इंदौर में गंदा पानी पीने से हुई मौतों पर सस्पेंड हुए IAS अफसर को 8 महीने बाद ही मिला प्रमोशन, बनाए गए कलेक्टर; रायसेन की कमान
गंदे पानी से इंदौर के भागीरथपुरा में हुई मौतों के मामले में निलंबित किए गए अधिकारी को 8 महीने बाद ही प्रमोशन मिल गया है और 2017 बैच के आईएएस रोहित सिसोनिया को रायसेन का कलेक्टर बनाया गया है. देश के सबसे साफ शहर इंदौर में गंदा पानी पीने से 36 लोगों की मौत के मामले में सरकार ने तत्कालीन एडिशनल कमिश्नर रोहित सिसोनिया को सस्पेंड किया था.
मध्य प्रदेश में मंगलवार देर रात बड़ा प्रशासनिक फेरबदल हुआ और 23 23 आईएएस अधिकारियों के तबादले किए, लेकिन एक आईएएस अधिकारी इसके बाद फिर चर्चा में आ गए हैं. देश के सबसे साफ शहर इंदौर के भागीरथपुरा इलाके में गंदा पानी पीने की वजह से लगभग 36 लोगों की दर्दनाक मौत के मौत के मामले में सस्पेंड किए गए आईएस अधिकारी को सरकार ने 8 महीने बाद ही प्रमोशन दे दिया है. 2017 बैच के आईएएस रोहित सिसोनिया को रायसेन का कलेक्टर बनाया गया है, जिनको इंदौर की घटना के बाद राज्य सरकार ने तत्काल प्रभाव से एडिशनल कमिश्नर (जल आपूर्ति) पद से निलंबित कर दिया था.
2017 बैच के आईएएस अधिकारी रोहित सिसोनिया अब तक उप सचिव के रूप में किसान कल्याण और कृषि विकास विभाग में अपनी सेवाएं दे रहे थे. अब उन्हें प्रमोट करते हुए रायसेन जिले का नया कलेक्टर नियुक्त कर दिया गया है. इसको लेकर राजनीतिक गलियारों में चर्चा तेज हो गई है और मध्य प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी ने सवाल उठाया है.
जीतू पटवारी ने क्या कहा?
जीतू पटवारी ने सवाल उठाते हुए ट्वीट किया, 'देश की पहली वाटर प्लस सिटी इंदौर के भागीरथपुरा में दूषित पानी की त्रासदी में 36 लोगों की मौत हुई. इस आपराधिक घटना के बाद हटाए गए प्रशासनिक अधिकारी रोहित सिसोनिया को मोहन यादव सरकार ने रायसेन कलेक्टर बना दिया है. भागीरथपुरा के पीड़ित परिवार आज भी न्याय और दोषियों पर कार्रवाई की प्रतीक्षा कर रहे हैं. बीजेपी सरकार पहले यह बताए कि जांच आयोग की रिपोर्ट पर क्या कार्रवाई हुई और संबंधित अधिकारी को कलेक्टर बनाने से पहले किन तथ्यों पर विचार किया गया? मध्य प्रदेश में तबादलों की पारदर्शिता पर पहले से सवाल उठ रहे हैं. ट्रांसफर उद्योग अब ट्रांसफर फैक्ट्री बन चुका है? महत्वपूर्ण पदस्थापनाओं में जवाबदेही के बजाय जुगाड़ को प्राथमिकता दी जा रही है! करप्शन/कमीशन के आरोप भी सबूत के रूप में सामने आते जा रहे हैं. मुख्यमंत्री जी, भागीरथपुरा के पीड़ितों को न्याय दीजिए. जांच रिपोर्ट सार्वजनिक कीजिए. जिम्मेदारी तय कीजिए.'
कुछ दिन पहले न्यायिक आयोग ने कही थी लापरवाही की बात
हाल ही में इस मामले की जांच के लिए गठित किए गए न्यायिक आयोग ने अपनी रिपोर्ट में प्रशासनिक लापरवाही को पूरी तरह से उजागर किया था. आयोग द्वारा सौंपी गई जांच रिपोर्ट के पन्नों में स्पष्ट तौर पर यह बात सामने आई थी कि उस समय जल आपूर्ति और टेंडर प्रक्रिया से जुड़ी वित्तीय और प्रशासनिक स्वीकृतियों में गंभीर स्तर पर कोताही बरती गई थी. रिपोर्ट के अनुसार, 5 करोड़ रुपये तक के टेंडर से जुड़ी वित्तीय अनुमोदन शक्तियां और प्रशासनिक निगरानी की मुख्य जिम्मेदारी उस वक्त के अतिरिक्त आयुक्त रोहित सिसोनिया के पास ही थी. इसके बावजूद, इतनी बड़ी त्रासदी के लिए सीधे तौर पर जिम्मेदार माने जाने वाले अधिकारी को कुछ ही महीनों के भीतर जिला कलेक्ट्रेट की जिम्मेदारी मिलना कई बड़े सवाल खड़े करता है.