Opinion: चालान की वसूली या सड़क सुरक्षा? सुप्रीम कोर्ट के सुझाव पर सबसे बड़ा सवाल यही है
अगर ट्रैफिक चालान बिजली के बिल में जोड़कर वसूला जाने लगे तो क्या इससे सड़कें सुरक्षित हो जाएंगी? शायद नहीं. यही वह बुनियादी सवाल है जिसे सुप्रीम कोर्ट के ताजा सुझाव के संदर्भ में पूछने की जरूरत है.
सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को लंबित ई-चालानों की वसूली को लेकर कई सुझाव दिए. कोर्ट को बताया गया कि राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में अब तक कुल करीब 45 हजार करोड़ रुपये के ई-चालान जारी किए गए हैं. इनमें से करीब 25 हजार करोड़ रुपये की वसूली हो चुकी है जबकि लगभग 20 हजार करोड़ रुपये की राशि वसूलनी बाकी है.
इसी दौरान कोर्ट ने यह सुझाव दिया कि जिन लोगों ने चालान नहीं भरा है, उनकी बकाया राशि को बिजली के बिल में जोड़ा जा सकता है. पूरी खबर पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें
इसके अलावा वाहन के आरसी नवीनीकरण, स्वामित्व हस्तांतरण, फिटनेस और पीयूसी प्रमाणपत्र तथा ड्राइविंग लाइसेंस जैसी सेवाओं को बकाया चालान से जोड़ने की संभावनाओं पर भी बात हुई.
पहली नजर में यह विचार बेहद सख्त और प्रभावी लगता है कि चालान नहीं भरोगे तो बिजली का बिल बढ़ जाएगा, बिजली का बिल नहीं भरोगे तो कनेक्शन कट सकता है. यानी चालान भरना मजबूरी बन जाएगा लेकिन यहीं से असली सवाल शुरू होता है.
क्या सड़क सुरक्षा का लक्ष्य लोगों से ज्यादा से ज्यादा चालान वसूलना है या सड़क दुर्घटनाओं और मौतों को कम करना? अगर लक्ष्य सड़क सुरक्षा है तो नीति की सफलता का पैमाना भी वही होना चाहिए.
सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय (MoRTH) की वार्षिक रिपोर्ट के आंकड़े इस मोर्चे पर एक असहज तस्वीर पेश करते हैं. चालान बढ़े लेकिन दुर्घटनाएं कहां कम हुईं?
सितंबर 2019 में मोटर व्हीकल कानून में संशोधन के बाद कई ट्रैफिक जुर्मानों में भारी बढ़ोतरी हुई. बिना लाइसेंस ड्राइविंग का जुर्माना 500 रुपये से बढ़कर 5,000 रुपये हो गया. शराब पीकर गाड़ी चलाने का जुर्माना 2,000 से बढ़कर 10,000 रुपये हुआ.
सीट बेल्ट और हेलमेट उल्लंघन का जुर्माना 100 से बढ़कर 1,000 रुपये हुआ. यानी कई मामलों में जुर्माना पांच से दस गुना तक बढ़ा.
इसके बाद ई-चालान व्यवस्था भी तेजी से बढ़ी.
2018 में देश में करीब 43 लाख ई-चालान जारी हुए थे और उनसे करीब 197 करोड़ रुपये की वसूली हुई. 2019 में ई-चालानों की संख्या बढ़कर 2.05 करोड़ हो गई.
2024 में यह आंकड़ा 8.19 करोड़ और 2025 में 9.79 करोड़ तक पहुंच गया. यानी 2018 से 2025 के बीच ई-चालानों की संख्या करीब 22.8 गुना बढ़ी.
अब दूसरी तरफ सड़क दुर्घटनाओं का आंकड़ा देखिए.
2019 में देश में 4,56,959 सड़क दुर्घटनाएं हुई थीं और इनमें 1,58,984 लोगों की मौत हुई. 2024 में दुर्घटनाओं की संख्या बढ़कर 4,87,707 और मौतों की संख्या 1,77,175 हो गई.
यानी 2019 से 2024 के बीच दुर्घटनाएं करीब 6.7 प्रतिशत और मौतें करीब 11.4 प्रतिशत बढ़ीं.
तो फिर सवाल सीधा है कि अगर भारी जुर्माने और बड़े पैमाने पर ई-चालान सड़क सुरक्षा का निर्णायक हथियार हैं तो दुर्घटनाओं और मौतों में उसी अनुपात में कमी क्यों नहीं दिखाई देती?
यह आंकड़ा यह साबित नहीं करता कि चालान का कोई डिटरेंट इफेक्ट यानी निवारक प्रभाव बिल्कुल नहीं है लेकिन इतना जरूर बताता है कि ज्यादा चालान से ज्यादा सड़क सुरक्षा का सीधा फॉर्मूला आंकड़ों से साबित नहीं होता.
नियम तोड़ना और चालान भरना एक बात नहीं
यहीं पूरी बहस में एक महत्वपूर्ण फर्क गायब हो जाता है. ट्रैफिक नियमों का उल्लंघन दुर्घटना का कारण बन सकता है, लेकिन उस उल्लंघन का चालान भर देना दुर्घटना रोकने की गारंटी नहीं है.
2023 के सरकारी आंकड़ों के मुताबिक जिन दुर्घटनाओं को ट्रैफिक नियम उल्लंघन से जोड़ा गया, उनमें 68.4 प्रतिशत ओवरस्पीडिंग से जुड़ी थीं. गलत दिशा/लेन अनुशासन से जुड़े मामलों की हिस्सेदारी 5.25 प्रतिशत थी.
शराब या ड्रग्स के प्रभाव में ड्राइविंग से जुड़े मामले 1.9 प्रतिशत और मोबाइल फोन के इस्तेमाल से जुड़े मामले 1.48 प्रतिशत थे. 2024 के आंकड़ों में भी ओवरस्पीडिंग से जुड़ी 3,45,024 दुर्घटनाएं और 1,24,522 मौतें दर्ज की गईं.
इसलिए सड़क सुरक्षा का असली सवाल होना चाहिए कि लोग गाड़ी तेज क्यों चला रहे हैं, गलत दिशा में क्यों चल रहे हैं, शराब पीकर क्यों चला रहे हैं, मोबाइल क्यों इस्तेमाल कर रहे हैं और इन व्यवहारों को मौके पर कैसे रोका जाए?
सिर्फ यह सुनिश्चित करना कि पुराने चालान का पैसा सरकारी खाते में पहुंच जाए, इस सवाल का जवाब नहीं है.
चालान वसूली को बिजली से जोड़ना किस दिशा में ले जाएगा?
बिजली का बिल एक अलग सेवा का भुगतान है. ट्रैफिक चालान कानून तोड़ने पर लगाया गया दंड है.
दोनों को जोड़ने का तर्क केवल इतना है कि बिजली एक ऐसी सेवा है जिसे लेकर आम आदमी भुगतान को लेकर ज्यादा गंभीर रहता है. इसलिए यदि चालान को बिजली के बिल में जोड़ दिया जाए तो भुगतान की संभावना बढ़ सकती है.
लेकिन किसी दंड की वसूली आसान बनाना और उस दंड के मूल उद्देश्य को हासिल करना दो अलग बातें हैं.
अगर आज चालान बिजली बिल से जोड़ दिया गया, कल किसी दूसरे सरकारी बकाये के लिए पानी का बिल इस्तेमाल करने का तर्क सामने आ सकता है. फिर किसी तीसरे दंड के लिए किसी और आवश्यक सेवा को वसूली प्रणाली बनाया जा सकता है.
राज्य की ताकत का इस्तेमाल अपराध या उल्लंघन पर कार्रवाई के लिए होना चाहिए लेकिन सवाल यह है कि क्या हर अलग-अलग देनदारी की वसूली के लिए नागरिक की दूसरी जरूरी सेवाओं पर दबाव डालना सही प्रशासनिक मॉडल है? इस पर गंभीर सार्वजनिक बहस जरूरी है.
चालान का उद्देश्य राजस्व नहीं, अनुपालन है
सड़क सुरक्षा नीति का उद्देश्य चालान से पैसा कमाना नहीं होना चाहिए. अगर चालान की संख्या बढ़ रही है तो इसका मतलब किसी नियम, कानून या आदेश को सख्ती से पालन होने का संकेत हो सकता है लेकिन अगर उसी अवधि में दुर्घटनाएं और मौतें भी बढ़ रही हैं, तो केवल चालान की संख्या दिखाकर सड़क सुरक्षा की सफलता घोषित करना आंकड़ों के साथ न्याय नहीं होगा.
दिलचस्प बात यह है कि सरकारी आंकड़ों में 2018 से 2025 के बीच ई-चालान करीब 22.8 गुना बढ़े, जबकि राजस्व करीब 19.1 गुना बढ़ा. लेकिन 2023 से 2025 के बीच चालान लगभग 44 प्रतिशत बढ़े जबकि राजस्व करीब 11 प्रतिशत घट गया.
यानी चालान की संख्या और वसूली भी अपने आप में एक सीधी रेखा में नहीं चल रहे हैं. और राज्यों के आंकड़े तो और भी महत्वपूर्ण हैं.
2019-23 के दौरान उत्तर प्रदेश में करीब 4.40 करोड़ ई-चालान जारी हुए. फिर भी 2023 से 2024 के बीच राज्य में सड़क दुर्घटनाएं 44,534 से बढ़कर 46,052 और मौतें 23,652 से बढ़कर 24,118 हो गईं.
महाराष्ट्र में भी 2023 से 2024 के बीच दुर्घटनाएं और मौतें बढ़ीं जबकि वहां 2019-23 में करीब 30.92 लाख ई-चालान जारी हुए थे.
गुजरात में दुर्घटनाएं 16,349 से घटकर 15,588 हुईं और जम्मू-कश्मीर में 6,298 से 5,808. यानी राज्यों का अनुभव एक जैसा नहीं है.
यही कारण है कि चालान की मात्रा को दुर्घटनाओं की रोकथाम का अकेला पैमाना मानना वैज्ञानिक रूप से कमजोर तर्क होगा.
असली चुनौती कुछ और होनी चाहिए
सुप्रीम कोर्ट की चिंता जायज है कि सिर्फ ई-चालान जारी कर देने से व्यवस्था पूरी नहीं होती. अगर करोड़ों रुपये के जुर्माने लंबित हैं तो रिकवरी मैकेनिज्म पर सवाल उठना स्वाभाविक है. कोर्ट ने भी इसी समस्या पर ध्यान दिलाया है.
लेकिन सड़क सुरक्षा की अगली बहस को इससे आगे जाना होगा. क्यों न सवाल यह हो कि
- खतरनाक ओवरस्पीडिंग वाले वाहनों पर तत्काल कार्रवाई कितनी प्रभावी है?
- बार-बार नियम तोड़ने वालों की पहचान और निगरानी कितनी मजबूत है?
- ब्लैक स्पॉट खत्म करने में राज्यों की प्रगति क्या है?
- सड़क डिजाइन और इंजीनियरिंग की गलतियों पर जवाबदेही कौन तय करेगा?
- शराब पीकर ड्राइविंग और रॉन्ग-साइड ड्राइविंग पर मौके पर नियम कितना प्रभावी है?
- दुर्घटना के बाद गोल्डन ऑवर में चिकित्सा सुविधा कितनी तेजी से मिलती है?
- और सबसे बड़ा सवाल कितनी जानें वास्तव में बचीं?
यही असली सड़क सुरक्षा के मानक (रोड सेफ्टी मैट्रिक्स) होने चाहिए. यहां बहस को एकदम साफ रखना जरूरी है. इसलिए अब नीति को कितने चालान काटे से आगे बढ़ाकर कितनी दुर्घटनाएं रोकीं और कितनी जानें बचाईं पर ले जाने का वक्त है.
सरकार का लक्ष्य यह नहीं होना चाहिए कि हर चालान का पैसा वसूल हो जाए. लक्ष्य यह होना चाहिए कि अगला चालान काटने की नौबत ही कम आए और सड़क पर अगली जान न जाए.
सड़क सुरक्षा का हिसाब सरकारी खजाने में जमा हुए करोड़ों से नहीं, सड़क पर बची हुई जिंदगियों से होना चाहिए.
(इस लेख में इस्तेमाल आंकड़े हमारे सहयोगी शशांक ने मुहैया कराए हैं)