जिस घर में बीता बचपन, उसी पर चलानी पड़ी गैंती, आंखों में आंसू लिए बोले CM मोहन, 'पिताजी ने मेहनत से बनवाया था मकान'
मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने अपने पैतृक मकान पर खुद गैंती चलाकर मिसाल पेश की. मुख्यमंत्री सुबह करीब 10 बजे अब्दालपुरा स्थित अपने मकान नंबर 180 पर पहुंचे. यहां पूजा-अर्चना के बाद उन्होंने खुद गैंती चलाकर मकान का हिस्सा विकास कार्य के लिए समर्पित किया.
उज्जैन में सिंहस्थ 2028 को लेकर तैयारियां तेज हो गई हैं. इसी बीच शहर में सड़क चौड़ीकरण का काम भी शुरू किया है. चौड़ीकरण की जद में मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव का पुश्तैनी घर भी आया है. प्रशासन की ओर से मुख्यमंत्री और उनकी बहन के घर समेत संबंधित मोहल्ले के कुल 272 मकानों को नोटिस जारी किया गया है. इसी मामले को लेकर मुख्यमंत्री मोहन यादव 27 सितंबर को अब्दालपुरा स्थित अपने पुश्तैनी घर पहुंचे, जहां उन्होंने पैतृक घर के बाहर पूजा-अर्चना की. इसके बाद उन्होंने खुद गैंती चलाकर विकास कार्य की शुरुआत की और नई नींव रखी.
इसके बाद मीडिया से बात करते हुए मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने कहा कि जिस घर में उन्होंने अपना बचपन बिताया और पले-बढ़े, उसे टूटते हुए देखकर भावुक होना स्वाभाविक है, ये मकान पिताजी की मेहनत से बना था. उन्होंने कहा कि अगर सिंहस्थ आयोजन के लिए सड़क चौड़ी करना जरूरी है, तो यह त्याग करना ही होगा. उन्होंने आगे कहा कि इस काम में सभी सहयोग कर रहे हैं. मुख्यमंत्री के अनुसार, पूरा देश देख रहा है कि लोग दूसरों की सुविधा और भलाई के लिए स्वेच्छा से अपने घर हटाने को तैयार हैं.
सीएम ने उज्जैनवासियों की तारीफ की
सीएम ने कहा कि, जिस घर में हम पले-बढ़े और खेले-कूदे, उसे गिराने पर भावनात्मक असर महसूस होना स्वाभाविक है. लेकिन अगर सिंहस्थ महाकुंभ और आम जनता की सुविधा के लिए यह कदम जरूरी है, तो हमें यह त्याग करना ही होगा. व्यक्तिगत लगाव से ऊपर उठकर, जनहित ही सर्वोपरि है. सीएम ने उज्जैन के लोगों तारीफ करते हुए कहा कि, जिन्होंने बिना किसी भेदभाव के स्वेच्छा से अपने घरों और पूजा-स्थलों को भी पीछे हटा लिया. चाहे हिंदू हों, मुस्लिम हों या किसी अन्य समुदाय के लोग, सभी ने सिंहस्थ के लिए अभूतपूर्व सहयोग दिया, जो सरकार और जनता के बीच अटूट भरोसे को दर्शाता है.
दादा ने 1974 में बनाया था मकान
मुख्यमंत्री मोहन यादव का इस घर से पुराना नाता है. उनके दादा रामचंद्र यादव ने 1974 में यह घर बनवाया था. मोहन यादव और उनके भाई-बहनों का बचपन इसी घर और मोहल्ले में बीता. मोहन यादव के पड़ोसी लक्ष्मीनारायण सोलंकी ने उनके बचपन की यादें साझा कीं. उन्होंने बताया कि मोहन यादव और उनके सभी भाई-बहन इसी मोहल्ले में बहुत साधारण हालात में पले-बढ़े. उन्होंने मोहन यादव के छात्र राजनीति के दिनों को भी याद करते हुए बताया कि कॉलेज में पहली बार छात्र संघ का चुनाव जीतने के बाद, जब मोहन यादव अपने घर लौटे तो मोहल्ले में उनका स्वागत किया गया था.