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छिंदवाड़ा के मां सिद्धिदात्री मंदिर का 1200 साल पुराना है इतिहास, जानिए अंग्रेजों से लेकर कलेक्टर तक की कहानी

छिंदवाड़ा के मां सिद्धिदात्री मंदिर को लेकर 1200 साल पुरानी मान्यता चली आ रही है. आइए अंग्रेजों के दौर से जुड़ी कहानी और कलेक्टरों के कार्यकाल में प्रतिमा स्थापना से जुड़े अनसुने किस्से के बारे में जानते हैं.

Written By Manish Kushawah
Published: Oct 18, 2026, 07:58 PM IST | Updated: Oct 18, 2026, 08:04 PM IST
Image Credit: ZEE NEWS
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छिंदवाड़ा जिला कलेक्टर के बंगले के पास बने मां सिद्धिदात्री के मंदिर का इतिहास काफी पुराना बताया जाता है. चैत्र नवरात्रि ही नहीं, बल्कि शारदीय नवरात्रि में भी यहां पर भक्तों की भारी भीड़ लगी रहती है. खासकर, महाष्टमी के दिन मां की पूजा अर्चना के लिए सुबह से ही मंदिर में भक्तों का पहुंचने लगते हैं. मान्यता ऐसी है कि यहां पर आने वाले भक्त मां से मनोकामना पूर्ण होने का आशीर्वाद लेते हैं.

दरअसल, मां सिद्धिदात्री मंदिर का इतिहास 1200 साल पुराना बताया जाता है. इस इतिहास के पीछे एक कहानी भी काफी प्रचलित है. यह कहानी अंग्रेजों से जुड़ी बताई जाती है. कहा जाता है कि इस मंदिर में सबसे पहले पिंडारियों के द्वारा पूजा-अर्चना की जाती थी, जो कि मराठा सेनाओं से जुड़े समूहों के रूप में जाने जाते थे. इसके बाद यह पूरा ग्रुप लूटपाट की घटनाओं के चलते मशहूर भी हुआ.

जानिए अंग्रेजों से जुड़ी पूरी कहानी

स्थानीय लोगों का मानना है, कि प्राचीन काल में यहां पर खुले आसमान में आम के पेड़ के नीचे शिलाओं के रूप में स्थापित किया गया था. इसके बाद अंग्रेजों ने इन शिलाओं को हटाने के लिए पूरा जोर लगा लिया. इतना ही नहीं, उन्होंने इसे हटाने के लिए आदेश भी दिया था. उस समय अंग्रेजों ने जिसे आदेश दिया था, उसका नाम महबूब भाई था. उसने डर के चलते अंग्रेजों के आदेश का पालन भी किया.

लोग बताते हैं कि महबूब भाई नाम के युवक ने शिलाओं को हटा दिया, लेकिन रात बीतने के साथ ही उसका पूरा शरीर पूरी तरह से सूज गया था. उसके बाद अगली सुबह जब वह किसी झाड़ फूंक करने वाले आलिम के पास पहुंचा तो उसने उससे किसी सिद्ध स्थान के साथ छेड़छाड़ की बात कही. इसके बाद महबूब भाई ने हटाई गई शिलाओं को दोबारा से स्थापित कर दिया. हालांकि, वह पूरी तरह से ठीक भी हो गया था.

कलेक्टर के साथ क्या मामला था?

ऐसा एक मामला 1951 में 1953 तक कलेक्टर रहे मथुरा प्रसाद द्विवेदी से जुड़ा बताया जाता है. कलेक्टर के हाथों के एक घटना होने के बाद दोबारा पूजा अर्चना की शुरुआत की. वहीं जब 1960 में यह प्रतिमा खंडित गई थी. उसके बाद यहां के तहसीलदार ने प्रतिमा की प्राण प्रतिष्ठा करवाई. लेकिन कुछ समय बाद फिर से प्रतिमा खंडित हो गई.

इसके बाद 23 नवंबर 1967 से 1971 तक कलेक्टर रहे हरिनारायण बनर्जी के कार्यकाल के दौरान उनकी पत्नी ने एक दुर्गा महिला मंडल का गठन कर दिया. मंडल के गठन होने के बाद मां की दूसरी प्रतिमा स्थापित की गई. कहा जाता है, कि यह प्रतिमा पहले कलेक्टर ऑफिस के नजारत शाखा में थी. जहां आज भी अधिकारी कुर्सी पर बैठने से पहले जूते, चप्पल उतार कर बैठते हैं. उसके बाद इस प्रतिमा को इसी मंदिर में स्थापित कर दिया था.

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मनीष कुशवाह डिजिटल पत्रकार हैं, जिन्हें टीवी और डिजिटल मीडिया में 5 वर्षों से अधिक का अनुभव है. वर्तमान में वे Zee News (MP-CG) की डिजिटल टीम में सब-एडिटर के रूप में काम कर रहे हैं. मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ की राजनीति, क्राइम, कृषि व्यवस्था और ग्रामीण (हाइपरलोकल) सरोकारों से जुड़ी खबरों की गहराई से कवरेज करना उनकी एक्सपर्टीज है.नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ मास कम्युनिकेशन (NIMC) से पत्रकारिता में डिप्लोमा पूरा करने के बाद मनीष ने मीडिया जगत में अपना सफर शुरू किया. ज़ी न्यूज़ से पहले उन्होंने News18 Hindi (Local18), इंडिया न्यूज़ और जनता टीवी जैसे प्रमुख समाचार चैनलों और डिजिटल प्लेटफॉर्म्स में काम किया है. इस दौरान उन्होंने न्यूज़ प्लानिंग, कंटेंट आइडिएशन और डेस्क मैनेजमेंट की अहम जिम्मेदारियां संभाली हैं. वे खबरों की प्रामाणिकता और ग्राउंड रियलिटी को प्राथमिकता देते हैं, ताकि पाठकों तक सटीक और भरोसेमंद जानकारी पहुंचे.मनीष कुशवाह से आप Manish2.Kumar@india.com पर ईमेल के माध्यम से संपर्क कर सकते हैं. इसके अलावा, एक्स (ट्विटर) और फेसबुक के जरिए भी उनसे सीधा संवाद कर सकते हैं.
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