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यमन के हूती विद्रोहियों ने अब कोई लाग-लपेट नहीं रखी है. समूह के राजनीतिक ब्यूरो के सदस्य मोहम्मद अल-बुखैती ने खुलकर कहा कि हूती, सऊदी अरब के भीतर मोहम्मद बिन सलमान यानी MBS को सत्ता से हटाने की किसी भी कोशिश का समर्थन करेंगे, चाहे वह जनआंदोलन से हो, राजनीतिक विपक्ष से हो या फिर खुद शाही परिवार के भीतर से. भले ही नतीजे में कोई दूसरा सऊदी शहजादा ही गद्दी पर क्यों न बैठे. उन्होंने यह चेतावनी भी दी कि अगर अमेरिका यमन के खिलाफ इस जंग में सीधे कूदा, तो क्षेत्र में अमेरिकी हितों पर तेज और पीड़ादायक जवाबी हमला होगा.
अक्टूबर की शुरुआत से हूती लड़ाकों ने सऊदी अरब के कई एयरपोर्ट पर हमले काफी तेज कर दिए हैं. सिर्फ पहले दो हफ्तों में रियाद इंटरनेशनल एयरपोर्ट चार बार निशाना बना और 20 से ज्यादा लोगों की जान गई. इसे खाड़ी क्षेत्र में फरवरी में शुरू हुए ईरान-युद्ध के बाद की सबसे घातक घटना माना गया है. यानी खाड़ी के सबसे अमीर और सबसे ताकतवर देशों में गिने जाने वाले सऊदी अरब की अपनी राजधानी ही असुरक्षित होती दिख रही है.
ऊपर से 18 अक्टूबर के आसपास अप्रैल से लागू और दो बार बढ़ाया गया यमन का संयुक्त राष्ट्र-मध्यस्थता वाला छह महीने का युद्धविराम भी बिना किसी नई डील के खत्म हो गया है. हूती के सैन्य प्रवक्ता याह्या सरी ने तो सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात में काम कर रही तेल कंपनियों को वहां से निकल जाने तक की चेतावनी दे डाली है.
हूती के इस बयान को अलग-थलग करके नहीं देखा जा सकता. इसी गर्मी में ईरान ने अपनी सुरक्षा नीति में बड़ा बदलाव किया था और कहीं ज्यादा आक्रामक रुख अपना लिया था. ईरान की सुप्रीम नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल के सचिव मोहसिन रजई ने हाल ही में दोहराया कि ईरानी कूटनीति अब बदल चुकी है और फरवरी-पूर्व की स्थिति में वापसी नहीं होगी. साफ संकेत है कि तेहरान अब सिर्फ अमेरिका-ईरान मोर्चे तक सीमित नहीं, बल्कि यमन सहित हर मोर्चे पर युद्ध खत्म करना चाहता है, वह भी अपनी शर्तों पर.
दिलचस्प बात यह है कि इन्हीं हमलों के बीच तेहरान ने रविवार को हूती और सऊदी अरब के बीच मध्यस्थता का प्रस्ताव भी रख दिया. यानी एक तरफ ईरान-समर्थित हूती सऊदी पर हमले तेज कर रहे हैं, तो दूसरी तरफ खुद ईरान सुलह कराने की पेशकश भी कर रहा है. यह दोहरी चाल क्राउन प्रिंस के लिए एक कूटनीतिक जाल जैसी बनती जा रही है.
एमबीएस के सामने अब मोटे तौर पर दो ही विकल्प बचे हैं और दोनों में जोखिम है. पहला, तेहरान या हूती के साथ सीधी बातचीत शुरू करें, जो उनकी अब तक की सख्त छवि के उलट जाएगा. दूसरा, सैन्य कार्रवाई और तेज करें, उसी रास्ते पर जो 2015 से 2022 तक सात साल चलकर भी किसी ठोस नतीजे तक नहीं पहुंच पाया था.
दिलचस्प यह भी है कि इसी दौरान इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की सरकार ने हूती के खिलाफ सऊदी अरब के साथ मिलकर संयुक्त सैन्य कार्रवाई का प्रस्ताव रखा, जिसे एमबीएस ने ठुकरा दिया. जाहिर है, सऊदी अरब फिलहाल क्षेत्रीय समीकरणों को इजरायल से जोड़कर और नहीं उलझाना चाहता.
अभी तक एमबीएस ने सैन्य विकल्प ही चुना है, लेकिन 2015 के मुकाबले आज वे कहीं ज्यादा कमजोर स्थिति में हैं. तब अमेरिका से अरबों डॉलर के हथियार लगातार मिल रहे थे. आज रियाद में कुछ अमेरिकी सैन्य और खुफिया अधिकारी जरूर मौजूद हैं, लेकिन ट्रंप प्रशासन ने अब तक एमबीएस की अतिरिक्त सैन्य मदद की मांगों को टाल रखा है.
पिछले साल अमेरिकी हवाई हमलों ने हूती को कमजोर करने के बजाय अमेरिका के अपने गोला-बारूद भंडार को ही खाली किया और सात हफ्तों के बमबारी अभियान के बाद आखिरकार संघर्ष-विराम करना पड़ा. मिड-टर्म चुनाव नजदीक होने के कारण ट्रंप का हूती मोर्चे पर नए सिरे से उलझने का कोई इरादा नहीं दिखता, जिससे फिलहाल एमबीएस अकेले पड़ गए हैं, और हूती इसे अपने लिए सुनहरा मौका मान रहे हैं.
इतिहास में ऐसे मौके दुर्लभ नहीं हैं जब अमेरिकी समर्थन में आई मामूली-सी कमी ने भी बड़ा उलटफेर खड़ा कर दिया हो. 1979 की ईरानी क्रांति इसकी सबसे बड़ी मिसाल है. शाह के पतन के कई लंबे कारण थे, लेकिन एक अहम ट्रिगर यह धारणा बनी कि राष्ट्रपति कार्टर का समर्थन अब बिना शर्त नहीं, बल्कि मानवाधिकार सुधारों की शर्त पर टिका है. 1977 के मध्य से बनी इसी धारणा ने शाह के विरोधियों को एकजुट कर दिया और हालात धीरे-धीरे बेकाबू होते चले गए.
यह कहना अभी जल्दबाजी होगी कि ट्रंप की मौजूदा झिझक से वैसा ही कोई नतीजा निकलेगा, लेकिन यह ऐतिहासिक समानता नजरअंदाज करने लायक भी नहीं है. सत्ता के खिलाफ खड़े गुटों के लिए बाहरी समर्थन का कमजोर पड़ना अक्सर जमीनी हालात जितना ही असर मनोवैज्ञानिक स्तर पर डालता है.
एमबीएस की मुश्किलें यहीं खत्म नहीं होतीं. पिछले कुछ हफ्तों में हूती ने यमन के रेड सी तट पर सऊदी-समर्थित सरकारी सेनाओं के खिलाफ जमीनी बढ़त भी बनाई है, यही असली वजह है कि दबाव अचानक इतना बढ़ गया. साथ ही हूती 2015 के मुकाबले, खासकर 2022 के संघर्ष-विराम के बाद से, सैन्य तौर पर कहीं ज्यादा मजबूत हो चुके हैं. अब उनके पास सिर्फ पुराने ढंग के रॉकेट नहीं, बल्कि 2,500 किलोमीटर तक मार करने वाले एडवांस्ड ड्रोन और लगातार सटीक होती जा रही क्रूज मिसाइलें भी हैं. यही वजह है कि बीते महीने सऊदी ऊर्जा ठिकानों और एयरपोर्ट पर इतने हमले हो सके.
हूती के हथियारों के पुर्जे यमन के भीतर तस्करी के जरिए पहुंचते हैं और वहीं जोड़े जाते हैं, जिससे समुद्री या जमीनी रास्ते से इन्हें रोक पाना लगभग नामुमकिन हो गया है. इसमें एक नया और चिंताजनक आयाम भी जुड़ गया है, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी AI का इस्तेमाल. पिछले महीने AI कंपनी एंथ्रॉपिक ने अपनी एक रिपोर्ट में खुलासा किया कि उत्तरी यमन में चल रहा एक हथियार-विकास कार्यक्रम उसके AI मॉडल Claude का इस्तेमाल प्रोजेक्टाइल के उड़ान पथ और सटीकता को बेहतर बनाने के लिए कर रहा था.
कंपनी के मुताबिक उसके सुरक्षा उपायों ने ज्यादातर कोशिशों को रोका, लेकिन सभी को नहीं. यह घटना साफ इशारा है कि आने वाले संघर्षों में AI किस तरह गैर-राष्ट्रीय ताकतों के हाथ का भी एक नया हथियार बन सकता है.
इस पूरे घटनाक्रम का सीधा असर सऊदी अर्थव्यवस्था और एमबीएस के महत्वाकांक्षी सुधार कार्यक्रम पर भी पड़ रहा है, जिसके तहत वे देश को तेल पर निर्भरता से निकालकर पर्यटन और वैश्विक निवेश का केंद्र बनाना चाहते हैं. सऊदी एक्सचेंज-ट्रेडेड फंड यानी ETF फरवरी में ईरान-युद्ध शुरू होने के बाद भी टिका रहा था, लेकिन पिछले एक महीने से लगातार गिर रहा है और हाल ही में एक अहम तकनीकी सपोर्ट लेवल भी तोड़ चुका है. गौर करने वाली बात यह है कि यह गिरावट ठीक उसी दौर में शुरू हुई जब हूती ने बाब-अल-मंदेब जलडमरूमध्य पर अपनी पकड़ मजबूत की.
सऊदी सेंट्रल बैंक यानी SAMA के आंकड़े भी चिंता बढ़ाने वाले हैं. जुलाई में सऊदी के वस्तु निर्यात में सालाना आधार पर 17.2% की गिरावट दर्ज हुई, जबकि व्यापार अधिशेष 25% तक घट गया. मार्च के बाद से विदेश में रखी सऊदी मुद्रा और जमा राशि में भी करीब 18% की कमी आई है. अगर नाकाबंदी लंबी खिंचती है, तो इसका असर सऊदी के करीब 140 अरब डॉलर के अमेरिकी ट्रेजरी बॉन्ड्स तक भी पहुंच सकता है. साथ ही, अमेरिका में AI, सेमीकंडक्टर और डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर में किए गए अरबों डॉलर के निवेश वादों पर भी खतरा मंडरा सकता है.
एमबीएस की चुनौतियां सिर्फ बाहरी नहीं हैं. सऊदी अरब का अपना इतिहास भी शाही परिवार के भीतर से उठे खतरों से भरा है. 1975 में किंग फैसल की हत्या उनके ही भतीजे ने महल के भीतर गोली मारकर कर दी थी. 2017 की वह रात, जिसे रिट्ज-कार्लटन की रात कहा जाता है, जब दर्जनों प्रभावशाली शाही सदस्यों को नजरबंद कर उनकी संपत्ति जब्त कर ली गई थी, आज भी शाही परिवार के भीतर गहरी नाराजगी की वजह बनी हुई है. अमेरिकी अखबार वॉल स्ट्रीट जर्नल की हालिया रिपोर्ट के मुताबिक एमबीएस अब बंकरों से लैस सुरक्षित महलों के बीच लगातार ठिकाना बदल रहे हैं, जिसे सिर्फ हूती हमलों से नहीं बल्कि भीतरी खतरे से बचाव का संकेत भी माना जा रहा है.
भारत के लिए इसमें एक सीधा सबक छिपा है. मध्य-पूर्व अब तक भारत समेत पूरी दुनिया के लिए एक भरोसेमंद और स्थिर ऊर्जा स्रोत माना जाता रहा है, लेकिन यह संकट उस भरोसे को कमजोर कर रहा है. आने वाले वर्षों में भारत, दक्षिण-पूर्व एशिया और ऑस्ट्रेलिया जैसे बड़े ऊर्जा आयातक देशों के लिए सौर, पवन, परमाणु और यहां तक कि कोयले जैसे घरेलू ऊर्जा स्रोतों को तेजी से बढ़ाना अब विकल्प नहीं बल्कि जरूरत बनता जा रहा है.
यह भी साफ नहीं है कि नाराज शाही परिवार का कोई हिस्सा हूती की इस खुली पेशकश, यानी सत्ता परिवर्तन में समर्थन की बात, को कितनी गंभीरता से लेगा. बाजार आधारित पूर्वानुमान भी यही संकेत देते हैं कि 31 अक्टूबर तक सऊदी-हूती सीजफायर की संभावना महज पांच फीसदी के आसपास आंकी जा रही है, यानी सऊदी अरब और पूरे खाड़ी क्षेत्र में स्थिरता की गारंटी फिलहाल कहीं नजर नहीं आती.