दिल्ली-NCR में दीवाली पर हर साल क्यों घुट जाता है दम? क्या वाकई पटाखे हैं प्रदूषण की वजह? IIT दिल्ली की रिसर्च ने खोला राज
इसी हफ्ते के आखिर में साल का सबसे बड़ा त्योहार दीवाली आने वाली है. इसके साथ ही कई लोग आतिशबाजी को लेकर प्रदूषण का माहौल बनाने लगे हैं. लेकिन क्या वाकई पटाखे ही दीवाली के आसपास प्रदूषण के लिए जिम्मेदार हैं या सच कुछ ओर है.
दिल्ली-एनसीआर में ठंड की शुरुआत होते ही हवा में जहर घुलने का सिलसिला शुरू हो जाता है. हर साल दीवाली के आसपास आबोहवा इतनी खराब हो जाती है कि लोगों का सांस लेना दूभर हो जाता है. काफी लोग इसके लिए दीवाली में पटाखे जलाने को जिम्मेदार मानते हैं. लेकिन क्या इस मिथक में वाकई कोई सच्चाई है. इस पर आईआईटी दिल्ली की लेटेस्ट रिसर्च क्या कहती है. क्या इस धुंध और प्रदूषण के पीछे कई कारण काम करते हैं. आइए, आज आपके मन में उठने वाले इन सब सवालों का हम विस्तार के साथ एक-एक करके जवाब देते हैं. इसके बाद आप जान जाएंगे कि दिवाली के बाद होने वाले प्रदूषण का असली विलेन कौन है.
1. दीवाली के आसपास दिल्ली-एनसीआर प्रदूषण क्यों बढ़ जाता है?
दिल्ली-एनसीआर में हर साल दीवाली के आसपास अचानक बहुत खराब हो जाती है. इसका सबसे बड़ी वजह मौसम में आने वाला बदलाव होता है. असल में, अक्टबूर-नवंबर में ठंड शुरू होते ही तापमान गिरता है और हवा की गति बहुत धीमी हो जाती है. इसके चलते हवा में मौजूद नमी और कम तापमान मिलकर प्रदूषण के कणों को जमीन के पास ही रोक लेते हैं, जिसे वैज्ञानिक भाषा में 'थर्मल इन्वर्जन' कहा जाता है.
इसके साथ ही, इन दिनों पंजाब-हरियाणा, पश्चिमी यूपी के खेतों में धान की पराली जलाई जाती है. इनसे उठने वाले धुएं के काले बादल धीरे-धीरे ओर रुख करते हैं. गाड़ियों से निकलने वाला धुआं, निर्माण कार्यों की धूल और दीवाली पर जलाए जाने वाले पटाखे भी इस प्रदूषण में अपना योगदान देते हैं. इसके चलते सर्दियों में वायु प्रदूषण लोगों का जीना मुश्किल कर देता है.
2. पिछले 5 सालों में दीवाली से पहले और बाद में दिल्ली का एक्यूआई कितना रहा है?
पिछले 5 सालों में दीवाली के आसपास दिल्ली में एयर क्वालिटी इंडेक्स यानी AQI का स्तर हमेशा बहुत खतरनाक श्रेणी में पहुंचता रहा है. वर्ष 2021 में यह इंडेक्स दीवाली से एक दिन पहले औसत 314 था और अगले दिन 462 (अति गंभीर) रहा था. वर्ष 2022 में यह इंडेक्स दीवाली के दिन 312 दर्ज किया गया था, जबकि अगले दिन यह बढ़कर 326 रहा. उस साल चली तेज हवाओं की वजह से प्रदूषण काबू में रहा था.
वर्ष 2023 में दीवाली के दिन AQI 218 रहा था. जबकि अगले दिन यह 358 (बेहद ख़राब) में पहुंच गया. वर्ष 2024 में यह इंडेक्स दीवाली से पहले 290 और उसके अगले दिन 395 रहा. पिछले साल यानी वर्ष 2025 में दीवाली की पूर्व संध्या पर AQI 320 और 400 के पार (गंभीर श्रेणी) पहुंच गया था.
3. क्या दिल्ली एनसीआर में दीवाली पर वायु प्रदूषण के लिए पटाखे जिम्मेदार रहे हैं?
दीवाली पर दिल्ली-एनसीआर में प्रदूषण बढ़ने के पटाखों को एकमात्र रूप से जिम्मेदार नहीं माना जा सकता. IIT Delhi की हालिया रिसर्च के मुताबिक, दीवाली के बाद दिल्ली में खराब हवा का मुख्य कारण बायोमास जलना है, पटाखे नहीं. इस रिसर्च के मुख्य लेखक चिराग मनचंदा हैं और इसे 'एटमॉस्फेरिक पोल्यूशन रिसर्च' जर्नल में छापा गया है. स्टडी में बताया गया है कि दीवाली पर PM2.5 में धातुओं की मात्रा में 1100% तक की वृद्धि हुई और इसके पटाखे अकेले ही 95% तक जिम्मेदार थे. हालांकि, दीवाली के बाद लगभग 12 घंटों के भीतर आतिशबाजी का प्रभाव तेज़ी से कम हो जाता है.
शोधकर्ताओं के मुताबिक,रिसर्च में पाया गया कि दीवाली के बाद के दिनों में बायोमास यानी जैविक कचरा, पराली और लकड़ी जलने से उत्सर्जन में तेजी से वृद्धि होती है. इनसे निकलने वाला धुआं वायुमंडल में घुलता रहा है. हवाओं की गति बेहद कम होने की वजह से वह ऊपर नहीं उठ पाता, जिसके चलते पूरे दिल्ली-एनसीआर में सर्दियों में वायु प्रदूषण का भयंकर दुष्चक्र देखने को मिलता है.
4. दीवाली पर पटाखे जलाने से जुड़ा सुप्रीम कोर्ट का आदेश क्या है?
सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली-एनसीआर में वायु प्रदूषण की गंभीरता को देखते हुए पटाखे जलाने पर सख्त रुख अपनाया है. अदालत का स्पष्ट आदेश है कि दिल्ली-एनसीआर में सामान्य पटाखों के निर्माण, बिक्री और इस्तेमाल पर पूरी तरह प्रतिबंध रहेगा. हालांकि, लोगों की मांग को देखते हुए अदालत ने 'ग्रीन पटाखों' को चलाने की सशर्त अनुमति दी है.
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इसके साथ ही पटाखे जलाने के लिए समय की सीमा तय की गई है. इसके तहत दीवाली की रात केवल 2 घंटे यानी रात 8 बजे से 10 बजे तक ही पटाखे चलाए जा सकते हैं. अदालत ने यह भी साफ किया है कि लड़ी वाले पटाखे और बेरियम युक्त रसायनों से बने पटाखे जलाने पर पूरी तरह प्रतिबंध रहेगा.
5. ग्रीन पटाखे क्या होते हैं. ये सामान्य पटाखों से अलग कैसे होते हैं?
ये वो पटाखे हैं, जिन्हें वैज्ञानिक तथा औद्योगिक अनुसंधान परिषद (CSIR-NEERI) ने विकसित किया है. इन्हें इस तरह डिजाइन किया गया है कि ये जलने पर बहुत कम धुआं और हानिकारक गैसें छोड़ते हैं. सामान्य पटाखों की तुलना में इन ग्रीन पटाखों में बेरियम, आर्सेनिक, सीसा और मरकरी जैसे जहरीले रसायनों का इस्तेमाल नहीं होता.
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पारंपरिक पटाखों की तुलना में ये ग्रीन पटाखे 30 प्रतिशत तक धूल और धुआं कम उत्सर्जित करते हैं. इन पटाखों की पहचान के लिए उन पर विशेष क्यूआर कोड और NEERI का लोगो लगा होता है, जिससे उनकी प्रामाणिकता की जांच की जा सकती है.
6. क्या ग्रीन पटाखे चलाने से वायु प्रदूषण में कमी आ सकती है?
इस सवाल का जवाब हां है. ग्रीन पटाखे वायु प्रदूषण को पूरी तरह 'खत्म' तो नहीं करते, लेकिन उसके नुकसान को काफी घटा देते हैं. सामान्य पटाखों के मुकाबले ग्रीन पटाखों से होने वाला नुकसान भी काफी कम होता है. एक स्टडी के मुताबिक, अगर आतिशबाजी की चाह रखने वाले सभी लोग दीवाली पर केवल प्रमाणित ग्रीन पटाखों का इस्तेमाल करते हैं तो उस रात प्रदूषण में 30-40 प्रतिशत तक कमी आ सकती है. प्रदूषण कम करने का यह बेहतर विकल्प तो हो सकता है लेकिन इसे पूरा समाधान नहीं माना जा सकता.