Ground Report: किसान फसल बचाएं या जान? नरसिंहपुर में खेतों के ऊपर 'मौत' का साया; 15 साल से लटक रहे बिजली के तार, कब हटेगा खतरा?
बिजली लाइन किसानों के लिए परेशानी के साथ खतरे की वजह बनी हुई है. कई जगह बिजली के खंभे तिरछे हैं और तार इतने नीचे हैं कि फसलों को छू रहे हैं. किसानों का दावा है कि करीब 15 साल से समस्या बनी हुई है और कई हादसे भी हो चुके हैं. 10 दिन पहले एक किसान की करंट की चपेट में आने से मौत हो गई थी.
सोचिए जिस खेत में किसान अपनी मेहनत से फसल उगा रहा है, उसी फसल के ऊपर मौत का खतरा मंडरा रहा हो. ऐसा खतरा, जो जमीन से महज कुछ फीट ऊपर झूलते तारों के रूप में हर दिन किसानों को डरा रहा है. हालात यह है कि किसान लकड़ी के सहारे तारों को ऊपर उठाकर खेत में काम करने को मजबूर हैं. हैरानी की बात यह है कि समस्या आज की नहीं है. किसान करीब 15 साल से प्रशासन से गुहार लगा रहे हैं और इस दौरान हादसे हुए जाने भी गईं, लेकिन खतरा अभी भी बरकरार है. अब सवाल यह है कि जब खतरा इतना साफ नजर आ रहा है, तो इसे टालने के लिए समय रहते कदम क्यों नहीं उठाए जा रहे हैं?
मध्य प्रदेश के नरसिंहपुर जिले के करेली विद्युत विभाग के अंतर्गत आने वाले कुसमी गांव से हम आपको ग्राउंड रिपोर्ट बता रहे हैं. खेतों के बीच से गुजरती बिजली की लाइनें, नीचे लटकते तार और इन तारों के ठीक नीचे खड़ी फसल. कहीं पोल एक तरफ झुका है, तो कहीं तार जमीन से इतने नीचे आ गए हैं कि फसलों को छूते नजर आते हैं. हालात ऐसे हैं कि किसान अपनी फसल बचाने के साथ-साथ खुद को भी बिजली के खतरे से बचाने की जुगत में लगे हैं.
विद्युत विभाग से CM हेल्पलाइन तक शिकायत, लेकिन समाधान नहीं
कुसमी गांव के रहने वालों का आरोप है कि कई जगह उन्होंने लकड़ी के सहारे तारों को ऊपर किया है, जिससे खेत में काम करने के दौरान कोई हादसा ना हो जाए. किसानों का कहना है यह समस्या आज की नहीं है. करीब 15 साल से खेतों के बीच गुजर रही बिजली लाइन इसी तरह परेशानी का सबब बनी हुई है. ग्रामीणों के मुताबिक, शिकायतें हुई, विद्युत विभाग तक मामला पहुंचा, सीएम हेल्पलाइन तक शिकायत की गई, लेकिन स्थाई समाधान नहीं हुआ.
किसान की मौत, जल जाती है फसल... हर समय डर का माहौल
करीब 10 दिन पहले किसान की करंट की चपेट में आने से मौत के बाद सवाल और गंभीर हो गया है. गांव के रहने वाले अतुल कौरव ने बताया कि गांव के रहने वाले लाल सिंह राजपूत के साथ हादसा हुआ. खेतों में लाइन डली हुई और कई बार फसल जल जाती है. कई बार ऐसा हो जाता है कि बकरियों के साथ हादसा हो जाता है. आज की स्थिति में तार इतनी नीची है कि अगर इसे पाइप से उठाते हैं, तो उसमें भी करंट आ जाता है. स्थिति बहुत खराब है और हम सिर्फ इतना चाह रहे हैं यहां तार बदल जाए.
गांव के ही रहने वाले शैलेश दीक्षित ने बताया कि करीब 100 किसान इन तारों और खंभों से सबसे परेशान हैं. इससे किसानों के अलावा जानवरों को भी खतरा है. कई बार फसलों को भी नुकसान होता है. हाल ही में हुई घटना के बाद सभी गांव वाले चाहते हैं कि कुछ ऐसे कदम उठाए जाएं, जिससे फिर ऐसी घटना ना हो. हम विद्युत विभाग से आशा करते हैं कि जहां जरूरी हों, खंभों और तारों को चेंज किए जाएं.
क्या किसी बड़े हादसे का किया जा रहा इंतजार?
आखिर ऐसी लाइन, जिसके नीचे किसान रोज अपनी फसल संभालने पहुंचते हैं, उसे सुरक्षित करने में इतनी देरी क्यों हो रही है? और क्या किसी बड़े हादसे का इंतजार किया जा रहा है? किसानों का कहना है बारिश के मौसम में खेतों में नमी और हरियाली के बीच यह खतरा और बढ़ जाता है. ऐसे में ग्रामीण चाहते हैं या तो पोल बदले जाएं या लाइन को सुरक्षित ऊंचाई पर किया जाए, ताकि खेत में काम करने वाला कोई दूसरा किसान हादसे का शिकार ना हो.
बिजली विभाग ने क्या दी दलील?
ग्रामीणों के आरोपों के बीच अब बिजली विभाग का पक्ष भी सामने आया है. विद्युत विभाग के अधिकारी का कहना है कि कुसमी गांव की लाइन से जुड़ी समस्या उनके संज्ञान में है, लेकिन फिलहाल बारिश का मौसम होने की वजह से नए लाइन और नए पोल लगाना संभव नहीं है. करेली के JE दीपक रघुवंशी ने कहा, 'यह प्रकरण मेरे संज्ञान में आया था, तो तुरंत हमने कार्रवाई करते हुए वहां के लाइनमैन को निर्देशित किया था. अभी बारिश का मौसम है, तो जो भी टेंपरेरी सुधार हो सकता था, हमने करवाया था. बारिश में कोई पोल या तार लगा नहीं पा रहे हैं, तो बारिश के बाद इसका दुरुस्तीकरण करवाएंगे. इसको हमने संज्ञान में ले लिया है और जो भी समस्या है उनका निराकरण किया जाएगा.'
स्थाई समाधान कब?
हालांकि, सवाल यह है कि जब खतरा खेतों में मौजूद है और एक किसान की जान भी जा चुकी है, तो स्थाई समाधान के लिए बारिश खत्म होने का इंतजार कितना सुरक्षित है? कुसमी गांव के खेतों में बिजली के झुके हुए पोल और नीचे लटकते तार सिर्फ एक तकनीकी समस्या नहीं हैं. इनके नीचे किसान अपनी रोजी-रोटी के लिए खेतों में उतरते हैं. ग्रामीण शिकायत कर रहे हैं, विभाग समस्या मान रहा है, अस्थाई व्यवस्था की बात भी हो रही है, लेकिन सवाल अभी भी वही है कि स्थाई समाधान कब?