दमोह में मखाना-अश्वगंधा का प्रयोग: धान-गेहूं के MSP चक्रव्यूह से MP के किसानों को कैसे निकालेगा 'दमोह मॉडल'?
मध्य प्रदेश का दमोह जिला खेती में नए प्रयोगों की ओर बढ़ रहा है. अब यहां मखाना और अश्वगंधा जैसी फसलों को बढ़ावा देने की तैयारी है. सरकार का जोर फसल विविधीकरण और किसानों की आमदनी बढ़ाने पर है. आइए, दमोह के नए कृषि मॉडल के बारे में विस्तार से जानते हैं.
बुंदेलखंड का दमोह जिला अब सिर्फ गेहूं और चना की खेती के लिए ही नहीं जाना जाता है, बल्कि खेती में नए तौर-तरीकों के लिए पूरे देश में छाया हुआ है. सीएम मोहन यादव ने मंगलवार को बलराम कृषि महोत्सव के दौरान दमोह के किसानों से बातचीत की. इस दौरान उन्होंने खेती को पारंपरिक फसलों से आगे ले जाने पर जोर दिया. सीएम मोहन यादव ने कहा कि आने वाले खरीफ सीजन में जिले में मखाने की खेती का प्रयोग किया जाएगा. इसके अलावा, यहां के 100 से ज्यादा किसानों को अश्वगंधा की खेती के लिए फ्री में बीज और प्रशिक्षण दिया जा जुका है. ऐसे में सवाल यही है कि आखिरकार दमोह में खेती का नया प्रयोग क्यों किया जा रहा है.
दरअसल, दमोह की पहचान लंबे समय से खेती-किसानी वाले जिलों में अव्बल रहा है. सीएम ने भी बताया कि यहां पर लगभग 6 लाख 72 हेक्टेयर में खेती की जाती है. इसमें से 86 फीसदी कृषि इलाका सिंचित है. इस हिसाब से यहां खेती के लिए पानी की सुविधा काफी बड़े इलाके में मौजूद है.
वैसे तो दमोह जिला चना की खेती के लिए पूरे देश में जाना जाता है. इसके साथ ही यहां के किसान गेहूं-धान की खेती भी बड़े पैमाने पर करते हैं. लेकिन अब सरकार किसानों को सिर्फ इन्हीं फसलों तक सीमित नहीं रखना चाहती है. सीएम ने बताया कि किसान फसल विविधीकरण, नई तकनी, नवाचार, प्राकृतिक-जैविक खेती, गौपालन और मछली पालन जैसे दूसरे विकल्प भी अपनाएं. सीएम की यही सोच आगे चलकर दमोह मॉडल के रूप में जानी जाएगी.
मखाने की खेती की चर्चा क्यों?
सीएम मोहन यादव ने बलराम कृषि महोत्सव के दौरान एक बड़ी घोषणा की है. उन्होंने कहा कि अगले खरीफ सीजन में दमोह जिले में मखाने का उत्पादन शुरू किया जाएगा. अगर देखा जाए तो मखाने की खेती आमतौर पर बिहार जैसे इलाकों से जोड़ी जाती है. ऐसे में बुंदेलखंड के दमोह में इसका प्रयोग करना एक नया कदम है. सरकार मखाने की खेती को नवाचार के तौर पर शुरू करने जा रही है. सरकार की कोशिश है कि दमोह में मखाने की खेती लगाना नहीं, बल्कि किसान अपनी जमीन, पानी और उपलब्ध संसाधनों के हिसाब से ऐसी फसलों की तरफ भी जाएं, जिनसे खेती से होने वाली कमाई के नए रास्ते खुल सकें.
अश्वगंधा की खेती पर भी दिया जोर
दमोह में सिर्फ मखाने की खेती ही नहीं बल्कि अश्वगंधा की खेती को बढ़ावा देने की कोशिश की जा रही है. यहां के लगभग 100 से ज्यादा किसानों को फ्री में बीज और प्रशिक्षण दिया जा चुका है. वहीं सीएम ने बताया कि अश्वगंधा एक औषधीय फसल है, सरकार इसे जिले में खेती के नए विकल्प के तौर पर देख रही है. इसी लिए अश्वगंधा की खेती को बढ़ावा देने की कोशिश हो रही है. सरकार का मकसद है कि यहां पर किसान गेहूं, चना, धान की खेती के अलावा, अन्य फसलों की खेती को भी करे, ताकि किसानों की आमदनी बढ़ सके.
क्या सिर्फ मखाना-अश्वगंधा से बदलेगी तस्वीर?
हालांकि, अभी दमोह में मखाने की खेती का उत्पादन शुरू नहीं हुआ है. इस पर विचार किया जा रहा है कि आने वाले खरीफ सीजन में मखाने की खेती की जाएगी. वहीं अश्वगंधा की खेती को भी शुरुआती स्तर पर बढ़ावा दिया जा रहा है. इसलिए असली तस्वीर आगे सामने आएगी. लेकिन सरकार की योजना सिर्फ फसल बदलने तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके पीछे सिंचाई, पशुपालन, मछली पालन और कृषि से जुड़े दूसरे कामों को भी साथ जोड़ने की कोशिश है.
दमोह में सिंचाई का कितना दायरा है?
दमोह के किसान नई फसल को तभी उगा पाएगा, जब वहां पर पानी की बेहतर व्यवस्था होगी. सीएम ने दमोह में सिंचाई से जुड़ी परियोजनाओं का जिक्र करते हुए कहा कि तेंदूखेड़ा में 165 करोड़ रुपए से ज्यादा की झापन नाला मध्यम सिंचाई परियोजना से 17 से ज्यादा गांवों की करीब 3600 हेक्टेयर कृषि भूमि सिंचाई होगी. इसके अलावा, सतधरु मध्यम सिंचाई परियोजना, पारना जलाशय और दादपुर स्टाप डेम का भी काम तेजी से चल रहा है. सीएम ने बताया कि सरकार का लक्ष्य है कि दमोह में सूक्ष्म सिंचाई का रकबा बढ़ाकर 1.35 लाख हेक्टेयर तक करने का लक्ष्य रखा गया है.
केन-बेतवा परियोजना से भी उम्मीद
सीएम ने केन-बेतवा राष्ट्रीय नदी जोड़ो परियोजना का भी जिक्र किया. उन्होंने कहा कि केन-बेतवा परियोजना, दमोह जिले के लिए वरदान है. खेती-किसानी में पानी सबसे अहम माना जाता है. ऐसे में सिंचाई का दायरा बढ़ने से किसानों के लिए खेती में नए प्रयोग करने की गुंजाइश भी बढ़ेगी. मखाना और दूसरी नई फसलों की खेती की योजना को भी इसी सिंचाई व्यवस्था से जोड़कर देखा जा रहा है. मतलब साफ है कि सरकार चारों तरफ फोकस कर रही है.
किसान की कमाई सिर्फ खेत से नहीं बढ़ेगी
मुख्यमंत्री ने किसानों से कहा कि आमदनी बढ़ाने के लिए केवल खेती पर निर्भर रहने के बजाय पशुपालन और मछली पालन जैसे कामों को भी साथ जोड़ा जाए. दमोह में पिछले एक साल में 9 नई दुग्ध सहकारी संस्थाएं पंजीकृत हुई हैं. वहीं क्षीरधारा ग्राम योजना के पहले चरण में जिले के 65 गांवों का चयन किया गया है. मछली पालन को बढ़ावा देने के लिए मुख्यमंत्री मछुआ समृद्धि योजना के तहत 14 स्वच्छ फिश पार्लर बनाए जा रहे हैं.
15 सितंबर से धान और ज्वार-बाजरा का पंजीयन शुरू
वहीं सीएम मोहन यादव का कहना है कि न्यूनतम समर्थन मूल्य पर धान और ज्वार-बाजरा के उपार्जन के लिए किसान पंजीयन 15 सितंबर से शुरू हो गया है, जो 10 अक्टूबर तक चलेगा. मुख्यमंत्री ने कहा कि सरकार किसानों के कल्याण के लिए पूरी प्रतिबद्धता से काम कर रही है और अन्नदाताओं की आमदनी बढ़ाना उसका प्रमुख लक्ष्य है. उन्होंने कहा कि खेत से लेकर बाजार तक और खाद से लेकर किसानों के खातों तक पक्की और स्थायी व्यवस्थाएं करने पर सरकार काम कर रही है. दमोह मॉडल का मतलब सिर्फ धान, गेहूं या दूसरी पारंपरिक फसलों को छोड़ देना नहीं है, बल्कि इन फसलों पर भी पूरा फोकस रखा जा रहा है.