जहां वक्त भी ठहर गया: दुनिया बदली, दौर बदले... 570 साल बाद भी नहीं बदला मिजाज! 'ग्रैंड बाजार', जिसका इतिहास आज भी जिंदा
ऐतिहासिक शहर इस्तांबुल की ग्रैंड मार्केट की गिनती दुनिया के सबसे बड़े और पुराने बाजारों में होती है. इसका इतिहास 15वीं शताब्दी से जुड़ता है. यहां की चमक-दमक में करीब 600 साल बाद भी रत्ती भर कमी नहीं आई है.
अगर आप उनमें से हैं, जिन्हे खुद को एक्स्प्लोर करते हुए इतिहास जानने का शौक है, इसके साथ-साथ शॉपिंग का कीड़ा भी हर वक्त दिमाग में कुलबुलाता रहता है तो अब हम आपको दुनिया की उस मार्केट के बारे में बताने जा रहे हैं, जो है तो करीब 600 साल पुरानी, लेकिन जिसका जलवा आज भी कायम है. सदियां बीतने के बावजूद इसका आकर्षण इतना जबरदस्त है, जो सातों महाद्वीपों के लोगों को अनायास अपनी ओर खींच लेता है. तुर्किये के ग्रैंड बाजार की गिनती दुनिया के सबसे पुराने और बड़े बाजारों में होती है. आइए इस खूबसूरत बाजार के बारे में आपको सबकुछ बताने के साथ तस्वीरों के जरिए इसे आपकी कल्पना में सजाने की कोशिश करते हैं.
इस्तांबुल का एवरग्रीन 'ग्रैंड बाजार'
यूं तो दुनिया का सबसे बड़े बाजार का टैग चीन के Yiwu कमोडिटी मार्केट के पास है, जो सबसे बड़ा ग्लोबल होलसेल मार्केट भी है. करीब सात किलोमीटर लंबा ये बाजार करीब 1480 एकड़ में फैला है, लेकिन इसकी चमक भी तुर्किये के ऐतिहासिक शहर इस्तांबुल के ग्रैंड बाजार के आगे फीकी दिखती है.
ग्रैंड बाजार की यूएसपी
आपने दिल्ली की पालिका बाजार समेत देशभर के तमाम कवर्ड बाजार घूमे होंगे और वो आपको पसंद भी आए होंगे, इसके बावजूद यकीन जानिए कि इस्तांबुल की ग्रैंड बाजार घूमने के बाद आपको उनकी याद तक नहीं आएगी. क्योंकि ये मार्केट दुनिया का सबसे ऐतिहासिक और बड़ा कवर्ड मार्केट है.
वक्त बदला, राज बदला; रवायत नहीं बदली
वक्त भला किसके लिए ठहरा है, तुर्किये में बीते 600 सालों में न जाने कितने शासक आए और गए यानी राज बदलते रहे, लेकिन यहां की ऐतिहासिक रवायतें नहीं बदलीं. इस बाजार की सदियों पुरानी कारीगरी की पहचान आज भी कायम है. इसकी किसी गली में बेशकीमती नगीने तराशे जाते हैं, तो कहीं हाथों से कालीन बुने जाते हैं. यहां सदियों पुराने हुनर आज भी जिंदा हैं.
यहां सिर्फ खरीदारी नहीं होती, यहां की गलियों में तरह-तरह की खास कारीगरी की रवायत वैसे ही चली आ रही है, जैसी करीब 6 सदी पहले हुआ करती थी.
रोजाना लाखों लोग इसका शाही इतिहास और चमक-दमक देखने-समझने के साथ खरीददारी करने आते हैं.
चमचमाती दुकानों मैं मौजूद सैलानियों की भीड़ के पीछे एक ऐसी दुनिया भी छिपी है, जो सदियों से अपने हुनर, साझा विरासत और कारोबार की परंपरा को सहेजे हुए है.
ऐतिहासिक बाजार का इतिहास
यहां कभी तुर्की के अलग-अलग धार्मिक समुदायों के कारीगर एक साथ काम करते थे. जिनमें यूनानी, आर्मेनियाई, यहूदी, सीरियाई और अन्य समुदायों के लोग भी थे. जो एक-दूसरे के साथ मिलकर काम करते थे. उनके बीच कारोबार के ऐसे रिश्ते बने, जो पीढ़ियों तक कायम रहे. कारोबार की इस साझी विरासत ने इस ग्रैंड बाजार को ऐसी संजीवनी बूटी खिलाई जिसकी वजह से सदियों बाद भी यहां का इतिहास जिंदा यानी जीवंत दिखता है.
ग्रैंड बाजार की नींव 1453 के बाद पड़ी. उस दौर में यहां ऑटोमन साम्राज्य का राज थी. जिसके सुल्तान मेहमद द्वितीय ने दूसरे साम्राज्य के बड़े इलाके पर कब्जा करने के बाद इस बाजार की स्थापना कराई.
मेहमद द्वितीय को विजेता सुल्तान के नाम से भी जाना जाता था. वो तरक्की पसंद सुल्तान था. जिसे ऐसे बाजार की जरूरत थी, जो उसके साम्राज्य के विस्तार के लिए फंड जुटाने के साथ, शहरों में रहने वाले अलग-अलग समुदायों की जरूरतें भी पूरी कर सके.
भूकंपों से लेकर बदलते दौर तक का सामना
समय के साथ ग्रैंड बाजार का विस्तार होता गया. सदियों पुराने बाजार ने कई बार बड़े भूकंपों तक का सामना किया, लेकिन वो भी इसका अस्तित्व मिटा नहीं सके. धीरे-धीरे ग्रैंड बाजार तुर्किये के पारंपरिक कारोबार का प्रमुख केंद्र बन गया. ये बाजार कारीगरों की कई पीढ़ियों के हुनर निखारने की जगह भी बन गया.
इसकी गलियां भी अपने आप में खास हैं. जो एक-दूसरे को काटती हुई आगे बढ़ती हैं. ऑटोमन कला इतिहासकार मुस्तफा जेजार के मुताबिक, इन गलियों की बनावट इतनी व्यवस्थित थी कि उनकी तुलना सैनिकों की बैरकों यानी छावनियों से की जा सकती थी.
समय के साथ बाजार की अलग-अलग गलियां खास तरह के कारोबार के लिए पहचानी जाने लगीं. कहीं सोने-चांदी के गहने बनते और बिकते थे, तो कहीं हीरे-मोती-माणिक्य जैसे रत्नों का काम होता था. तरह-तरह के कारोबार के आधार पर इस बाजार की गलियों का नामकरण होता गया. यहां पर कहीं चमड़े का सामान मिलता है, तो जगह-जगह पारंपरिक स्मृति-चिह्न और हाथ से बुने कालीन बिकते हैं. विदेशों में यहां के प्रोडक्ट्स की भारी डिमांड है.
इतिहास के नजरिए से कैसे देखें
इतिहास की किताबों के पन्नों को पलटने पर पता चलता है कि जब ग्रैंड बाजार बना था तब भारत में मुगल साम्राज्य की स्थापना करने वाला बाबर पैदा भी नहीं हुआ था. ओटोमन सुल्तान मेहमद द्वितीय जब इस बाजार को बनवा रहा था, तब दिल्ली पर लोदी वंश का शासन था, जिसका शासक सुल्तान बहलोल लोदी था. यानी जब पानीपत की जंग जीतकर बाबर ने मुगलवंश की स्थापना की तब तक ये बाजार 70 साल पुराना हो चुका था.
समय ठहर गया!
हालांकि, 'ग्रैंड बाजार' की दुकानों का रूप समय के साथ बदलता रहा. विदेशी पर्यटकों की पसंद बदली, तो दुकानदारों ने भी अपने सामान और कारोबार के तरीके बदले. लेकिन इन दुकानों के पीछे बनी मोटी पत्थर की दीवारों ने बाजार की पुरानी पहचान को अब तक संभालकर रखा है. इस बाजार के चप्पे-चप्पे से वाकिफ स्थानीय नागरिक बर्कसोय बताते हैं कि इस बाजार की असली आत्मा इन्हीं दीवारों के पीछे बसती है.
बिजनेस हब
यहां 4,000 से अधिक दुकानें हैं. यहां मिलने वाले पारंपरिक फूड आइटम जैसे मसाले और पारंपरिक व्यंजनों के अलावा तुर्किये की विश्व प्रसिद्ध कालीन, आभूषण और हस्तशिल्प से बनी चीजें पूरी दुनिया में पसंद की जाती हैं. यहां से लाखों-करोड़ों का कारोबार होता है. ग्रैंड बाजार आज भी दुनिया की सबसे पॉपुलर मार्केट है. इसे दुनिया की अलग-अलग एजेंसियों की टॉप रैंकिंग मिल चुकी है.
Travel And Tour World 2026 की ग्लोबल रैंकिंग के मुताबिक ब्रिटेन की राजधानी लंदन दुनिया का नंबर-1 शॉपिंग डेस्टिनेशन है. इसके बाद इटली के मिलान और अमेरिका के न्यूयार्क के बाजारों का नंबर आता है. लेकिन इन शहरों के बाजारों में घूमने जाने वालों की बात तो छोड़िए, घुमक्कडी के शौकीनों की फेवरेट डेस्टिनेशन लिस्ट/विश लिस्ट में इस्तांबुल का 'ग्रैंड बाजार' जरूर होता है.