाएंगे कि हजारों साल पहले मध्य एशिया, तिब्बत और भारत के बीच इंसानी संपर्क कैसा रहा था.
5. लोकल टूरिज्म और रोजगार को नई रफ्तार: इस पार्क से लेह में हेरिटेज टूरिज्म को बढ़ावा मिलना स्वाभाविक है. इसके साथ ही स्थानीय लोगों को रोजगार मिलेगा.

दरअसल, दुनिया भर में ऐसे पेट्रोग्लिफ पार्कों का बहुत क्रेज़ है. अज़रबैजान का 'गोबुस्तान पार्क' और मंगोलिया का रॉक आर्ट कॉम्प्लेक्स इसके बड़े उदाहरण हैं. इन्हें देखने के लिए दुनिया भर से लोग जाते हैं. अब तक भारत में इन शैलचित्रों को सिर्फ किताबों और रिसर्च तक सीमित रखा गया था. लेकिन लेह में बने इस पार्क के बाद भारत भी प्रागैतिहासिक और रॉक-आर्ट टूरिज्म के ग्लोबल नक्शे पर मजबूती से नजर आने वाला है.
रॉक-आर्ट टूरिज्म का मतलब है, पत्थरों और गुफाओं पर बनी हजारों साल पुरानी कलाकारी को देखने का सफर, यह एक खास तरह का हेरिटेज टूरिज्म है, जिसमें लोग उन ऐतिहासिक जगहों पर जाते हैं जहां आदिमानवों ने चट्टानों को कुरेदकर या उन पर रंग भरकर अपनी जिंदगी के किस्से दर्ज किए थे.