मौत के भट्ठे: 14 घंटे काम, 400 रुपये मजदूरी, न मास्क, न सुरक्षा... कटनी में जहरीला धुआं फांकने को मजबूर मजदूर
कटनी में चूना भट्टों पर मजदूरों का शोषण करने का मामला सामने आया है. आरोप है कि मजदूरों से 12 से 14 घंटे काम करवाने के बाद भी मजदूरी नहीं जाती है. वहीं स्थानीय लोगों ने भी कई तरह के गंभीर आरोप लगाए हैं.
मध्य प्रदेश के कटनी जिले की औद्योगिक नगरी कहे जाने वाले कैमोर में खुलेआम श्रम कानूनों का उल्लंघन किया जा रहा है. देवसरी-मेहगांव में सालों पुराने चल रहे चूना भट्ठों में मजदूरों का शोषण होने की बात सामने आई है. आरोप है कि यहां पर 12 से 14 घंटे तक काम करवाया जाता है. बदले में सिर्फ 400 रुपए की दिहाड़ी दी जा रही है.
नियमों के मुताबिक, अगर किसी भी मजदूर या व्यक्ति से 8 घंटे से ज्यादा काम करवाया जाता है. बदले में कम मजदूरी दी जाती है, तो यह श्रम कानूनों का खुला उल्लंघन माना जाता है.
सुरक्षा के कोई इंतजाम ही नहीं
देवसरी-मेहगांव में महिला-पुरुष मजदूर नंगे पैर, बिना मास्क, ग्लव्स और हेलमेट के सिर पर तसला रखकर कोयला और चूना-पत्थर भट्टे में झोंक रहे हैं. भट्टे से निकलने वाली कार्बन मोनोऑक्साइड जैसी जहरीली गैस सीधे उनके फैफड़ों में जा रही है. बताया जा रहा है कि यहां पर न तो मेडिकल कैंप, न ही कोई इलाज की सुविधा है.
मजदूरों का कहना है कि यह भट्टा कटनी के रहे वाले पप्पू कुशवाहा का है. सीएम हेल्पलाइन 41002625 पर शिकायत करने के बाद भी कोई कार्रवाई नहीं की गई है. आगे बताया कि भट्ठा घनी आबादी के बीचों-बीच चल रहा है. दिन-रात निकलने वाले जहरीले धुएं से गांव में टीबी और सांस की बीमारियों से कई मौतें हो चुकी हैं. जांच के नाम पर सिर्फ खानापूर्ति होती है.
मजदूरों से जबरन वसूली भी
मजदूरों ने आरोप लगाते हुए कहा कि भट्ठा संचालक ने आदिवासियों की जमीन पर कब्जा कर रखा है. हफ्ते में शराब के नाम पर मजदूरों से जबरन वसूली भी की जाती है. एक मजदूर ओमकार ने बताया कि भट्ठी पर टाइल्स का काम करता है. उसे मजदूरी नहीं मिलती है. उसने आगे बताया कि यह रोजाना 8-9 घंटे काम करता है.
वहीं मजदूर ने सुरक्षा उपकरणों का जिक्र करते हुए बताया कि सुरक्षा के लिए उन्हें कोई मास्क या जूते नहीं दिए जाते हैं. सिर्फ गमछा लपेटकर काम चलाते हैं. स्वास्थ्य जांच या इलाज की वहां कोई सुविधा नहीं है. अपनी जांच अपने गांव में कराने के लिए आते हैं. मजदूर ने बताया कि यहां पर काम करने कुछ ही दिन पहले आए हैं.
प्रदूषण के चलते जीना मुश्किल
एक स्थानीय व्यक्ति अनूप शर्मा ने बताया कि यहां पर प्रदूषण के चलते रहना काफी मुश्किल हो गया है. पिछले 50 सालों से इंसान ठीक से जिंदा नहीं रह सकता है. अभी चार दिन पहले 50 साल के दो व्यक्तियों (भूरा सिंह और भान सिंह) की मौत हो गई है. इनके परिवार को सिर्फ 2000 रुपए की सहायता राशि दी गई है.
उन्होंने बताया कि इसकी शिकायत जब एसडीएम, कलेक्टर से की गई तो कोई नहीं सुना. अनूप शर्मा ने बताया कि भट्टे वालों के पास पावर है. जबकि गरीबों के पास खपड़े के मकान हैं और सरकार से किसी भी योजना का लाभ भी नहीं मिला है. उन्होंने कहा कि महंगाई के दौर में मजदूरों को दबा-धमकाकर सिर्फ 250-300 रुपए की मजदूरी दी जाती है.
स्थानीय युवक ने लगाए आरोप
स्थानीय युवक अंकित मिश्रा ने बताया कि इलाके में प्रदूषण की समस्या है. सड़क तक नहीं बनी हुई है. उनका आरोप है कि यहां गुंडई के दम पर काम कराया जाता है. उन्होंने कहा कि गांव के लोग यहां मजदूरी करने जाते हैं, जहां उन्हें 350 रुपये दिहाड़ी दी जाती है और 16 घंटे तक काम कराया जाता है. अगर कोई सामान चोरी हो जाता है, तो मजदूरों के पैसे काट लिए जाते हैं.
प्रदूषण अधिकारी सुधांशु तिवारी ने कहा कि नियमों के तहत श्रमिकों को मास्क, ग्लव्स, हेलमेट और सेफ्टी बूट उपलब्ध कराना अनिवार्य है. यदि जांच के दौरान नियमों का उल्लंघन पाया जाता है, तो संबंधित लोगों के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी.
(रिपोर्टः नितिन चावरे, कटनी)
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