5 रुपये 12 आने की उधारी, मुंबई के बंगले पर क्यों लिखवाया था खंडवा? किशोर दा का वो सपना जो अधूरा रह गया; जानें MP से जुड़ी 5 अनसुनी कहानियां
हिंदी सिनेमा के सदाबहार गायक और अभिनेता किशोर कुमार का जन्म मध्य प्रदेश के खंडवा में हुआ था और मुंबई में रहने के बावजूद उनका दिल हमेशा खंडवा में ही बसता था. 13 अक्टूबर को किशोर दा की पुण्यतिथि के मौके पर मध्य प्रदेश से जुड़ी उनकी कुछ ऐसी अनसुनी और दिलचस्प कहानियां बता रहे हैं, जिनके बारे में बहुत कम लोग जानते हैं.
हिंदी सिनेमा के सदाबहार गायक और अभिनेता किशोर कुमार का मध्य प्रदेश से बहुत गहरा और अटूट रिश्ता था. किशोर दा का जन्म 4 अगस्त 1929 को मध्य प्रदेश के खंडवा में हुआ था और अपनी जन्मभूमि से बेइंतहा मोहब्बत करते थे. 13 अक्टूबर 1987 में सिर्फ 58 साल की उम्र में किशोर कुमार का मुंबई में निधन हो गया था. इसके बाद उनकी अंतिम इच्छा के अनुसार उनका पार्थिव शरीर खंडवा लाया गया और अंतिम संस्कार किया गया, जहां बाद में उनकी समाधि बनाई गई. आज भी उनकी पुण्यतिथि पर पर खंडवा में कई कार्यक्रमों का आयोजन होता है.
13 अक्टूबर को किशोर कुमार की पुण्यतिथि के मौके पर मध्य प्रदेश से जुड़ी उनकी कुछ ऐसी अनसुनी और दिलचस्प कहानियां बता रहे हैं, जिनके बारे में बहुत कम लोग जानते हैं. सिनेमा इतिहासकार अनिरुद्ध भट्टाचार्जी और वरिष्ठ पत्रकार पार्थिव धर की किताब 'Kishore Kumar: The Ultimate Biography' में किशोर दा के खंडवा प्रेम और उनकी शुरुआती जिंदगी से जुड़े कई किस्सों का विस्तार से जिक्र है.
दूध-जलेबी खाएंगे, खंडवा में बस जाएंगे... वो अटूट वादा, जो रह गया अधूरा
फिल्म जगत में अपार सफलता, शोहरत और मुंबई की चकाचौंध के बावजूद किशोर दा का दिल हमेशा खंडवा में ही बसता था. अक्सर वो सभी से कहा करते थे, 'दूध जलेबी खाएंगे, खंडवा में बस जाएंगे.' यह किशोर कुमार की रियल लाइफ का एक मशहूर डायलॉग नहीं था, बल्कि उनकी जिंदगी का अंतिम सपना भी था. वे मुंबई की चकाचौंध और शोर-शराबे से दूर अपने गृह नगर खंडवा में बस जाना चाहते थे. अपनी आखिरी सांसें खंडवा की गलियों में ही लेना चाहते थे. 13 अक्टूबर 1987 को जब मुंबई में निधन से कुछ ही समय पहले उन्होंने अपने परिवार से खंडवा लौटने और वहीं बसने की इच्छा जाहिर की थी.
'बॉम्बे टू गोवा' और 'दूध-जलेबी' की कसम
किशोर दा को खंडवा की दूध-जलेबी इतनी पसंद थी कि वे मुंबई में अपने दोस्तों को भी इसकी कहानियां सुनाया करते थे. साल 1972 में आई फिल्म 'बॉम्बे टू गोवा' की शूटिंग और गानों की रिकॉर्डिंग के समय उन्होंने निर्देशक और क्रू से साफ कह दिया था कि अगर उन्हें खंडवा की स्टाइल वाली दूध-जलेबी और पोहा खाने को मिले, तो वे और भी बेहतर मूड में गाएंगे. अनिरुद्ध भट्टाचार्जी और पार्थिव धर की राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता किताब 'Kishore Kumar: The Ultimate Biography' के अनुसार, किशोर दा अपनी जड़ों से इतने जुड़े थे कि जब भी मध्य प्रदेश से कोई उनसे मिलने आता, तो वे सिर्फ अपनी पसंदीदा मिठाइयों और पुरानी यादों की ही चर्चा करते थे. इतना ही नहीं, किशोर दा कहते थे- खंडवा से आए हो, तो वहां की नमकीन या मिठाई लाए कि नहीं?
मुंबई के बंगले का नाम रखा था 'गांगुली हाउस, खंडवा'
किशोर कुमार भले ही मुंबई के जुहू में एक बड़े बंगले में रहते थे, लेकिन उनको मन में हमेशा 'खंडवा' रहता था. मुंबई में उन्होंने अपने बंगले के बाहर नेमप्लेट पर साफ अक्षरों में लिखवाया था- 'गांगुली हाउस, खंडवा'. वे जब भी किसी इंटरव्यू या विदेश में कंसर्ट में जाते, तो गर्व से कहते थे कि वे मुंबई के नहीं, बल्कि मध्य प्रदेश के खंडवा शहर के रहने वाले हैं. उनके घर के बाहर लगे नेमप्लेट को देखकर बड़े-बड़े लोग भी हैरान रह जाते थे कि इतना बड़ा सुपरस्टार अपने जन्मस्थान को इस तरह अपने साथ समेटे हुए है.
इंदौर के क्रिश्चियन कॉलेज की मशहूर '5 रुपये 12 आने' की उधारी
इंदौर के क्रिश्चियन कॉलेज में '5 रुपये 12 आने' की उधारी और मशहूर गाने 'पांच रुपैया बारह आना' की दिलचस्प कहानी का जिक्र भी अनिरुद्ध भट्टाचार्जी की किताब में मिलता है. किशोर कुमार की पढ़ाई इंदौर के क्रिश्चियन कॉलेज में हुई. फिल्म 'चलती का नाम गाड़ी' के उनके मशहूर गाने 'पांच रुपैया बारह आना' के पीछे इंदौर की एक असल कहानी छिपी है. कॉलेज के दिनों में किशोर दा पर कॉलेज की कैंटीन वाले के 5 रुपये और 12 आने उधार रह गए थे. जब भी कैंटीन वाला उनसे पैसे मांगता, किशोर दा उसे टालने के लिए टेबल बजाकर तुकबंदी करते हुए गाने लगते थे- 'पांच रुपैया बारह आना...' आगे चलकर जब उन्होंने इंदौर कॉलेज की इस पुरानी याद को अमर बनाते हुए इस गाने में ढाल दिया.
खंडवा वाले 'गांगुली भवन' से बच्चों जैसा लगाव
खंडवा के बॉम्बे बाजार में उनका पैतृक मकान 'गांगुली भवन' उनके लिए किसी मंदिर से कम नहीं था. किशोर दा जब भी खंडवा आते, तो अपने बचपन के कमरों में फर्श पर सोते थे. वे अक्सर बिना किसी सुरक्षा और तामझाम के पुराने दोस्तों के साथ सड़क किनारे साइकिल पर घूमते दिख जाते थे. उनकी अंतिम इच्छा के अनुसार ही मुंबई में उनके निधन के बाद उनका पार्थिव शरीर खंडवा लाया गया और वहीं उनकी समाधि बनाई गई, जहां आज भी उनके चाहने वाले हर साल 13 अक्टूबर को दूध-जलेबी का भोग लगाने और उन्हें श्रद्धांजलि देने पहुंचते हैं.