कुदरत का भयानक रूप: 2026-27 में आ रहा 'सुपर एल नीनो', 10 लाख मौतों की चेतावनी से दुनिया में हड़कंप
आने वाले 2 साल हम सबके लिए बहुत भारी होने वाले हैं. ऐसा हम नहीं कह रहे बल्कि मौसम के जानकारों ने 2026-27 में आ रहे 'सुपर एल नीनो' को लेकर ऐसा अलर्ट जारी किया है, जिसने पूरी दुनिया के होश उड़ा दिए हैं. आइए जानते हैं मामला..
कल्पना कीजिए, अगले दो सालों में सिर्फ गर्मी की वजह से 10 लाख से ज्यादा लोगों की जान चली जाए. यह किसी डरावनी फिल्म की कहानी नहीं, बल्कि जलवायु वैज्ञानिकों की सीधी चेतावनी है. साल 2026-27 में आ रहा 'सुपर एल नीनो' दुनिया को ऐसी गर्मी, सूखे, बाढ़ और बीमारियों की चपेट में ले सकता है, जिसका सामना इंसानियत ने पहले कभी नहीं किया. सबसे चिंता की बात यह है कि भारत और उसके पड़ोसी देश इस खतरे के सबसे करीब खड़े हैं.
शिकागो यूनिवर्सिटी की क्लाइमेट इम्पैक्ट लैब की नई रिसर्च के मुताबिक, जून 2026 से फरवरी 2027 के बीच सुपर एल नीनो की वजह से दुनियाभर में करीब 4 लाख 50 हजार लोगों की मौत सिर्फ गर्मी से होने की आशंका है. इनमें ज्यादातर मौतें दुनिया के गरीब और विकासशील देशों (ग्लोबल साउथ) में होंगी. साल 2027 खत्म होते-होते यह आंकड़ा 10 लाख के पार जा सकता है.
सबसे तीखा असर कब दिखेगा?
दरअसल, एल नीनो का सबसे तीखा असर नवंबर-दिसंबर में इसके चरम पर पहुंचने के कुछ महीनों बाद दिखता है, क्योंकि धरती की जलवायु व्यवस्था को प्रतिक्रिया देने में समय लगता है. शोधकर्ताओं ने दुनिया के 24,378 इलाकों का आकलन किया, लेकिन फरवरी 2027 के बाद के विस्तृत तापमान अनुमान उपलब्ध न होने से रिपोर्ट की समय-सीमा वहीं तक सीमित रखी गई.
स्टडी के मुताबिक 2027 में बेहद गर्म दिनों की संख्या में 44 फीसदी का इजाफा होगा. चौंकाने वाली बात यह है कि आज जो दिन 'असामान्य रूप से गर्म' माने जा रहे हैं, 2040 के दशक तक वही 'सामान्य' गर्मी के दिन बन जाएंगे. इंपीरियल कॉलेज लंदन की जलवायु वैज्ञानिक फ्रेडरिक ओटो के मुताबिक, एल नीनो हमें समय से पहले ही उस भविष्य में धकेल रहा है, जिसके तापमान को झेलने के लिए हमें खुद को ढालने में अभी दो दशक और लगने चाहिए थे.
रिपोर्ट यह भी बताती है कि इस वसंत और गर्मी में भारत, पाकिस्तान और दक्षिण एशिया के बाकी हिस्सों में गर्मी से होने वाली मौतों में खासा उछाल आएगा. इस क्षेत्र पर एक अलग फॉलो-अप स्टडी अभी जारी है.
गर्मी का कहर, जो सरकारी आंकड़ों में कभी दर्ज नहीं होता
गर्मी से होने वाली मौतों का सही आंकड़ा अक्सर बहुत कम करके आंका जाता है. अमेरिका में सेंटर्स फॉर डिजीज कंट्रोल (CDC) के मुताबिक 2018 तक हर साल औसतन 700 लोगों की मौत गर्मी से होती थी, जो अब बढ़कर करीब 1,000 सालाना हो गई है. लेकिन बोस्टन यूनिवर्सिटी और NPR के दो साल लंबे शोध में सामने आया कि असल आंकड़ा कहीं ज्यादा है, हर साल कम से कम 9,000 से 10,000 अमेरिकी गर्मी की वजह से दम तोड़ते हैं.
फ्लोरिडा राज्य में तो हालात और भी गंभीर हैं. शोधकर्ताओं के अनुमान के मुताबिक वहां हर साल करीब 1,900 मौतें गर्मी से होती हैं, जो सरकारी आंकड़ों से लगभग 40 गुना ज्यादा है.
NCRB ने 2000-2020 के बीच कुल 20,615 हीटस्ट्रोक मौतें दर्ज कीं, जबकि IMD के अपने आकलन में यही आंकड़ा सिर्फ 10,545 है, यानी दो सरकारी महकमों के अपने आंकड़े ही लगभग आधे का फर्क रखते हैं. अकेले 2020 में NCRB ने 530 हीटस्ट्रोक मौतें गिनाईं, जबकि राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA) ने उसी साल सिर्फ 4 मौतें दर्ज कीं.
2024 की सिर्फ जून-सितंबर अवधि में Nature Medicine की एक स्टडी के मुताबिक भारत में करीब 62,775 मौतें गर्मी से जुड़ी थीं, जो सरकारी सालाना आंकड़ों से कहीं ज्यादा है.
आखिर यह अंतर इतना बड़ा क्यों है? गर्मी अक्सर सेहतमंद लोगों की जान तो कम ही लेती है, लेकिन हाई ब्लड प्रेशर या दिल की बीमारी जैसी मौजूदा परेशानियों को जानलेवा बना देती है. चूंकि गर्मी शरीर पर कोई सीधा निशान नहीं छोड़ती, डॉक्टर मौत की वजह सिर्फ 'हार्ट अटैक' या 'किडनी फेल' लिख देते हैं, जबकि असली जड़ तपिश होती है.
बुजुर्ग और गर्भवती महिलाएं सबसे ज्यादा खतरे में
पिछले एक दशक में 65 साल से ऊपर के बुजुर्गों में गर्मी से होने वाली मौतें दोगुनी से भी ज्यादा बढ़ गई हैं. वेलकम ट्रस्ट के एक सर्वे में ब्रिटेन से लेकर जिम्बाब्वे तक के 70 फीसदी से ज्यादा स्वास्थ्यकर्मियों ने माना कि पिछले पांच सालों में गर्भवती महिलाओं में गर्मी से जुड़ी परेशानियां काफी बढ़ी हैं. इन स्वास्थ्यकर्मियों ने यह भी बताया कि गर्भ में पल रहे बच्चों के विकास और नवजातों की सेहत पर भी इसका बुरा असर पड़ रहा है.
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) की मानें तो दुनिया में मौत की जितनी भी बड़ी वजहें पहले से मौजूद हैं, उनमें से 90 फीसदी में भीषण गर्मी जोखिम को और बढ़ा देती है. यानी गर्मी सिर्फ एक नई बीमारी नहीं, बल्कि पहले से मौजूद खतरों को और घातक बनाने वाला कारक है.
यूरोप भी तैयार नहीं
यह मुश्किल सिर्फ गरीब देशों की नहीं है. यूरोप भी अपनी नई, ज्यादा गर्म जलवायु के लिए तैयार नहीं दिख रहा. पिछली गर्मियों में लगातार पड़ी भीषण गर्मी से यूरोप में कम से कम 40,000 अतिरिक्त मौतें हुईं, और इसका पूरा आकलन अभी बाकी है.
सबसे चौंकाने वाला मामला जर्मनी का है, जो अपनी ठंडी और बादलों भरी गर्मियों के लिए जाना जाता रहा है. वहां इस बार रिकॉर्ड 16,000 मौतें गर्मी से हुईं. मौसम विभाग ने पहले से काफी चेतावनी दी थी, लेकिन एक नई रिपोर्ट के मुताबिक जर्मनी का भवन, कूलिंग, पानी और परिवहन से जुड़ा ढांचा ऐसी जलवायु के हिसाब से बना था जो अब वजूद में ही नहीं है, और वहां का स्वास्थ्य तंत्र भी गर्मी झेलने लायक नहीं है.
दिलचस्प बात यह है कि यूरोप की इस भीषण गर्मी में एल नीनो का योगदान अपेक्षाकृत कम रहा, असली वजह जलवायु परिवर्तन है, जिसने गर्मी भरे दिनों की संख्या सात गुना तक बढ़ा दी है. अगली गर्मियों में एल नीनो, 1.5 डिग्री सेल्सियस पहले से गर्म हो चुकी इस जलवायु में कम से कम 20 फीसदी और गर्मी जोड़ देगा, जिससे गर्मी भरे दिनों की तादाद और बढ़ना तय है.
भारत-पाकिस्तान पर मंडरा रहा सबसे बड़ा खतरा
भारतीय पाठकों के लिए असली चिंता की बात यही है. अमेरिका और यूरोप की तबाही की कहानियां दूर की लग सकती हैं, लेकिन रिपोर्ट सीधे तौर पर भारत, पाकिस्तान और दक्षिण एशिया के बाकी हिस्सों की ओर इशारा करती है, जहां इस साल वसंत और गर्मी के मौसम में हीट से जुड़ी मौतों में बड़ा उछाल आने की आशंका जताई गई है. चूंकि यह इलाका पहले से ही दुनिया के सबसे गर्म और सबसे घनी आबादी वाले क्षेत्रों में शुमार है, सुपर एल नीनो का असर यहां कहीं ज्यादा गहरा हो सकता है.
शोधकर्ता फिलहाल दक्षिण एशिया पर एक अलग, ज्यादा विस्तृत अध्ययन पर काम कर रहे हैं, जिसके नतीजे आने अभी बाकी हैं. लेकिन अभी तक सामने आए रुझान इतने साफ हैं कि भारत जैसे देशों के लिए गर्मी से निपटने की तैयारियां अब टाली नहीं जा सकतीं, चाहे वह अस्पतालों में कूलिंग सुविधा हो, बाहर काम करने वाले मजदूरों के लिए काम के घंटों में बदलाव हो या शहरों में हीटवेव चेतावनी तंत्र मजबूत करना हो.
सूखा, बाढ़ और भूख का तिहरा संकट
एल नीनो सिर्फ गर्मी तक सीमित नहीं रहता. इसके साथ सूखा, बाढ़, जंगल की आग और तूफानों से होने वाली मौतों में भी इजाफा होने का अंदेशा है, साथ ही पानी और खाने की किल्लत भी बढ़ेगी. तूफान या जंगल की आग से होने वाली मौतों का सही अनुमान लगाना मुश्किल है, हालांकि यह लगभग तय है कि इनकी संख्या गर्मी से होने वाली मौतों से कहीं कम रहेगी.
असली खतरा पानी और खाने की कमी से जुड़ा है, क्योंकि यह अक्सर बीमारियों के फैलने की वजह बनता है. एल नीनो के साथ-साथ मध्य-पूर्व और यूक्रेन में चल रहे संघर्षों ने भी खाने की कीमतें पहले से ऊपर धकेल दी हैं, जिससे बहु-वर्षीय खाद्य संकट का खतरा काफी बढ़ गया है. वर्ल्ड फूड प्रोग्राम (WFP) का अनुमान है कि 2027 में अतिरिक्त 4.9 करोड़ लोग गंभीर भुखमरी की चपेट में आ जाएंगे.
इसका मतलब है कि अगले साल करीब 30 करोड़ लोग गंभीर भूख से जूझेंगे, जिससे बीमारियां फैलने का खतरा भी बढ़ जाएगा. लंबे समय तक कुपोषण शरीर की संक्रमण से लड़ने की ताकत कमजोर कर देता है, और खाद्य संकट अक्सर लोगों को ऐसे हालात में धकेल देता है जहां बीमारियां आसानी से फैलती हैं. अकाल या सूखे से होने वाली ज्यादातर मौतें सीधे भूख से नहीं, बल्कि कुपोषण और खराब रहन-सहन से पनपने वाली बीमारियों से होती हैं.
जब भूख बन जाती है बीमारियों का दरवाजा
इसकी सबसे बड़ी मिसाल सोमालिया है. 2022 में वहां पड़े सूखे पर विश्व स्वास्थ्य संगठन और यूनिसेफ के सहयोग से हुई एक स्टडी के मुताबिक करीब 43,000 अतिरिक्त मौतें हुईं. अध्ययन के मुताबिक इनमें ज्यादातर मौतें सीधे भूख से नहीं, बल्कि कुपोषण, कमजोर स्वास्थ्य सुविधाओं और दूषित पानी से फैली संक्रामक बीमारियों से हुईं.
मौसम के मिजाज में उलटफेर करके एल नीनो डेंगू, मलेरिया, रिफ्ट वैली बुखार और हैजे जैसी बीमारियों के फैलने के लिए अनुकूल हालात बना देता है. मिसाल के तौर पर, 2015-16 के मजबूत एल नीनो ने ब्राजील और इंडोनेशिया समेत दक्षिण-पूर्व एशिया में असामान्य रूप से गर्म और सूखा मौसम ला दिया था, जिससे डेंगू के बड़े प्रकोप फैले.
एक नई स्टडी के मुताबिक इंडोनेशिया में मजबूत एल नीनो वाले सालों में डेंगू के मामले करीब दोगुने हो जाते हैं. साल 2024 में, जब एल नीनो अपेक्षाकृत कमजोर था, तब भी वहां डेंगू के 2 लाख 70 हजार मामले और 1,200 मौतें दर्ज हुईं. विशेषज्ञों का मानना है कि द्वीपसमूह होने के चलते वहां आंकड़े जुटाने में आने वाली दिक्कतों को देखते हुए असली संख्या इससे भी कहीं ज्यादा हो सकती है.
खाद्य सुरक्षा अब टालने वाला मसला नहीं
सुपर एल नीनो की यह चेतावनी सिर्फ मौसम विज्ञान की भविष्यवाणी नहीं, बल्कि आने वाले महीनों के लिए एक सीधी तैयारी-सूची है. गर्मी, सूखा, भूख और बीमारी, ये सब आपस में जुड़े हुए हैं और एक-दूसरे को और भयावह बनाते हैं. ऐसे में खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करना पहले कभी इतना जरूरी नहीं रहा, जितना अब है, खासकर भारत जैसे देशों के लिए, जहां करोड़ों लोग पहले से ही गर्मी और कृषि अनिश्चितता के बीच जीवन गुजार रहे हैं.
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