नई दिल्ली में 11 सितंबर को BRICS समिट होगी. समिट से पहले एक बार फिर तुलनात्मक चर्चाएं शुरू हो चुकी हैं और कई तरह के सवाल भी पैदा हो रहे हैं. कई सवालों के बीच एक सवाल यह भी है कि क्या ब्रिक्स अब G7 को चुनौती देने का हालत में आ गया है. BRICS के पास बड़ी आबादी, उभरती अर्थव्यवस्थाएं, ऊर्जा संसाधन और ग्लोबल साउथ की आवाज है. वहीं G7 के पास वैश्विक वित्त, आधुनिक तकनीक, बड़ी कंपनियां और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं पर पुराना प्रभाव है.
सबसे पहले जानते हैं कि G7 क्या है. G7 यानी Group of Seven. इसमें अमेरिका, जापान, जर्मनी, ब्रिटेन, फ्रांस, इटली और कनाडा शामिल हैं. यूरोपीय संघ भी इसकी बैठकों में भाग लेता है. इसकी शुरुआत 1970 के दशक में तेल संकट के दौर में हुई थी. उस समय दुनिया की बड़ी विकसित अर्थव्यवस्थाओं ने मिलकर आर्थिक मुद्दों पर बात करने के लिए यह मंच बनाया था. इस ग्रुप में मौजूद सभी देशों की आबादी सिर्फ 80 करोड़ है, जो दुनिया की सिर्फ 10 प्रतिशद आबादी है. इतनी कम आबादी होने के बावजूद पूरी दुनिया की अर्थव्यस्था में इनका प्रभाव बहुत ज्यादा है.


ब्रिक्स की शुरुआत साल 2001 में BRIC के तौर पर हुई थी. इसमें ब्राजील, रूस, भारत और चीन शामिल थे. हालांकि 2010 में दक्षिण अफ्रीका भी इस ग्रुप का हिस्सा बन गया. जिसके बाद इसका नाम BRICS हो गया. हालांकि अब इसका और विस्तार हो गया है. मिस्र, इथियोपिया, ईरान, UAE, सऊदी अरब और इंडोनेशिया भी शामिल हैं. ब्रिक्स में शामिल सभी देशों BRICS देशों की आबादी दुनिया की लगभग आधी आबादी के बराबर है. इसमें चीन और भारत जैसे दो सबसे ज्यादा आबादी वाले मुल्क शामिल हैं.
BRICS को अक्सर G7 के विकल्प के रूप में पेश किया जाता है. इसकी वजह साफ है. BRICS में दुनिया की बड़ी उभरती अर्थव्यवस्थाएं, प्रमुख ऊर्जा उत्पादक और बड़े बाजार शामिल हैं. रूस, ईरान, सऊदी अरब और यूएई जैसे देश ऊर्जा बाजार में अहम भूमिका रखते हैं. चीन दुनिया का बड़ा विनिर्माण केंद्र है. भारत तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था और बड़ा डिजिटल बाजार है. ब्राजील कृषि और प्राकृतिक संसाधनों के लिए महत्वपूर्ण है. दक्षिण अफ्रीका अफ्रीकी महाद्वीप में एक प्रमुख अर्थव्यवस्था है. लेकिन BRICS की सबसे बड़ी ताकत उसकी सबसे बड़ी चुनौती भी है. इसके सदस्य देश बहुत अलग-अलग राजनीतिक, आर्थिक और रणनीतिक हित रखते हैं.
