तमिलनाडु में 69% आरक्षण मंजूर, तो MP में 27% OBC कोटा क्यों हुआ रद्द? समझिए 9वीं अनुसूची और 50% सीमा का संवैधानिक गणित
एमपी हाईकोर्ट ने ओबीसी आरक्षण को लेकर बड़ा फैसला सुनाया है. कोर्ट ने 2019 के 14% से 27% करने वाले कानून को रद्द कर दिया है. इसके पीछे की वजह जानने के लिए संविधान की 9वीं अनुसूची से लेकर 50% सीमा का गणित को भी समझिए.
मध्य प्रदेश में OBC आरक्षण को 27 फीसदी करने के फैसले पर हाईकोर्ट से मंजूरी नहीं मिली है. दरअसल, 2019 में तत्कालीन मुख्यमंत्री कमलनाथ के नेतृत्व वाली कांग्रेस की सरकार ने ओबीसी आरक्षण को 14 फीसदी से बढ़ाकर 27 फीसदी करने वाला कानून बनाया था. लेकिन इसे हाईकोर्ट ने असंवैधानिक करार देते हुए रद्द कर दिया है. इस तह से प्रदेश में फिर से ओबीसी कोटा की सीमा सिर्फ 14 फीसदी हो गई है.
लेकिन सवाल यह खड़ा हो रहा है कि देश के राज्य तमिलनाडु में 69% आरक्षण लागू है, तो मध्य प्रदेश में 27% वाला आरक्षण क्यों रद्द कर दिया गया है. क्या वहां पर 50% की सीमा लागू नहीं होती है, या फिर कानून में कोई ऐसा रास्ता है, जो उसे अलग बनाता है. इसके पीछे कई वजह हैं. इस पूरे मामले को समझने के लिए 9वीं अनुसूची, सुप्रीम कोर्ट के फैसलों और आरक्षण की 50% सीमा का गणित भी समझना बहुत जरूरी होगा.
किसने दायर की थी अपील
साल 2019 में कमलनाथ की सरकार ने ओबीसी आरक्षण को 14% से बढ़ाकर 27 फीसदी करने के लिए कानून में संशोधन किया था. इस फैसले को कोर्ट में चुनौती दी गई थी. आशिता दुबे और अन्य ने हाईकोर्ट में रिट याचिका संख्या 5901/2019 दायर की थी. मामला लंबे समय तक कानूनी विवाद में फंसा रहा. अब एमपी हाईकोर्ट ने इस संशोधन को असंवैधानिक करार देते हुए रद्द कर दिया है. इसके बाद से प्रदेश में आरक्षण की व्यवस्था से लेकर सरकारी भर्तियों को लेकर फिर से बहस शुरू हो गई है.
हाईकोर्ट ने आखिर क्या कहा
इस मामले पर कोर्ट ने सुनवाई करते हुए ओबीसी आरक्षण को 27 फीसदी तक बढ़ाने के लिए पर्याप्त संवैदानिक आधार है या नहीं. कोर्ट ने माना कि प्रदेश सरकार ऐसे असाधारण हालात और ठोस आंकड़े पेश नहीं कर पाई, जिनके आधार पर आरक्षण की 50 फीसदी सीमा पार करने को सही ठहराया जा सके. वहीं न्यायमूर्ति आनंद पाठक और न्यामूर्ति विनय सराफ की खंडपीठ ने स्पष्ट किया है कि प्रदेश में ओबीसी आरक्षण 14 फीसदी ही रहेगा.
50 फीसदी सीमा का क्या है गणित?
बता दें कि आरक्षण की 50 फीसदी सीमा का आधार सुप्रीम कोर्ट का 1992 का इंद्रा साहनी फैसला है. इस फैसले में कोर्ट ने कहा था कि सामान्य परिस्थितियों में कुल आरक्षण 50 फीसदी से ज्यादा नहीं होना चाहिए. हालांकि, कुछ परिस्थितियों में इस सीमा से आगे जाने की गुंजाइश पर भी चर्चा की गई थी. एमपी में ओबीसी कोटा 27% करने पर SC, SC और ओबीसी आरक्षण का कुल आंकड़ा 63 होता है. इसके अलावा, आर्थिक रूप से कमजोर यानी EWS के लिए 10 फीसदी कोटा जोड़ दिया जाए, तो यह जाकर 73 फीसदी तक पहुंच जाता है. इसी वजह से यह मामला लंबे समय तक कानूनी पेच में फंसा रहा.
तमिलनाडु को कैसे मिली छूट?
मिली जानकारी के मुताबिक, तमिलनाडु में 69% आरक्षण की व्यवस्था 1990 से चली आ रही है. इसे कानूनी सुरक्षा देने के लिए प्रदेश ने 1993 में आरक्षण कानून बनाया, जिसे 1994 में राष्ट्रपति ने मंजूरी दे दी थी. इसके बाद संसद ने 76वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1994 के तहत इस कानून को संविधान की 9वीं अनुसूची में शामिल कर दिया. यही वजह है कि तमिलनाडु में मामला, मध्य प्रदेश से काफी अलग है. हालांकि, 9वीं अनुसूची में शामिल होने का मतलब यह नहीं है कि कानून हर तरह की न्यायिक समीक्षा से हमेशा के लिए बाहर हो जाता है.
9वीं अनुसूची में क्या है ?
संविधान की 9वीं अनुसूची में शामिल कानूनों को अदालत में चुनौती से खास सुरक्षा मिलती है. इसे सुरक्षा कवच के रूप में कहा जा सकता है. लेकिन यह सुरक्षा पूरी तरह असीमित नहीं है. सुप्रीम कोर्ट ने 2007 का आईआर कोएल्हो बनाम तमिलनाडु राज्य फैसले में स्पष्ट कर दिया था कि 24 अप्रैल 1973 के बाद 9वीं अनुसूची में जोड़े गए कानूनों की भी न्यायिक समीक्षा हो सकती है. अगर वे संविधान के मूल ढांचे को नुकसान पहुंचाते हों. इसी संवैधानिक व्यवस्था के तहत तमिलनाडु के आरक्षण कानून को सुरक्षा मिली. इधर मध्य प्रदेश का 2019 का संशोधन 9वीं अनुसूची में शामिल नहीं था, इसलिए उसे सामान्य न्यायिक समीक्षा के दायरे में परखा गया.
इन भर्तियों का क्या होगा?
OBC आरक्षण विवाद की वजह से एमपी में कई सरकारी भर्ती प्रक्रिया के रिजल्ट 87 फीसदी पदों के जारी किए गए थे. लेकिन बाकी 13 फीसदी पदों को विवाद खत्म होने तक रोककर रखा गया था. इसी को 87:13 फार्मूले के नाम से जाना गया. हाईकोर्ट ने रोके 13 फीसदी पदों पर अनारक्षित वर्ग की चयन सूची के पात्र अभ्यर्थियों से नियुक्ति प्रक्रिया पूरी करने के निर्देश दिए हैं. इससे लंबे समय से परिणाम और नियुक्ति का इंतजार कर रहे युवाओं को राहत मिलने की उम्मीद है.
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अब सरकार क्या करेगी?
हालांकि, हाईकोर्ट के फैसल के बाद प्रदेश सरकार के पास एक और रास्ता है. अगर सरकार इस फैसले को चुनौती देना चाह रही है, तो सुप्रीम कोर्ट में अपील करने का कानून रास्ता खुला है. राहत पाने के लिए सरकार को अपनी दलीलों के समर्थन में कानूनी आधार और जरूरी तथ्य पेश करने होंगे. हाईकोर्ट ने अपने फैसले में इंद्रा साहनी मामले और मराठा आरक्षण से जुड़े जयश्री लक्ष्मणरव पाटिल मामले के सिद्धांतों का हवाला दिया. अब आगे की लड़ाई में अहम होगा कि सरकार 27 फीसदी ओबीसी आरक्षण के पक्ष में कौन से तर्क रखती है. उस पर सुप्रीम कोर्ट क्या रुख अपनाता है. वहीं हाईकोर्ट के वकील आदित्य सांघी ने कहा हाईकोर्ट के फैसले के बाद मामला सुप्रीम कोर्ट जा सकता है. क्योंकि कानूनी प्रक्रिया में हारने वाले पक्ष को अपील करने का अधिकार होता है.
फैसले के सियासी मायने भी
ओबीसी आरक्षण को बढ़ाने का फैसला 2019 में कमलनाथ की सरकार ने लिया था. तभी से यह मुद्दा राजनीतिक चर्चाओं के बीच गर्म रहा. वहीं हाईकोर्ट के इस फैसले के बाद फिर से कांग्रेस-बीजेपी के बीच आरोप प्रत्यारोप दौर शुरू हो गया है. वहीं ओबीसी महासभा ने भी इस फैसले पर नाराजगी जताई है. ओबीसी महासभा की राष्ट्रीय कोर कमेटी के अध्यक्ष लोकेंद्र गुर्जर का कहना है कि इस फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने के लिए अपील करेंगे.
बीजेपी-कांग्रेस में जुबानी जंग
वहीं कांग्रेस ने भी सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल रखा है. कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष जीतू पटवारी का कहना है कि 27% ओबीसी आरक्षण पर आए इस फैसले के खिलाफ कांग्रेस पूरी ताकत से लड़ेगी. उन्होंने कहा कि सरकार और मुख्यमंत्री के हर षड्यंत्र को कांग्रेस बेनकाब करेगी. उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट में अपील कर पिछड़े वर्ग के अधिकार की आवाज उठाएंगे. वहीं बीजेपी प्रदेश उपाध्यक्ष सुरेंद्र शर्मा ने ओबीसी वर्ग के अधिकारों की रक्षा के लिए साथ खड़े रहने की बात कही है. उन्होंने कहा कि उनके अधिकारों के लिए एमपी सरकार प्रतिबद्ध है. आगे कहा कि पिछली सरकार ने आधी अधूरी तैयारी की थी. इस लिए यह फैसला आया है. आगे इस फैसले पर समीक्षा करने की भी बात कही है.