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सलाखों के पीछे बैठे कैदी कैसे बचाएंगे बेजुबान पशुओं की जिंदगी? नर्मदापुरम जेल की अनोखी पहल

नर्मदापुरम जेल प्रशासन की अनोखी पहल देखने को मिली है. जेल में बंद कैदियों को आवारा बेजुबान पशुओं की जिंदगी को बचाने के लिए उतारा गया है. आइए जानते हैं, कि कैदी किस तरह से इस काम को कर रहे हैं.

Written ByManish Kushawah
Published: Oct 08, 2026, 05:39 PM IST|Updated: Oct 08, 2026, 05:42 PM IST
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सलाखों के पीछे बैठे कैदी कैसे बचाएंगे बेजुबान पशुओं की जिंदगी? नर्मदापुरम जेल की अनोखी पहल
Image Credit: ZEE NEWS

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Manish Kushawah

Manish Kushawah

मनीष कुशवाह डिजिटल पत्रकार हैं, जिन्हें टीवी और डिजिटल मीडिया में 5 वर्षों से अधिक का अनुभव है. वर्तमान में वे Zee News (MP-CG) की डिजिटल टीम में सब-एडिटर के रूप में काम कर रहे हैं. मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ की राजनीति, क्राइम, कृषि व्यवस्था और ग्रामीण (हाइपरलोकल) सरोकारों से जुड़ी खबरों की गहराई से कवरेज करना उनकी एक्सपर्टीज है.नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ मास कम्युनिकेशन (NIMC) से पत्रकारिता में डिप्लोमा पूरा करने के बाद मनीष ने मीडिया जगत में अपना सफर शुरू किया. ज़ी न्यूज़ से पहले उन्होंने News18 Hindi (Local18), इंडिया न्यूज़ और जनता टीवी जैसे प्रमुख समाचार चैनलों और डिजिटल प्लेटफॉर्म्स में काम किया है. इस दौरान उन्होंने न्यूज़ प्लानिंग, कंटेंट आइडिएशन और डेस्क मैनेजमेंट की अहम जिम्मेदारियां संभाली हैं. वे खबरों की प्रामाणिकता और ग्राउंड रियलिटी को प्राथमिकता देते हैं, ताकि पाठकों तक सटीक और भरोसेमंद जानकारी पहुंचे.मनीष कुशवाह से आप Manish2.Kumar@india.com पर ईमेल के माध्यम से संपर्क कर सकते हैं. इसके अलावा, एक्स (ट्विटर) और फेसबुक के जरिए भी उनसे सीधा संवाद कर सकते हैं.
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नर्मदापुरम से एक ऐसी तस्वीर सामने आई है, जो सोच बदलने पर मजबूर कर देगी. जिन हाथों ने कभी अपराध किया, वही हाथ अब सड़क पर घूमने वाले बेजुबान पशुओं की जिंदगी बचाने में जुटे हैं. नर्मदापुरम सेंट्रल जेल के बंदी निराश्रित पशुओं को रात में वाहन दुर्घटनाओं से बचाने के लिए रेडियम रिफ्लेक्टर बेल्ट तैयार कर रहे हैं. खास बात यह है कि जेल प्रशासन ने 5 हजार बेल्ट तैयार करने का लक्ष्य रखा है. जेल प्रबंधन के मुताबिक, मध्यप्रदेश में इस तरह का प्रयोग पहली बार नर्मदापुरम सेंट्रल जेल में किया जा रहा है. 5 हजार बेल्ट बनाने के लक्ष्य के साथ यह देश की पहली जेल होगी.

इस पहल की खास बात यह है कि बेल्ट तैयार करने के लिए किसी महंगी सामग्री का इस्तेमाल नहीं किया जा रहा है. जेल की रसोई से निकलने वाली पॉलीथिन, पुराने कंबल और कपड़ों के अनुपयोगी टुकड़ों से रस्सी तैयार की जा रही है. इसी रस्सी पर रेडियम रिफ्लेक्टर लगाए जा रहे हैं. एक बेल्ट तैयार करने में करीब 8 रुपये की लागत आ रही है. वाहन की हेडलाइट पड़ते ही बेल्ट पर लगा रिफ्लेक्टर चमकेगा, जिससे अंधेरे में सड़क पर बैठे या घूम रहे पशु वाहन चालक को दूर से दिखाई दे सकेंगे. इससे सड़क हादसों का खतरा कम करने में मदद मिलने की उम्मीद है.

क्यों लगा रहे हैं रिफ्लेक्टर
वहीं जेल प्रशासन का कहना है कि रेडियम रिफ्लेक्टर को इस तरह लगाने का प्रयास किया जा रहा है कि वह अलग-अलग दिशाओं से दिखाई दे. यानी रात में किसी भी दिशा से वाहन आने पर उसकी हेडलाइट पड़ते ही पशु के गले में लगी बेल्ट चमक सके. इस काम को करने के लिए बंदी रोजाना कई घंटों तक काम कर रहे हैं. हर महीने करीब 500 बेल्ट तैयार करने का लक्ष्य रखा गया है. कुल 5 हजार बेल्ट तैयार होने के बाद इन्हें खुली जेल के बंदियों की मदद से शहर की सीमा में घूमने वाले निराश्रित पशुओं को फ्री में वितरित किया जाएगा. इस अभियान में यातायात पुलिस की सहायता लेने की भी योजना है.

क्या बोले जेल अधीक्षक?
जेल अधीक्षक संतोष सोलंकी का कहना है कि यह पहल केवल पशुओं को सड़क हादसों से बचाने तक सीमित नहीं है. इसके जरिए बंदियों को सकारात्मक, सामाजिक गतिविधियों से जोड़ने का प्रयास भी किया जा रहा है. उन्होंने आगे कहा कि सजा पूरी करने के बाद बंदी दोबारा गलत रास्ते पर न जाएं, इसके लिए उन्हें रचनात्मक कार्यों से जोड़ा जा रहा है. गाय और कृषि से जुड़े बंदियों के पारंपरिक अनुभव का भी इस प्रयोग में इस्तेमाल किया जा रहा है. इस पहल के जरिए जेल की चारदीवारी के भीतर तैयार हो रही रेडियम बेल्ट अब सड़क पर बेजुबान पशुओं के लिए सुरक्षा का संकेत बनने की कोशिश करेगी.

(रिपोर्टः अभिषेक गौर, नर्मदापुरम)
 

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