'बहुओं की बारी, RLD की तैयारी'! सपा की राह पर चलेंगे जयंत? महिला वोट बैंक साधने के लिए चला 'चारू कार्ड'
यूपी विधानसभा चुनाव में अब ज्यादा वक्त नहीं बचा है. ऐसे में लगता है कि अब आरएलडी सपा वाली स्ट्रैटजी अपना रही है. चारू चौधरी जयंत चौधरी के साथ मंच पर दिखीं तो सियासी गलियारों में बातें तेज हो गईं कि क्या वह पॉलिटिक्स में उतर रही हैं.
'सत्ता के सेमीफाइल' यानी यूपी विधानसभा चुनाव की जंग शुरू हो चुकी है और प्लानिंग से लेकर जनता को अपने पाले में लाने का खेल भी. लेकिन इस बार उत्तर प्रदेश चुनाव खास होने वाला है. इस बार चुनावों में बहुओं का जोर दिखने वाला है. पिछले हफ्ते सहारनपुर में राष्ट्रीय लोकदल यानी आरएलडी की स्वाभिमान रैली हुई थी, जिसमें मंच पर जयंत चौधरी के साथ उनकी पत्नी चारू भी नजर आई थीं और बाद में उन्होंने संबोधन भी दिया था. आज सोच रहे होंगे कि इसमें क्या नई बात है. तो आपको यह समझना होगा कि सियासत में कुछ भी यूं ही नहीं होता. आरएलडी की यह कोई आम रैली नहीं थी. यूपी की राजनीति को फॉलो करने वाले लोग यह मानेंगे कि बीते कुछ दिनों में डिंपल यादव की सियासी मौजूदगी में इजाफा हुआ है.
ऐसे में अब सियासी गलियारों में सवाल पूछे जाने लगे हैं कि क्या चारू चौधरी भी राजनीति में एंट्री ले रही हैं. वो भी ऐसे वक्त में जब यूपी चुनाव कुछ ही महीने दूर हैं.
महिलाओं को आगे करना स्ट्रैटजी?
दो महीने पीछे चलते हैं. जुलाई के मध्य में जब सीजेपी ने संसद मार्च किया था, तब प्रदर्शनकारियों के साथ डिंपल यादव सड़क पर नजर आई थीं, जबकि अखिलेश यादव अंदर संसद में थे. वह वहां से सरकार पर हमला बोल रहे थे और डिंपल बाहर से. फिलहाल यह साफ तो नहीं है कि चारू अगर सियासत में आती हैं तो आरएलडी में उनकी भूमिका क्या होगी. लेकिन यह जरूर है कि अब महिलाओं को आगे रखने की जरूरत सियासी पार्टियों को महसूस होने लगी है. यूं तो एक वक्त पर जयंत और अखिलेश यादव ने साथ-साथ चुनाव लड़ा था. लेकिन आज जयंत एनडीए का हिस्सा हैं. हाल ही में, अखिलेश ने उन पर चवन्नी-रुपया वाला कमेंट किया तो जयंत ने इसे जाट समाज की बेइज्जती बताया. हालांकि, आरएलडी की कोशिश जाट राजनीति से आगे निकलकर पैर पसारने पर भी है.
क्या एसपी की राह पर आरएलडी?
अगर सपा की सियासत को देखें तो वहां एक संतुलन नजर आता है. एक तरफ मुद्दों पर अखिलेश यादव आक्रामक रुख अपनाते हैं तो वहीं डिंपल का अंदाज सौम्य नजर आता है. वह युवाओं, सामाजिक मुद्दों और महिलाओं की समस्याओं को लेकर पार्टी का रुख अपने अंदाज में आगे रखती हैं. सवाल है कि क्या आरएलडी भी इसी स्ट्रैटजी पर चल रही है कि एक तरफ जयंत आगे रहें और दूसरी ओर का मोर्चा चारू संभालें.
अब तक जयंत चौधरी चरण सिंह की विरासत को ही आगे बढ़ाते रहे हैं. मगर अगर आरएलडी को सियासी पांव पसारने हैं तो चारू अहम कड़ी साबित हो सकती हैं. खासकर महिलाओं के बीच, जिनको साधने की हर पार्टी कोशिश कर रही है.
अब आरएलडी की यह स्ट्रैटजी है या नहीं, यह तो आने वाले वक्त में ही मालूम चलेगा कि चारू पार्टी का नया चेहरा बनेंगी या फिर जयंत के साथ सियासी संघर्ष और परिवार की तरफ से समर्थन देने का काम करेंगी.
Gen-Z ने बदला ट्रेंड?
सीजेपी आंदोलन के बाद से सियासी दलों की सोच और स्ट्रैटजी दोनों बदली है. उनको समझ आ गया है कि युवाओं और महिलाओं को मामूली वोटर नहीं माना जा सकता. किसी भी प्वॉइंट पर ये दोनों ही खेल बदलने का माद्दा रखते हैं. इसलिए अब तमाम दल जेन जी और जेन अल्फा के साथ-साथ महिलाओं पर विशेष फोकस कर रहे हैं. उनके लिए खास तौर पर संकल्प पत्र लाए जा रहे हैं. सीधे खातों में पैसा ट्रांसफर हो रहा है.
परिसीमन बिल और महिला आरक्षण के बीच चल रही सियासी खींचतान के बीच महिला चेहरों का आगे आना भारतीय राजनीति के लिए एक अहम मौका है, जो पार्टियों के लिए भी फायदेमंद साबित हो सकता है.