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मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल के रिहायशी इलाकों में अवैध कमर्शियल गतिविधियों के बारे में सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के बाद नगर निगम ने सीलिंग की कार्रवाई शुरू कर दी है. शहर के रिहायशी इलाकों में लगभग 62,550 अवैध कमर्शियल प्रतिष्ठानों की पहचान की गई है, जिनमें से 8,500 से ज्यादा को नोटिस जारी किए जा चुके हैं. सुप्रीम कोर्ट द्वारा राज्य सरकार की जांच समिति पर रोक लगाने और व्यापारियों को मिले सभी मौजूदा स्टे ऑर्डर रद्द करने के बाद, 31 अगस्त को छह स्पेशल टीमों ने 11 पुलिस स्टेशनों की सुरक्षा के साथ सीलिंग की प्रक्रिया शुरू की.
आखिर पूरा मामला क्या है?
दरअसल, भोपाल में रिहायशी कॉलोनियों और इमारतों के अंदर होटल, रेस्टोरेंट, जिम, दुकानें, शोरूम, गोदाम और दूसरी कमर्शियल गतिविधियां चलाने को लेकर लंबे समय से शिकायतें आ रही हैं. रिहायशी इलाके मुख्य रूप से लोगों के रहने के लिए होते हैं. यह मामला कानूनी कार्रवाई का विषय बना और आखिरकार सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा. अगस्त के पहले हफ्ते में हुई सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार की बनाई 10 सदस्यों वाली जांच समिति की कार्रवाई पर रोक लगा दी और हाई कोर्ट से दुकान संचालकों को मिले सभी स्टे ऑर्डर रद्द कर दिए थे. सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कहा था कि उसके निर्देशों पर चल रही जांच में किसी भी तरह का दखल बर्दाश्त नहीं किया जाएगा. इस मामले की अगली सुनवाई 15 सितंबर को होगी, लेकिन इससे पहले नगर निगम को कार्रवाई की रिपोर्ट जमा करनी होगी.
62,550 अवैध कमर्शियल प्रतिष्ठान चिन्हित
नगर निगम ने 26 अगस्त तक कुल 8,264 नोटिस जारी किए थे. इन नोटिसों की समीक्षा के बाद 30 अगस्त को 24 घंटे का अल्टीमेटम दिया गया था. निगम के सर्वे के अनुसार, शहर की रिहायशी कॉलोनियों में लगभग 62,550 अवैध कमर्शियल प्रतिष्ठानों की पहचान की गई है. सीलिंग अभियान के लिए छह विशेष टीमें बनाई गई हैं, जिनमें से प्रत्येक टीम में 56 अधिकारी और कर्मचारी शामिल हैं. निगम ने नियम के अनुसार अगर कोई व्यापारी अपनी दुकान स्वेच्छा से बंद भी करता है, तो भी एक पंचनामा तैयार किया जाएगा और कोर्ट की अनुमति के बिना उस जगह को दोबारा नहीं खोला जा सकेगा.
किन इलाकों में हो रही है कार्रवाई?
इन इलाकों में होटल, रेस्टोरेंट, जिम, शादी हॉल, शोरूम और कारखानों को सील किया जा रहा है.
अब तक यहां हुई कार्रवाई
कमर्शियल सीलिंग का मतलब क्या है?
सीलिंग का असल मतलब है कि प्रशासनिक कार्रवाई के जरिए किसी प्रॉपर्टी पर चल रही गतिविधि को रोकना और उस जगह को सील करना. हालांकि, किसी रिहायशी इमारत में चल रहे बिजनेस को अपने-आप गैर-कानूनी नहीं माना जा सकता. असली सवाल यह है कि उस प्लॉट या इमारत के लिए जमीन के इस्तेमाल की क्या मंज़ूरी है, इमारत का प्लान किस मकसद से मंजूर किया गया था, और क्या उस गतिविधि के लिए जरूरी मंजूरी मौजूद है? अगर कोई इमारत रिहायशी इस्तेमाल के लिए मंजूर है लेकिन बिना मंजूरी के वहां बड़े पैमाने पर कमर्शियल गतिविधि हो रही है, तो उस पर ऐसी कार्रवाई हो सकती है.
क्या है कानूनी प्रावधान और नियम क्या कहते हैं?
कमर्शियल सीलिंग की कार्रवाई मुख्य रूप से म्युनिसिपल कानूनों, मास्टर प्लान और राज्य-स्तरीय शहरी विकास व बिल्डिंग बायलॉज के तहत की जाती है. इसके मुख्य कानूनी आधार इस प्रकार हैं: जमीन का इस्तेमाल मास्टर प्लान से तय होता है. अगर किसी प्रॉपर्टी को रिहायशी (रेसिडेंशियल) घोषित किया गया है, तो बिना सही मंजूरी या नोटिफिकेशन के वहां कमर्शियल गतिविधियां करना नियमों का उल्लंघन माना जाता है. इसके अलावा मंजूर किए गए प्लान के बिना निर्माण करना, या तय फ्लोर एरिया रेश्यो (FAR) या ऊंचाई की सीमा से ज्यादा निर्माण करना भी कानून का उल्लंघन है.
कई मामलों में रिहायशी इलाकों में सीमित कमर्शियल गतिविधियां करने की इजाजत होती है. हालांकि, प्रॉपर्टी के मालिक के लिए तय कनवर्ज़न चार्ज जमा करना जरूरी होता है. यह रकम जमा न करने पर जगह को सील करने की कार्रवाई हो सकती है. सुरक्षा और NOC से जुड़ी जरूरतें जैसे कि, फायर सेफ्टी NOC, पॉल्यूशन कंट्रोल बोर्ड की मंजूरी या हेल्थ डिपार्टमेंट के लाइसेंस के बिना कमर्शियल प्रतिष्ठान चलाना भी कानून का उल्लघंन है.
सीलिंग की प्रक्रिया में प्रशासन कैसे करता है कार्रवाई?
सीलिंग की कार्रवाई आम तौर पर दुकान को तुरंत बंद करने या ताला लगाने से शुरू नहीं होती है. सबसे पहले, उस जगह का सर्वे और जांच की जाती है ताकि यह पता चल सके कि प्रॉपर्टी का इस्तेमाल किस काम के लिए मंजूर है और असल में वहां कौन सी गतिविधियां हो रही हैं. इसके बाद, अगर नियमों का उल्लंघन पाया जाता है, तो संबंधित बिल्डिंग के मालिक या ऑपरेटर को नोटिस भेजा जा सकता है. इस नोटिस में जवाब मांगा जाता है और उन्हें नियमों के मुताबिक गतिविधि रोकने या स्थिति स्पष्ट करने का मौका दिया जाता है. अगर नोटिस के बावजूद नियमों का पालन नहीं किया जाता है, या संबंधित पक्ष के पास जरूरी मंजूरी नहीं होती है, तो नगर निगम आगे की कार्रवाई कर सकता है.
व्यापारियों का क्या पक्ष है और उनकी क्या मांगें हैं?
अर्बन प्लानिंग एक्सपर्ट्स का कहना है कि अगर मास्टर प्लान समय पर जारी हो जाता, तो निवासियों और कारोबारियों को इस स्थिति का सामना नहीं करना पड़ता. वहीं शहर के प्रभावित इलाकों में कार्रवाई के बाद कारोबारियों में दहशत फैल गई है. वे भोपाल के मास्टर प्लान को जल्द लागू करने और रिहायशी इलाकों में मिक्स्ड लैंड यूज के प्रावधानों को शामिल करने की मांग कर रहे हैं. साथ ही वे गुजरात की तर्ज पर अनधिकृत निर्माण को नियमित करने वाला कानून लागू करने की भी मांग कर रहे हैं और अधिकारियों से अपील कर रहे हैं कि वे सीलिंग की कार्रवाई करने से पहले कोई व्यावहारिक समाधान निकालें, ताकि लंबे समय से चल रहे कारोबार और उनसे जुड़ी आजीविका को बचाया जा सके.
आगे का रास्ता और समाधान क्या हो सकता है?
इस समस्या का स्थायी समाधान खोजने के लिए कई उपाय किए जा सकते हैं, जैसे कि मामूली या सुधारे जा सकने वाले उल्लंघनों के मामलों में पेनल्टी और कन्वर्जन चार्ज लेकर प्रॉपर्टी को डी-सील करने के लिए एक सरल ढांचा बनाना. शहरी इलाकों की बदलती जरूरतों को ध्यान में रखते हुए, रिहायशी इलाकों में प्रदूषण न फैलाने वाली और सीमित कमर्शियल गतिविधियों के लिए कानूनी रास्ते तलाशे जाने चाहिए. सभी तरह की NOC, लाइसेंस और नक्शा मंजूरी के लिए सिंगल विंडो सिस्टम लागू किया जाना चाहिए ताकि प्रक्रिया में पारदर्शिता बनी रहे. सबसे जरूरी बात यह है कि कार्रवाई एक जैसे नियमों और पारदर्शी प्रक्रिया पर आधारित होनी चाहिए. इससे निवासियों और कारोबारियों को राहत मिलेगी.