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ट्रंप ने ईरान को झुकाने की दी धमकी, पेजेशकियान ने UN में पलट दिया पूरा नैरेटिव, कहा- 'सरेंडर का सवाल नहीं'

UN में डोनाल्ड ट्रंप की धमकियों का पेजेशकियान ने करारा जवाब दिया. ईरानी राष्ट्रपति ने अमेरिका-इजरायल पर निशाना साधते हुए कहा कि ईरान परमाणु बम नहीं बनाएगा, लेकिन सरेंडर भी नहीं करेगा.

Written By Tahir Kamran
Published: Sep 23, 2026, 10:38 PM IST | Updated: Sep 23, 2026, 10:42 PM IST
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कल UNGA यानी संयुक्त राष्ट्र महासभा के मंच से अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान को धमकाया था. दुनिया से ईरान के आर्थिक बहिष्कार की अपील की थी. और आज ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियान ने अमेरिका में खड़े होकर ट्रंप के एक-एक हमले का जवाब दिया है. ये जवाब इतना जोरदार है, जिसका सामना करने की हिम्मत. ट्रंप की पूरी टीम. न्यूयॉर्क में होकर भी नहीं जुटा पाई. इस बात का प्रमाण आज हम आपको बताएंगे, लेकिन उससे पहले आपको ये जानना चाहिए कि UNGA में पेजेशकियान का संबोधन कैसा रहा. उनके किस वैचारिक हमले से अमेरिका तिलमिला उठा.

ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियान संयुक्त राष्ट्र महासभा में जब भाषण देने पहुंचे, तो उनके हाथ में अमेरिकी हमले में मारे गए ईरानी सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह अली खामेनेई की तस्वीर थी. सबसे पहले पेजेशकियान ने पोडियम पर अली खामेनेई और युद्ध के शुरुआती दिनों में मारे गए 150 से ज्यादा स्कूली बच्चों की तस्वीरें दिखाईं. पेजेशकियान ने कहा ईरान आतंकवादी देश नहीं है. अमेरिका और इजरायल ने ईरान पर हमला किया और ईरान ने सिर्फ हमले से अपना बचाव किया है. ईरान की जनता खुद अमेरिकी आतंकवाद की शिकार हुई है. आज संयुक्त राष्ट्र के मंच से ईरान के राष्ट्रपति ने अमेरिका और इजरायल दोनों पर निशाना साधा. संयुक्त राष्ट्र पर अमेरिका के दबाव में काम करने का आरोप लगाया. मसूद पेजेशकियान की बातें अमेरिका और इजरायल के प्रतिनिधियों को इतनी चुभीं. कि वो सभागार से बाहर निकल गए. पेजेशकियान ने अपने भाषण की शुरुआत में कहा कि

पेजेशकियान की शुरुआत भावुक थी, लेकिन जैसे-जैसे वो आगे बढ़े उनकी भाषा कड़ी होती गई. तेवर तीखे होते गए. शब्द. बाण की तरह विरोधियों को चुभते चले गए. पेजेशकियान ने कहा, ईरान ने कभी परमाणु बम बनाने की कोशिश नहीं की और कभी नहीं करेगा. और ईरान परमाणु हथियार नहीं चाहता. ईरान का परमाणु कार्यक्रम शांतिपूर्ण है और सर्वोच्च नेता के फतवे पर आधारित है, इसलिए ईरान कभी परमाणु बम नहीं बनाएगा. लेकिन शांतिपूर्ण परमाणु कार्यक्रम उसका अधिकार है. जिसपर वो काम करता रहेगा.

ईरानी राष्ट्रपति ने कहा कि बड़े परमाणु हथियारों वाले देश खुद अंतरराष्ट्रीय संधियों का उल्लंघन कर रहे हैं और ईरान पर झूठे आरोप लगा रहे हैं और यूरोपीय देशों द्वारा ईरान पर दोबारा प्रतिबंध लगाना अमेरिका के इशारे पर उठाया गया पूरी तरह नाजायज कदम है. पेजेशकियान ने कहा ईरान हमेशा बातचीत के लिए मेज पर आया, लेकिन पश्चिमी देशों ने बार-बार समझौते तोड़े और बातचीत के बीच ही युद्ध थोप दिया. उन्होंने आरोप लगाया. ताकतवर देश खुद अंतरराष्ट्रीय कानूनों को तोड़ते हैं, जिससे संयुक्त राष्ट्र का 'विश्वास बहाली' का नारा बेमतलब हो जाता है और किसी भी राष्ट्र को सैन्य ताकत या जबरदस्ती से नहीं झुकाया जा सकता. असली सुरक्षा केवल सहयोग और सम्मान से आती है.

पेजेशकियान ने आरोप लगाया. आतंकवाद का बहाना बनाकर फिलिस्तीन, सीरिया, यमन और ईरान में जानबूझकर आम नागरिकों के ठिकानों को निशाना बनाया जा रहा है और गाजा में बच्चों की हत्या, भूखमरी और अस्पतालों का विनाश पश्चिमी देशों के मानवाधिकार के दावों के खोखलेपन को साबित करता है. पेजेशकियान ने साफ किया कि ईरान पर युद्ध जबरन थोपा गया है, लेकिन वह अमेरिका या किसी अन्य देश की धमकियों से नहीं डरता है. उन्होंने आगे कहा कि ईरान कभी भी आत्मसमर्पण नहीं करेगा और अपनी आखिरी सांस तक देश की मजबूती से रक्षा करेगा.

इसका मतलब साफ है कि ईरान वार्ता को तैयार है लेकिन सरेंडर करने को तैयार नहीं है, लेकिन पेजेशकियान ने एक बार फिर से दुनिया के सामने साफ किया है. ईरान परमाणु बम नहीं बनाएगा.

डोनाल्ड ट्रंप ने कल क्या-क्या कहा था और उसका जवाब एक-एक कर. ईरानी राष्ट्रपति ने किस तरह दिया. उसे अब एकसाथ समझिए. ट्रंप ने कहा था कि परमाणु ढाल की आड़ में होने वाले बड़े आतंकी हमलों को रोकने के लिए अमेरिका ने ईरान पर सैन्य कार्रवाई की. ईरान ने साफ कर दिया वो आतंकी देश नहीं. उस पर बिना किसी वजह हमला करने वाले आतंकी हैं.

ट्रंप ने कहा था कि अमेरिका किसी भी कीमत पर ईरान को कभी भी परमाणु हथियार नहीं बनाने देगा. आज पेजेशकियान ने कहा ईरान कभी परमाणु हथियार नहीं बनाना चाहता था. ट्रंप ने इजरायल पर 7 अक्टूबर के हमले और खाड़ी देशों में अशांति के लिए ईरान को जिम्मेदार बताया. जबकि पेजेशकियान ने कहा दुनिया अमेरिका और इजरायल के आतंक पर खामोश है.

ट्रंप ने दावा किया ईरानी शासन ने इस साल अपने ही 72000 से ज्यादा नागरिकों की हत्या की है. पेजेशकियान ने बताया पिछले सात महीनों से लगातार ईरानी नागरिक हर शाम अमेरिका के खिलाफ युद्ध में एकजुटता दिखाने के लिए ईरान में एक साथ जुटते हैं. ट्रंप का आरोप था ईरान ने युद्धविराम और चर्चा के प्रयासों के बावजूद वाणिज्यिक जहाजों पर लगातार हमले किए हैं. ईरान ने आरोप लगाया. बातचीत से हर बार अमेरिका भागा. ट्रंप ने कहा जब तक ईरान परमाणु जिद, आतंक का समर्थन और जहाजों पर हमले नहीं रोकता, तब तक कोई नरमी नहीं बरती जाएगी. आज पेजेशकियान ने कहा ईरान कभी अमेरिका के सामने सरेंडर नहीं करेगा.

ईरान के राष्ट्रपति ने साफ साफ कहा कि ईरान शांति चाहता है. लेकिन वो अमेरिका के दबाव में नहीं आने वाला. ईरान की वाजिब शर्तें मानी गईं. तब ही मिडिलईस्ट में परिस्थितियां सामान्य हो पाएंगी. हालांकि एक तरह UN के मंच से ट्रंप और पेजेशकियान दूसरे को युद्ध और दुनिया की परेशानी का जिम्मेदार बता रहे हैं. दूसरी तरफ अमेरिका में मिडिलईस्ट की परेशानी को दूर करने वाला संवाद का दरवाजा भी खुला. और अमेरिका-ईरान के बीच जून के बाद पहली बार बातचीत भी शुरू हुई.

डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान से वार्ता शुरू होने की जानकारी खुद पूरी दुनिया को दी. पेजेशकियान के संबोधन से पहले ट्रंप ने कहा कि ट्रंप ने कल संयुक्त राष्ट्र में भी ईरान को धमकाया था. इसके बाद प्रेस कॉन्फ्रेंस में भी समझौता नहीं करने पर ईरान के विनाश की बात दोहराते रहे. इस बैठक में दोनों पक्षों के बीच क्या बात हुई. ट्रंप ने खुद इसके बारे में ज्यादा जानकारी नहीं दी, लेकिन ट्रंप ने दो महत्वपूर्ण बातें और कहीं. पहली ईरान के अधिकारियों के साथ अमेरिकी दूतों की बैठक सकारात्मक रही और दूसरी बड़ी बात निकट भविष्य में दोनों पक्षों की एक और बैठक तय है. ये दुनिया के लिए राहत की बात है. क्योंकि वार्ता का दरवाजा बंद होने से युद्ध का दरवाजा खुलने की आशंका बढ़ जाती है. फिलहाल दोनों ही देश युद्ध वाले दरवाजे से दूर रहना चाहते हैं. इस बैठक के बारे में अमेरिकी और ईरानी मीडिया के जरिए कुछ और जानकारियां भी मिली हैं. जिनके बारे में आपको भी जानना चाहिए.

इस वार्ता में ईरान की तरफ से विदेश मंत्री अब्बास अराघची और ईरानी अधिकारियों ने हिस्सा लिया. अमेरिका की तरफ से ट्रंप के विशेष दूत स्टीव विटकॉफ और जेरेड कुशनर वार्ता में शामिल हुए. यह प्रत्यक्ष बैठक नहीं, बल्कि अप्रत्यक्ष वार्ता थी. यानी अमेरिका और ईरान के नेता आमने सामने नहीं बैठे. अमेरिकी दूत स्टीव विटकॉफ ने बताया मध्यस्थ दोनों पक्षों के बीच संदेश का आदान-प्रदान कर रहे थे. मध्यस्थ पूरे दिन दोनों पक्षों के बीच आते-जाते रहे और लंबी चर्चा हुई.

ईरान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माइल बकाई ने जानकारी दी ईरान और अमेरिका के बीच वार्ता कतर के जरिए हुई. यानी पाकिस्तान को ईरान और अमेरिका ने बीच से हटा दिया है. इस वार्ता का मुख्य विषय युद्ध समाप्त करना और होर्मुज स्ट्रेट को खोलना था. इसके लिए ईरान ने 16 सितंबर के आसपास मध्यस्थों के जरिए अपनी नई शर्तें पहले ही अमेरिका को भेज दी थीं.

वार्ता के दौरान ईरान से फिर से अपनी मांगों को दोहराया है. ईरान ने अमेरिकी नौसैनिक नाकाबंदी हटाने और फ्रीज की गई संपत्तियां जारी करने की बात कही है. ईरान ने सभी मोर्चों पर युद्ध समाप्त करने और आर्थिक युद्ध बंद करने की शर्त भी रखी है. ईरान ने कहा कि अगर अमेरिका दबाव कम करे तो होर्मुज सात दिनों के अंदर खोला जा सकता है.

ट्रंप के सकारात्मक वार्ता वाले बयान के बाद इस बारे में भी चर्चा तेज हो गई हैं. क्या ट्रंप खुद मसूद पेजेशकियान से मुलाकात करके समझौते की उम्मीद को और मजबूत करेंगे. ट्रंप ने इस संभावित मुलाकात के लिए तैयार होने की बात कही थी. लेकिन अभी तक ऐसी किसी वार्ता की जानकारी अमेरिका या ईरान की तरफ से नहीं दी गई है. अब पेजेशकियान के आक्रामक भाषण के बाद ये मुलाकात और मुश्किल लग रही है. एक तरफ अमेरिका ईरान से समझौते की कोशिश कर रहा है. दूसरी तरफ इस बात की तैयारी भी की जा रही है. अगर समझौता नहीं हुआ तो ईरान के साथ क्या करना है. डोनाल्ड ट्रंप ने खाड़ी देशों के सहयोगियों के साथ बैठक करके इस पर भी मंथन किया है.

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने मिडिलईस्ट के 12 देशों के नेताओं के साथ एक साथ बैठक की. इस बैठक में खाड़ी सहयोग परिषद यानी GCC के सऊदी अरब, यूएई, कतर, बहरीन, कुवैत और ओमान के नेताओं के अलावा तुर्किए के राष्ट्रपति रजब तैयब एर्दोगन, सीरिया के राष्ट्रपति अहमद अल-शरा, जॉर्डन के किंग अब्दुल्ला द्वितीय, इराक के प्रधानमंत्री अली अल-ज़ैद, और मिस्र और लेबनान के नेता भी मौजूद थे. यानी इजरायल और ईरान को छोड़कर क्षेत्र के सभी प्रमुख देश शामिल थे. इसी मीटिंग में ट्रंप ने बताया अगर ईरान समझौता नहीं करता तो अमेरिका आगे क्या क्या करेगा.

डोनाल्ड ट्रंप ने इस मीटिंग में कहा कि अगर ईरान के साथ बात नहीं बनी तो अमेरिका ईरान के पिकैक्स माउंटेन परमाणु केंद्र पर बमबारी कर सकता है. डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के प्रभाव वाले समुद्री मार्ग के विकल्प के तौर पर इंडिया मिडिल-ईस्ट यूरोप इकोनॉमिक कॉरिडोर को समर्थन देने की बात कही है.

डोनाल्ड ट्रंप का कहना है कि दुनिया को होर्मुज जैसे पुराने और असुरक्षित समुद्री रास्तों पर निर्भर रहने के बजाय, तेल और व्यापार को दूसरे सुरक्षित रास्तों पर शिफ्ट करना होगा. ये खबर भारत के लिए भी अच्छी है. क्योंकि IMEC के जरिए भारत, अरब देशों और यूरोप के बीच जमीन, रेल और समुद्र के सुरक्षित नेटवर्क से व्यापार होगा. इसके साथ ही तेल निकालने के लिए नई पाइपलाइनों का जाल बिछाया जाएगा.

हालांकि डोनाल्ड ट्रंप ने इस कॉरिडोर में इजरायल के शामिल होने का कोई जिक्र नहीं किया. इसके पीछे कारण यह है कि तुर्किए और सऊदी अरब इस बात का दबाव बना रहे हैं कि यह कॉरिडोर इजरायल के बजाय सीरिया और लेबनान से होकर गुजरे. इस बैठक में यमन के हूती विद्रोहियों पर भी चर्चा हुई. अमेरिका और अरब देशों ने हूती विद्रोहियों को ईरान से मिल रही क्रूज मिसाइलें और आधुनिक ड्रोन जैसी उन्नत तकनीकों पर चिंता जाहिर की. खाड़ी देशों ने अमेरिका के साथ इस बात पर भी चर्चा की कैसे हूती को रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण बाब अल-मंदेब पर नियंत्रण बढ़ाने से रोका जाए.

ये सभी खाड़ी देश डॉलर आधारित तेल व्यापार में अमेरिका के सबसे बड़े सहयोगी हैं, लेकिन ईरान और रूस-यूक्रेन वॉर से दुनिया में तेल कारोबार सबसे ज्यादा प्रभावित हुआ है. इसका असर अब अमेरिका में भी दिख रहा है. दुनिया के बड़े तेल उत्पादक अमेरिका में खुद डीजल बहुत महंगा हो गया है. जिसके बाद डोनाल्ड ट्रंप ने डीजल को लेकर बड़ा ऐलान किया है. जो सारी दुनिया पर प्रभाव डाल सकता है.

डोनाल्ड ट्रंप चाहते हैं कि अमेरिका अब दुनिया को डीजल एक्सपोर्ट ना करे. अमेरिका दुनिया का सबसे बड़ा डीजल एक्सपोर्टर है और अमेरिका ने दुनिया को डीजल की सप्लाई बंद कर दी तो दुनिया में एक नया संकट शुरू हो जाएगा. इसका विश्लेषण हम आगे करेंगे, लेकिन पहले आप समझिए, ट्रंप क्यों दुनिया को डीजल का एक्सपोर्ट बंद करने की तैयारी कर रहे हैं. इसकी सबसे बड़ी वजह है. अमेरिका में डीजल के ऊंचे होते दाम. जिससे अमेरिका में महंगाई बढ़ रही है. इसका सीधा असर ट्रंप के मिडटर्म इलेक्शन पर पड़ सकता है. आज आपको अमेरिका और दुनिया पर भारी पड़ रहे डीजल के बढ़ते दामों का गणित भी समझना चाहिए.

अमेरिका में डीजल की औसत कीमत 6.50 डॉलर प्रति गैलन के पार पहुंच गई है, जो एक ऐतिहासिक ऊंचाई है. एक साल पहले यानी सितंबर 2025 में अमेरिकी में डीजल की कीमत साढ़े तीन डॉलर प्रति गैलन थी. यानी एक साल में डीजल की कीमतें करीब 77% तक बढ़ चुकी हैं. ये हाल उस वक्त है. जब अमेरिकी रिफाइनरियां 8 साल में सबसे ज्यादा डीजल का उत्पादन कर रही हैं. रिफाइनरियां दिन-रात पूरी क्षमता पर काम कर रही हैं, फिर भी वे इतना डीजल नहीं बना पा रही हैं कि बाजार की मांग पूरी हो सके.

इसकी वजह दुनिया में युद्धों की वजह से डीजल की कमी और इस कमी की वजह से डीजल में मिल रहा भारी मुनाफा है. जिसके कारण अमेरिका रिफाइनरियां इस वक्त 13 लाख बैरल डीजल प्रतिदिन एक्सपोर्ट कर रही हैं. यानी इतनी बड़ी मात्रा में डीजल देश से बाहर भेज रही हैं. और अमेरिका में डीजल महंगा हो रहा है. डीजल महंगा होने का मतलब है माल ढुलाई महंगी होना. ट्रकों का परिवहन खर्च बढ़ने से सुपरमार्केट में किराने का सामान, दवाएं और हर तरह की जरूरत की चीजें महंगी हो रही हैं.

चुनाव से पहले अमेरिकी मतदाताओं के लिए ये एक बहुत बड़ा मुद्दा हैं. रिपब्लिकन और डेमोक्रेट दोनों पर दबाव है कि वे घरेलू कीमतें कम करें. यानी जो डीजल अमेरिकी कंपनियों को सबसे ज्यादा डॉलर कमा कर दे रहा है. अब ट्रंप चुनाव की वजह से उसके ही एक्सपोर्ट को बंद करने का प्लान बना रहे हैं. आज आपको समझना चाहिए कैसे ट्रंप अपने ही बनाए जाल में फंस गए हैं.

अमेरिका की मदद से रूस की रिफाइनरियों पर यूक्रेन के हमले जारी हैं. लेकिन इस आग में सिर्फ रूस की इकोनॉमी नहीं जल रही है. ट्रंप की घरेलू राजनीति में भी आग लग गई है. रूस अमेरिका के बाद दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा डीजल निर्यातक देश रहा है. वह दुनिया के कुल डीजल का लगभग 11% हिस्सा सप्लाई करता था, लेकिन यूक्रेन ने ड्रोन हमलों ने रूस की डीजल उत्पादन क्षमता की कमर तोड़ दी है. पहले ये हमले ट्रंप को अच्छे लग रहे थे, लेकिन अब इससे ट्रंप चिंतित हैं.

डोनाल्ड ट्रंप, राष्ट्रपति, अमेरिका ने कहा कि रूस को इससे गंभीर नुकसान हुआ है. लेकिन इसका असर डीजल की कीमत पर भी पड़ा है. डीजल तेल और डीजल ईंधन की कीमत काफी बढ़ गई है. यूक्रेन के हमलों के कारण रूस के पास खुद अपनी सेना और घरेलू नागरिकों के लिए ही डीजल कम पड़ने लगा. जिसके बाद रूस ने डीजल के एक्सपोर्ट पर प्रतिबंध लगा दिया. जिससे दुनिया के बाजार से अचानक लाखों बैरल डीजल गायब हो गया.

ईरान युद्ध की वजह से मिडिल ईस्ट से पहले ही तेल की सप्लाई 40 प्रतिशत कम हो गई है. रूस ने डीजल का निर्यात बंद दिया तो इसका फायदा उठाकर अमेरिकी कंपनियों ने दुनिया को महंगा डीजल बेचना शुरू कर दिया. लेकिन इससे खुद अमेरिका में डीजल की कमी हो गई. इसी वजह से अमेरिका में डीजल निर्यात पर रोक लगाने की मांग शुरू हो गई है. अब ट्रंप भी इस मांग के साथ खड़े हैं.

डोनाल्ड ट्रंप, राष्ट्रपति, अमेरिका ने कहा कि मैंने भी इसकी मांग की है. मैंने कहा है कि डीजल को बाहर नहीं भेजना चाहिए. हम बहुत सारा डीजल बनाते हैं. आज आपको ये भी समझना चाहिए, अगर अमेरिका ने डीजल का एक्सपोर्ट बंद कर दिया तो इसका दुनिया और हमारे देश पर क्या असर होगा. यूरोप ने यूक्रेन युद्ध के बाद रूसी डीजल का आयात बंद कर दिया था और उसकी सबसे बड़ी निर्भरता अमेरिकी आपूर्ति पर हो गई थी.

अगर अमेरिकी खेप रुकती है, तो यूरोप में डीजल का गंभीर अकाल पड़ जाएगा. फ्रांस, जर्मनी, ब्रिटेन जैसे यूरोपीय देशों में सार्वजनिक परिवहन, माल ढुलाई ट्रकों और भारी उद्योगों के लिए ईंधन की राशनिंग करनी पड़ सकती है. यानी सरकार नियम बना सकती है कि कोई भी व्यक्ति अपनी गाड़ी में एक बार में 10 या 20 लीटर से ज्यादा डीजल नहीं भरवा सकता.

यूरोप में सर्दियों के दौरान बड़े पैमाने पर हीटिंग ऑयल की जरूरत होती है जो डीजल का ही एक रूप है. सप्लाई रुकने से बिजली-हीटिंग बिल रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच जाएंगे. मेक्सिको, ब्राजील, चिली और कोलंबिया जैसे लैटिन अमेरिकी देशों में तो रोज का ट्रांसपोर्ट रुक सकता है, लेकिन इससे रिलायंस और नायरा जैसी भारतीय निजी रिफाइनरियों के पास यूरोप और लैटिन अमेरिका से डीजल के भारी ऑर्डर आएंगे. भारतीय रिफाइनरियों के डीजल बनाने की लागत और बेचने की कीमत का अंतर बढ़ेगा. जिससे उन्हें बड़ा वित्तीय मुनाफा होगा, लेकिन घरेलू स्तर पर अंतरराष्ट्रीय कीमतों का दबाव बढ़ेगा. यानी भारत में डीजल महंगा हो सकता है.

वहीं खुद अमेरिका में डीजल निर्यात नहीं होगा, तो वहां की रिफाइनरियों के पास डीजल रखने की जगह खत्म हो जाएगी. मजबूरन उन्हें अपना उत्पादन घटाना पड़ेगा. यानी अमेरिका के सामने एक तरफ कुआं और दूसरी तरफ खाई वाली स्थिति है. अगर अमेरिका डीजल निर्यात जारी रखता है, तो घर में महंगाई बढ़ती है और चुनाव में नुकसान होता है. निर्यात रोकता है, तो दुनिया में संकट आता है और बाद में खुद अमेरिका की रिफाइनरियां बैठ जाती हैं. इसीलिए ट्रंप अब युद्धों की वजह से चिंतित दिख रहे हैं. और UN मीटिंग के दौरान नेताओं से वार्ता का इस्तेमाल संघर्ष रोकने के लिए करना चाहते हैं.

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About the Author

Zee News में नेशनल डेस्क पर देश–विदेश और राजनीति से जुड़ी खबरें लिखते हैं. करियर का आगाज 2015 से 'पंजाब केसरी' ग्रुप के उर्दू अखबार ‘हिंद समाचार’ से किया, जहां वे कंटेट राइटर से पेज डिजाइनर तक पहुंचे. इसके बाद उर्दू, हिंदी और पंजाबी - तीनों भाषाओं में काम करने का मौका मिला. 2018 में डिजिटल की तरफ कूच करते हुए पंजाब केसरी ग्रुप की उर्दू वेबसाइट की लॉन्चिंग टीम का नेतृत्व किया. इसके बाद 2020 में 'Zee Salaam' ज्वाइन किया, यहां भी वेबसाइट को लॉन्च करने के साथ-साथ तीन साल टीम का नेतृत्व भी किया. इसी दौरान ZEE Delhi NCR वेबसाइट भी लॉन्च हुई, जिसमें उनका अहम योगदान रहा. 2023 में India Daily Live की लॉन्चिंग टीम के साथ काम किया और शुरुआती दिनों में हिंदी के अलावा पंजाबी, तमिल, तेलुगु और गुजराती वेबसाइट टीमों को मैनेज किया. अक्टूबर 2024 में फिर से Zee Media में में वापसी करते हुए नेशनल टीम का हिस्सा बने. तकनीक में दिलचस्पी की वजह से उन्होंने React.js और वेब डिजाइनिंग सीखी. यही कारण है कि उनकी खबरों में HTML-CSS के छोटे-छोटे ग्राफिक्स दिख जाते हैं, जो मुश्किल बातों को भी आसान बना देते हैं. करियर की शुरुआत में कुछ दिनों तक फोटो स्टूडियो में भी काम किया, जहां कैमरा, Adobe Photoshop और ग्राफिक डिजाइनिंग सीखी, जो आज भी उनके डिजिटल काम में मदद करता है. उर्दू शायरी से प्यार अलग ही है. ग़ज़लें, नज़्में, गीत भी लिखते हैं और कई अखबारों में उनकी शायरी छप भी चुकी हैं. राहत इंदौरी, मुनव्वर राणा, अनवर जलालपुरी खुशबीर सिंह शाद और नवाज देवबंदी, माजिद देवबंदी  जैसे शायरों के इंटरव्यू व बातचीत का अनुभव भी उनके पास है. आप tahir.kamran@india.com पर सीधे ईमेल या फिर नीचे X और Facbook से जुड़ सकते हैं. 
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