बच्चा बोले- 'थैंक यू', दादा कहें 'प्लीज', बंगाल के इस गांव में बोली जाती है सिर्फ इंग्लिश
जरा सोचिए आप हिंदुस्तान की एक ऐसी जगह पर हैं, जहां हल चलाता हुआ किसान अंग्रेजी बोल रहा है. स्कूल जाते हुए छोटे बच्चे भी फर्राटेदार इंग्लिश में बात कर रहे हैं. जी हां. ऐसी जगह है बंगाल में. आज हम उसी की कहानी आपको बता रहे हैं.
अकसर इंग्लिश को स्कूल या कॉलेज का सब्जेक्ट या फिर शहर या विदेश में नौकरियों के लिए जरूरी हुनर माना जाता है. लेकिन जरा सोचिए कि यही लैंग्वेज किसी गांव की रोजमर्रा की जिंदगी में ही घुस जाए? हम बात कर रहे हैं पश्चिम बंगाल के मालदा जिले के कालियाचक की. यहां के पुरखों ने बहुत पहले ही अंग्रेजी सिखाने को ही रोजगार और शिक्षा का जरिया बना लिया था. इसी से इस गांव की अलग पहचान बनी. अगर कहें कि घर पर ट्यूशन और स्पोकन इंग्लिश की क्लास से लेकर IELTS की तैयारी और ऑनलाइन टीचिंग की बदौलत उन्होंने लोकल एजुकेशन इकोनॉमी डेवलप कर ली है तो यह गलत नहीं होगा.
इसकी किसी जमाने में शुरुआत अलग-अलग टीचरों के अपनी जानकारी अगली पीढ़ी तक पहुंचाने से हुई थी, वह धीरे-धीरे एक ऐसे नेटवर्क में बदल गई है जो आज कालियाचक को पूरे भारत और विदेशों के छात्रों और मौकों से जोड़ रही है.
सोचिए आप भारत के किसी गांव में घूम रहे हों तो आप खेती, लोकल बिजनेस और रोजमर्रा की जिंदगी के बारे में सुनने की उम्मीद करेंगे. लेकिन कालियाचक में अंग्रेजी वहां की संस्कृति का ही हिस्सा बन गई है.
इस गांव में अंग्रेजी सिर्फ स्कूलों या क्लास की किताबों तक ही सिमटी नहीं हुई है. यहां बच्चे स्पोकन इंग्लिश सीखते हैं, छात्र कॉम्पिटिटिव एग्जाम और IELTS की तैयारी करते हैं, और टीचर अपने घरों से क्लास चलाते हैं. कुछ परिवारों में, अंग्रेजी सिखाना एक ऐसी परंपरा बन गई है, जो एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक चली आ रही है.
कैसे अंग्रेजी बनी कालियाचक की पहचान
कालियाचक में छोटे ट्यूशन सेंटर और घर पर चलने वाली क्लास उन छात्रों की जरूरतें पूरी करती हैं जो अपनी अंग्रेजी बेहतर करना चाहते हैं. कई परिवारों के लिए, यह सफर एक पीढ़ी के भाषा सीखने और फिर उस जानकारी का इस्तेमाल दूसरों को सिखाने के लिए करने से शुरू हुआ. समय के साथ, सिखाना एक पेशा बन गया और यह हुनर परिवार के युवा सदस्यों तक पहुंचाया गया.
आज, कुछ टीचर लोकल इलाके के छात्रों के लिए क्लास चलाते हैं, जबकि दूसरे ऑनलाइन पढ़ाते हैं और भारत के अलग-अलग हिस्सों और यहां तक कि विदेशों में भी सीखने वालों तक पहुंचते हैं. नतीजा यह है कि गांव के अंदर ही एक एजुकेशन इकोसिस्टम बन गया है.
कालियाचक से देश के बाकी हिस्सों तक फैले
कालियाचक के अंग्रेजी टीचरों की पहुंच सिर्फ गांव तक सीमित नहीं है. कुछ लोग टीचिंग से जुड़ी नौकरियों और दूसरे प्रोफेशनल मौकों के लिए दिल्ली, मुंबई और बेंगलुरु जैसे शहरों में चले गए हैं. दूसरों ने अपने हुनर का इस्तेमाल विदेशों में किया है, जबकि ऑनलाइन टीचिंग ने कुछ टीचरों को गांव छोड़े बिना छात्रों के साथ काम करने का मौका दिया है.
घर से ही मिलती है अंग्रेजी की तालीम
कालियाचक में भाषा सीखने का कल्चर सिर्फ ट्यूशन सेंटरों तक ही सीमित नहीं है. कई माता-पिता बच्चों को घर पर अंग्रेजी बोलने के लिए कहते हैं, जिससे उन्हें रोजमर्रा की स्थितियों में भाषा का अभ्यास करने का मौका मिलता है. डिबेट और लोकल लेवल पर होने वाले कॉम्पिटिशन भी स्टूडेंट्स को इंस्पायर करते हैं. इस नजरिए का मतलब है कि अंग्रेजी को सिर्फ एग्जाम के लिए पढ़े जाने वाले सब्जेक्ट के तौर पर नहीं सिखाया जाता.
कालियाचक और उसके आसपास के एजुकेशन इंस्टिट्यूट भी गांव के सीखने के माहौल को बेहतर बनाते हैं.
ये आसपास के इलाकों से छात्रों को आकर्षित करते हैं और नए टीचर्स को तैयार करते हैं. इनमें से कुछ छात्र आगे चलकर खुद टीचिंग के पेशे में आ जाते हैं, जिससे एक ऐसा चक्र बनता है जिसमें सीखने वाले शिक्षक बन जाते हैं और अगली पीढ़ी को पढ़ाते हैं.
लीची और आम के लिए फेमस है मालदा
यह सही है कि अंग्रेजी पढ़ाने से कालियाचक को एक खास पहचान मिली है, लेकिन यह वहां के निवासियों की आजीविका का इकलौता जरिया नहीं है.
खेती, स्थानीय कारोबार और पारंपरिक बिजनेस भी इलाके की अर्थव्यवस्था में अहम भूमिका निभाते हैं. मालदा खास तौर पर अपने आम और लीची के लिए जाना जाता है, जबकि रेशम और जूट से जुड़े कारोबार भी स्थानीय लोगों की आजीविका में मदद करती हैं. इससे कालियाचक की कहानी अंग्रेजी के लिए बनी उसकी पहचान से कहीं ज्यादा बड़ी हो जाती है.
आखिरकार, यह कहानी इस बारे में है कि कैसे किसी समुदाय में विकसित हुआ कोई कौशल धीरे-धीरे शिक्षा, रोज़गार और अवसरों का जरिया बन सकता है, जबकि खेती, व्यापार और पारंपरिक पेशे भी साथ-साथ चलते रहते हैं.