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जिस उम्र में बच्चों के हाथों में किताबें होनी चाहिए और उन्हें शिक्षा का अधिकार मिलना चाहिए, उस उम्र में मध्य प्रदेश की कई मासूम बच्चियों का बचपन छीना जा रहा है. वर्ष 2023-24 की एक हालिया रिपोर्ट ने राज्य में बाल विवाह की भयावह सच्चाई उजागर की है. आंकड़ों के अनुसार, मध्य प्रदेश में 20 से 24 साल की उम्र की लगभग 20% महिलाओं यानी हर पांच में से एक लड़की की शादी 18 वर्ष की उम्र पूरी होने से पहले ही कर दी गई थी. इस रिपोर्ट का सबसे चिंताजनक पहलू शहरी और ग्रामीण इलाकों के बीच का भारी अंतर है. जहां शहरी क्षेत्रों में बाल विवाह का यह आंकड़ा 9% दर्ज किया गया है, वहीं ग्रामीण क्षेत्रों में यह आंकड़ा 23.4% दर्ज किया गया. यह स्थिति समाज और प्रशासन दोनों की कार्यशैली पर गंभीर सवाल खड़े करती है.
आगर मालवा में सबसे ज्यादा बाल विवाह
जिलेवार आंकड़ों में आगर मालवा की स्थिति सबसे चिंताजनक है. वहां बाल विवाह की दर 49.4% बताई गई है. इसका मतलब है कि उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, 20 से 24 साल की उम्र की लगभग आधी महिलाओं की शादी 18 साल की उम्र से पहले ही हो गई थी. इसके बाद बैतूल का नंबर आता है जहां यह दर 16.2% है, जबकि सतना और खंडवा में यह आंकड़ा लगभग 6% है. ये आंकड़े बताते हैं कि राज्य के अलग-अलग हिस्सों में बाल विवाह की स्थिति अलग-अलग है और कुछ जिलों में यह समस्या काफी गंभीर है.

राजगढ़ में सुधार, लेकिन फिर भी सवाल
राजगढ़ में ये आंकड़े असल में कम हुए हैं. इसका मतलब है कि जहां कुछ जिलों में इन आंकड़ों में बढ़ोतरी हुई है, वहीं कुछ में कमी भी देखी गई है. राजगढ़ के लिए यह आंकड़ा 46% है. छतरपुर में 16.7%, श्योपुर में 14.2%, रीवा में 13% और इंदौर व दतिया दोनों में 11% है. भले ही ये प्रतिशत आपको कम लगें, लेकिन सवाल यह है कि अगर बाल विवाह एक कानूनी अपराध है, तो ये आंकड़े क्यों हैं ? सिस्टम असल में कहां चूक रहा है? जमीनी हकीकत क्या है? और सबसे बड़ा सवाल यह है कि मध्य प्रदेश में बाल विवाह को कैसे रोका जा सकता है?
गांवों में स्थिति ज्यादा चिंताजनक क्यों?
शहरी इलाकों की तुलना में ग्रामीण इलाकों में बाल विवाह की घटनाएं काफी ज्यादा होती हैं. रिपोर्ट के अनुसार, ग्रामीण इलाकों में यह दर 23.4% है, जबकि शहरी इलाकों में यह 9% है. सामाजिक कार्यकर्ता अनीता शर्मा के मुताबिक, इसके पीछे कई सामाजिक और आर्थिक कारण हो सकते हैं. ग्रामीण इलाकों में एक बड़ी चुनौती यह है कि शिक्षा, कानूनों और सरकारी योजनाओं से जुड़ी जानकारी हर परिवार तक समान रूप से नहीं पहुंच पाती है. इसके अलावा गरीबी, सामाजिक दबाव और यह सोच कि बेटी की कम उम्र में शादी करने से माता-पिता की जिम्मेदारी पूरी हो जाती है, जैसी बातें भी बाल विवाह की प्रथा को बढ़ावा दे सकती हैं.वहीं कई परिवार अभी भी यह मानते हैं कि अगर उनके आस-पास की लड़कियों की कम उम्र में शादी हो रही है, तो उनकी अपनी बेटियों की शादी भी कम उम्र में ही कर देनी चाहिए.
क्यों नहीं रुक रहा बाल विवाह?
सरकार ने बाल विवाह को अपराध घोषित किया है और सुप्रीम कोर्ट ने भी कई बार इस मामले पर फैसले सुनाए हैं. फिर भी बाल विवाह का लगातार होना यह दिखाता है कि जागरूकता की भारी कमी है. आंकड़ों से पता चलता है कि ग्रामीण इलाकों में यह ज्यादा होता है, जिससे साफ है कि इन समुदायों तक कानून की जानकारी नहीं पहुंच रही है. अगर लोगों को जानकारी होती, तो वे शायद ऐसे विवाहों को रोकने के लिए कदम उठाते या पुलिस और प्रशासन को सूचित करते.

इन मामलों में राजगढ़ पहले सबसे आगे था, लेकिन अब वहां काफी सुधार हुआ है. लेकिन आस-पास के जिलों में बाल विवाह के आंकड़े लगातार बढ़ रहे हैं. इसे प्रशासन की एक बड़ी चूक माना जा सकता है, क्योंकि जरूरी जागरूकता अभियान गांव या क्षेत्रीय स्तर तक ठीक से नहीं पहुंच पाए हैं, जिसके कारण बाल विवाह की खबरें लगातार आ रही हैं. अब यह देखना बाकी है कि इस प्रथा पर कब रोक लग पाती है.
बाल विवाह के पीछे गरीबी भी बड़ी वजह
बाल विवाह के पीछे गरीबी को भी एक अहम वजह माना जा सकता है. कई गरीब परिवारों में बेटी की शादी को आर्थिक जिम्मेदारी के नजरिए से देखा जाता है. समाजसेवियों के अनुसार, कुछ माता-पिता का मानना है कि बेटी की शादी हो जाने के बाद उनकी जिम्मेदारी पूरी हो जाती है. अक्सर, समाज का दबाव भी परिवारों को ऐसा फैसला लेने के लिए मजबूर कर सकता है. बाल विवाह का मुद्दा सिर्फ कानून-व्यवस्था का मामला नहीं है. इसमें गरीबी, शिक्षा, सामाजिक सोच और जागरूकता जैसे कई आपस में जुड़े पहलू शामिल हैं.
प्रशासन की जिम्मेदारी क्या है?
बाल विवाह को रोकने में प्रशासन की अहम भूमिका होती है. सवाल यह उठता है कि सरकारी योजनाओं और कानूनों की जानकारी गांवों और दूर-दराज के इलाकों तक ठीक से क्यों नहीं पहुंच रही है. सरकार और प्रशासन ने बाल विवाह की सूचना मिलने पर कार्रवाई करने का संकल्प लिया है, और चर्चाओं में ऐसे मामलों में जिला-स्तरीय अधिकारियों को तेजी से कार्रवाई करने के निर्देश दिए जाने की बात भी सामने आई है. हालांकि, जमीनी स्तर पर निगरानी और जागरूकता, दोनों को मजबूत करने की जरूरत है. साथ ही जिम्मेदारी सिर्फ सरकार की नहीं है, बल्कि समाज की भी इसमें बराबर की जिम्मेदारी है. आखिरकार, लोगों की सोच बदलने में हम कहां चूक रहे हैं? ये आंकड़े समाज के लिए एक आईने की तरह हैं.
बाल विवाह कानूनन अपराध
बाल विवाह एक गंभीर कानूनन अपराध है, जो कोई भी इसे करवाता है या इसमें मदद करता है, उस पर कानून के अलग-अलग प्रावधानों के तहत कानूनी कार्रवाई की जाती है, जिसमें जेल की सजा जैसे दंड शामिल हैं. सुप्रीम कोर्ट, हाई कोर्ट और अलग-अलग इलाकों के प्रशासनिक अधिकारियों की ओर से जनता से लगातार अपील किए जाने के बावजूद, ऐसे मामलों का बने रहना चिंता का विषय है.
बाल विवाह रोकने के लिए क्या करना होगा?
कमियां कहां हैं?
बाल विवाह को रोकने के लिए सरकार, प्रशासन, स्कूलों, सामाजिक संगठनों और परिवारों को मिलकर काम करना होगा. सरकार और प्रशासन को यह जांचने की जरूरत है कि शिक्षा और महिला सशक्तिकरण के लिए कई योजनाएं लागू होने के बावजूद, जमीनी स्तर पर उनका असर उम्मीद के मुताबिक क्यों नहीं दिख रहा है, कमियां कहां हैं? इसका विश्लेषण किया जाना चाहिए. समाज को भी यह समझने की जरूरत है कि बेटियां बोझ नहीं होतीं.