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Opinion: वोट महिलाओं का, वादे महिलाओं से… फिर सुरक्षा के सवाल पर चुप क्यों हैं राजनीतिक दल?

चुनाव आते ही महिला मतदाताओं के लिए योजनाओं और आर्थिक सहायता की घोषणाएं तेज हो जाती हैं लेकिन सुरक्षित सड़क, पुलिस पेट्रोलिंग, स्ट्रीट लाइट, और तेज न्याय जैसे बुनियादी सवाल पीछे छूट जाते हैं. क्या महिला को सिर्फ ‘लाभार्थी’ मानकर उसकी नागरिक सुरक्षा की जिम्मेदारी से राजनीति बच सकती है?

Written By Amit Singh
Published: Oct 02, 2026, 03:51 PM IST | Updated: Oct 02, 2026, 04:57 PM IST
Image Credit: Zee Media Archive illustration
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'एक कचौड़ी, दो समोसा... इन मर्दों का क्या भरोसा...'
'क्यूटी नहीं, क्रांति हूं...'
'रेपिस्ट को अंदर करो, लड़कियों को नहीं...'

दिल्ली विश्वविद्यालय की छात्राओं के ये नारे सुनने में भले ही हल्के-फुल्के लगें, लेकिन इनके पीछे का संदेश बेहद गंभीर है. दक्षिण दिल्ली के आस्था कुंज पार्क में 17 साल की लड़की के साथ कथित सामूहिक दुष्कर्म के बाद दिल्ली विश्वविद्यालय की छात्राओं ने जिस तरह सड़कों पर उतरकर प्रदर्शन किया है, वह सिर्फ एक अपराध के खिलाफ विरोध नहीं है.

यह उस सोच के खिलाफ भी प्रतिरोध है, जिसमें महिला की सुरक्षा का समाधान उसकी आजादी सीमित करने में खोजा जाता है. सितंबर के आखिरी सप्ताह से दिल्ली विश्वविद्यालय के अलग-अलग कॉलेजों की छात्राएं लगातार मार्च कर रही हैं.

लेडी श्रीराम कॉलेज, गार्गी, मिरांडा हाउस, कमला नेहरू कॉलेज समेत कई संस्थानों की छात्राओं ने प्रदर्शन किए. बारिश के बीच नॉर्थ कैंपस में भी बड़ी संख्या में छात्राएं सड़कों पर उतरीं.

उनकी मांगों में बेहतर स्ट्रीट लाइट, काम करते CCTV कैमरे, पुलिस पेट्रोलिंग, सुरक्षित सार्वजनिक परिवहन और कॉलेजों की इंटरनल कम्प्लेंट कमेटी को प्रभावी बनाना शामिल है.

साथ ही छात्राओं का एक महत्वपूर्ण सवाल है कि सुरक्षा के नाम पर उनकी आवाजाही पर पाबंदी क्यों? यही इस पूरे आंदोलन का सबसे महत्वपूर्ण पहलू है.

छात्राएं सिर्फ यह नहीं कह रही हैं कि हमें सुरक्षा दो. वे कह रही हैं कि हमें सुरक्षा दो लेकिन हमारी स्वतंत्रता छीनकर नहीं.

दिल्ली से बिहार तक एक ही सवाल

दिल्ली का यह गुस्सा अकेला नहीं है. बिहार के जमुई, समस्तीपुर, बांका और किशनगंज से सामने आई लड़कियों के साथ बदसलूकी की घटनाओं ने भी इसी सवाल को सामने रखा है कि सार्वजनिक जगहों पर महिलाओं की सुरक्षा आखिर किसकी जिम्मेदारी है?

यहीं राजनीतिक व्यवस्था की परीक्षा होती है. किसी घटना के बाद आरोपी की गिरफ्तारी और कुछ दिनों की राजनीतिक बयानबाजी जरूरी है, लेकिन पर्याप्त नहीं.

सवाल यह है कि उस सड़क पर रोशनी क्यों नहीं थी? वहां पुलिस की मौजूदगी क्यों नहीं थी? सीसीटीवी था, तो क्या वह काम कर रहा था? शिकायत मिलने के बाद कार्रवाई कितनी तेज हुई? सबसे बड़ा सवाल कि क्या ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए कोई स्थायी व्यवस्था बनी?

बिहार में एनसीआरबी के आंकड़े भी चिंता पैदा करते हैं. 2020 में महिलाओं के खिलाफ दर्ज अपराधों की संख्या लगभग 15 हजार थी, जो 2024 में बढ़कर 27,359 हो गई. उपलब्ध आंकड़ों के आधार पर यह लगभग 78 प्रतिशत की वृद्धि है.

राष्ट्रीय तस्वीर और भी बड़ा सवाल पूछती है

एनसीआरबी की क्राइम इन इंडिया 2024 रिपोर्ट के अनुसार, देश में महिलाओं के खिलाफ 4,41,534 मामले दर्ज हुए. यानी औसतन लगभग 1,210 मामले प्रतिदिन, लगभग हर 71 सेकंड में एक मामला. 2023 में यह संख्या 4,48,211 थी.

राष्ट्रीय राजधानी की तस्वीर भी राहत देने वाली नहीं है.

एनसीआरबी के 2024 के आंकड़ों के मुताबिक, दिल्ली में महिलाओं के खिलाफ 13,396 मामले दर्ज हुए. महिलाओं के खिलाफ अपराध की दर 176.8 प्रति एक लाख महिला आबादी रही जबकि राष्ट्रीय दर 64.6 थी.

लेकिन यहां भी आंकड़ों को समझने का सही तरीका जरूरी है. दिल्ली में 13,396 मामले दर्ज होना यह बताता है कि पुलिस के पास कितने मामले पहुंचे और दर्ज हुए.

इसे सीधे-सीधे वास्तविक अपराधों की संख्या नहीं कहा जा सकता. फिर भी 19 बड़े महानगरों में दिल्ली का सबसे अधिक नंबर होना गंभीर प्रशासनिक चुनौती की ओर इशारा करता है.

महिला वोट महत्वपूर्ण, महिला सुरक्षा क्यों नहीं?

भारत के लोकतंत्र में महिला मतदाता अब कोई छोटा या हाशिये का समूह नहीं हैं. निर्वाचन आयोग के अनुसार 2024 के लोकसभा चुनाव में करीब 47.63 करोड़ महिला मतदाता पंजीकृत थीं.

कुल मतदाताओं में महिलाओं की हिस्सेदारी 48.62 प्रतिशत थी. महिला मतदान प्रतिशत 65.78 रहा जो पुरुषों के 65.55 प्रतिशत से थोड़ा अधिक था.

यह आंकड़ा अपने आप में राजनीतिक व्यवस्था को एक बड़ा संदेश देता है. महिलाएं सिर्फ चुनावी भाषणों में 'आधी आबादी' नहीं हैं.

वे वास्तविक मतदाता हैं. वे मतदान केंद्र तक जाती हैं सरकार चुनती हैं और चुनावी नतीजों को प्रभावित करती हैं.

इसीलिए पिछले कुछ सालों में राजनीतिक दलों के चुनावी एजेंडे में महिलाओं को केंद्र में रखकर नकद सहायता, सामाजिक सुरक्षा, मुफ्त या सब्सिडी वाली सुविधाएं, गैस, आवास, स्वास्थ्य, शिक्षा और दूसरी योजनाओं के वादे बढ़े हैं.

इन योजनाओं का सामाजिक और आर्थिक महत्व अपनी जगह है. लेकिन असली सवाल इसके आगे है.

क्या महिला को सिर्फ लाभार्थी समझना पर्याप्त है?

अगर एक महिला के खाते में पैसा पहुंचता है लेकिन वह शाम को अपने कॉलेज से घर लौटते समय असुरक्षित सड़क से गुजरने के लिए मजबूर है तो उसकी सुरक्षा का सवाल खत्म नहीं होता.

अगर उसे आर्थिक सहायता मिलती है, लेकिन कार्यस्थल तक पहुंचने के रास्ते में छेड़छाड़ का डर है, तो समस्या बनी रहती है.

अगर चुनाव से पहले महिलाओं के लिए योजनाओं की लंबी सूची जारी होती है लेकिन पुलिस गश्त,स्ट्रीट लाइटिंग, सुरक्षित सार्वजनिक परिवहन, तेज जांच, अभियोजन और न्यायिक प्रक्रिया पर उतनी ही राजनीतिक ऊर्जा दिखाई नहीं देती तो नीति की प्राथमिकताओं पर सवाल उठना स्वाभाविक है.

महिला कहीं सिर्फ लाभार्थी तो नहीं बन गई?

यही सबसे असहज सवाल है. महिला वोट के लिए राजनीतिक दल योजनाएं बनाते हैं, और बनानी भी चाहिए लेकिन महिला को सिर्फ लाभार्थी बनाकर देखना और उसे अधिकारों से संपन्न नागरिक के रूप में न देखना लोकतंत्र की अधूरी तस्वीर है.

राजनीतिक दलों की असली परीक्षा यहीं है. महिला सुरक्षा ऐसा मुद्दा नहीं है जिसे किसी एक दल के खाते में डालकर दूसरे दल को बरी कर दिया जाए. सत्ता में आने वाला हर राजनीतिक दल और विपक्ष में बैठने वाला हर दल इस सवाल के सामने जवाबदेह है.

राजनीतिक दलों को यह भी बताना होगा कि महिला सुरक्षा के लिए उनका पांच साल का रोडमैप क्या है.

आज दिल्ली की छात्राएं कह रही हैं कि 'रेपिस्ट को अंदर करो, लड़कियों को नहीं'. यह एक नारे से कहीं ज्यादा बड़ा राजनीतिक प्रश्न है.

'क्यूटी नहीं, क्रांति हूं' दरअसल उस पहचान का ऐलान है, जिसमें लड़की अब सिर्फ सुरक्षा पाने वाली कमजोर नागरिक नहीं रहना चाहती. वह अपने अधिकारों की मांग करने वाली नागरिक है. राजनीतिक दलों को यह बदलाव समझना होगा.

महिला मतदाता अब सिर्फ यह नहीं पूछेगी कि सरकार ने उसके खाते में क्या भेजा. वह यह भी पूछ सकती है कि सरकार ने उसे सुरक्षित सड़क, सुरक्षित कॉलेज, सुरक्षित सार्वजनिक परिवहन और तेज न्याय क्यों नहीं दिया?

आखिर चुप्पी क्यों?

क्योंकि महिला सुरक्षा का राजनीतिक लाभ तुरंत दिखाई नहीं देता. एक चुनावी योजना की घोषणा मंच से की जा सकती है. उसकी तस्वीर बन सकती है. लाभार्थियों की सूची दिखाई जा सकती है.

लेकिन एक बेहतर पुलिसिंग व्यवस्था की उपलब्धि न तो एक दिन में दिखाई देती है और न ही एक चुनावी रैली में आसानी से बेची जा सकती है.

हालांकि लोकतंत्र में सरकारों की परीक्षा सिर्फ उन चीजों से नहीं होनी चाहिए जिन्हें प्रचारित करना आसान हो. सड़क पर उतरती लड़कियां दरअसल राजनीतिक व्यवस्था को यही याद दिला रही हैं.

महिला को वोटर मानते हैं तो उसकी आवाज भी सुननी होगी. उसे लाभार्थी मानते हैं तो उसे नागरिक अधिकार भी देने होंगे. उससे वोट लेते हैं तो उसकी सुरक्षा की जिम्मेदारी भी लेनी होगी.

दिल्ली की सड़कों पर गूंज रहे नारों के तर्ज पर कहे तो अब राजनीतिक दलों की बारी है कि वे बताएं...महिलाओं को आप पर भरोसा क्यों करना चाहिए?

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About the Author

अमित सिंह देश के वरिष्ठ पत्रकारों और डिजिटल मीडिया संपादकों में शामिल हैं. राजनीति, अर्थव्यवस्था, सार्वजनिक नीति और सामाजिक मुद्दों पर लेखन का उन्हें 18 वर्षों से अधिक का अनुभव है. अपने लंबे पत्रकारिता करियर में उन्होंने अनेक महत्वपूर्ण राष्ट्रीय विषयों की रिपोर्टिंग, विश्लेषण और संपादकीय नेतृत्व किया है. उनकी पहचान तथ्यों पर आधारित, संतुलित और गहन विश्लेषणात्मक लेखन के लिए है. वर्तमान में अमित सिंह Zee News की हिंदी वेबसाइट के संपादक हैं. इस भूमिका में वे संपादकीय दिशा तय करने, विशेष कवरेज की रणनीति बनाने और डिजिटल न्यूज़रूम के संचालन का नेतृत्व करते हैं.पत्रकारिता में उत्कृष्ट योगदान के लिए अमित को देश के सबसे प्रतिष्ठित सम्मानों में से एक Ramnath Goenka Excellence in Journalism Awards से सम्मानित किया जा चुका है. यह सम्मान उनकी पेशेवर विश्वसनीयता, खोजी दृष्टि और जनसरोकारों से जुड़े मुद्दों पर प्रभावशाली पत्रकारिता का प्रमाण है.अमित ने अपने करियर के दौरान भारत के अग्रणी मीडिया संस्थानों The Wire, Tehelka, Dainik Jagran, Hindustan और Aaj Tak में महत्वपूर्ण भूमिकाओं में कार्य किया है. उन्हें प्रिंट, टेलीविजन और डिजिटल तीनों माध्यमों में काम करने का अनुभव है. आप अमित सिंह से सीधे amit.singh@india.com पर ईमेल के जरिए संपर्क कर सकते हैं.
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