Analysis: सांप का डसना या सिस्टम की चूक? भारत से दुनिया तक सर्पदंश का छिपा हुआ जानलेवा संकट
उत्तर प्रदेश के हाथरस में एक रात में पांच लोगों को सांप काटने से लेकर इटारसी में सर्प विशेषज्ञ की गंभीर हालत तक की हालिया घटनाएं सर्पदंश के बढ़ते खतरे की याद दिलाती हैं. नए वैश्विक शोध के मुताबिक, दुनिया में हर साल 70 लाख तक लोगों के शरीर में सांप का जहर पहुंच सकता है.
उत्तर प्रदेश के हाथरस में 14 अक्टूबर की रात अलग-अलग इलाकों में पांच लोगों को सांप ने काट लिया. कोई तालाब के पास था, कोई खेत में और कोई शौच के लिए गया था. सभी को इलाज के लिए जिला अस्पताल में भर्ती कराया गया.
मध्य प्रदेश के इटारसी में जाने-माने समाजसेवी सर्प विशेषज्ञ अभिजीत यादव जंगल में रेस्क्यू किए गए कोबरा को छोड़ते समय उसके डसने का शिकार हो गए. उनकी हालत इतनी गंभीर बताई गई कि उन्हें वेंटिलेटर पर रखना पड़ा.
मध्य प्रदेश के ही छतरपुर जिले के कैंडी धाम के प्रमुख अजयपार बाबा को एक जहरीले सांप ने डस लिया है. सांप के काटने के बाद बाबा की हालत गंभीर हो गई, जिसके बाद उन्हें तुरंत एक स्थानीय अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा.
बिहार के गया में करैत के काटने के बाद ऑटो चालक अनिल कुमार करीब 48 घंटे तक जिंदगी और मौत से जूझते रहे. उत्तर प्रदेश के अम्बेडकरनगर में रात को सोते समय सांप के डसने से 17 वर्षीय छात्रा की इलाज के दौरान मौत हो गई.
ये सारी घटनाएं पिछले 24 घंटे में मीडिया में रिपोर्ट हुई हैं. इन घटनाओं में जगह, परिस्थिति और पीड़ित अलग-अलग हैं, लेकिन एक सवाल साझा है कि क्या सांप के काटने से होने वाली मौतों को अब भी केवल दुर्भाग्य या प्राकृतिक खतरा मानकर छोड़ दिया जाएगा?
या फिर इसे सार्वजनिक स्वास्थ्य की ऐसी चुनौती माना जाएगा जिससे समय पर इलाज, बेहतर स्वास्थ्य सेवाओं और जागरूकता के जरिए हजारों जानें बचाई जा सकती हैं?
ताजा वैज्ञानिक शोध इस सवाल को और गंभीर बना देता है. दुनिया भर में सर्पदंश का वास्तविक खतरा पुराने अनुमानों से कहीं अधिक हो सकता है.
समस्या सिर्फ सांपों के जहर में नहीं बल्कि उन व्यवस्थागत कमियों में भी है जो जहर के शरीर में पहुंचने के बाद जिंदगी और मौत के बीच का अंतर तय करती हैं.
भारत में सर्पदंश का आंकड़ा अधूरा, खतरा बड़ा
भारत में सांप का काटना कोई असामान्य घटना नहीं है. खेती-किसानी, ग्रामीण जीवन, कच्चे मकान, जलभराव और रात में अपर्याप्त रोशनी इंसान और सांप के बीच संपर्क की आशंका बढ़ाते हैं. बरसात के मौसम में यह जोखिम और बढ़ जाता है.
विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) की ओर से किए गए एक राष्ट्रीय स्तर के अध्ययन के मुताबिक, भारत में 2000 से 2019 के बीच सर्पदंश से लगभग 12 लाख मौतों का अनुमान है. यानी औसतन करीब 58,000 मौतें हर साल हुई हैं. इनमें लगभग एक चौथाई पीड़ित 15 साल से कम उम्र के बच्चे थे.
अध्ययन के अनुसार, 2001 से 2014 के बीच सर्पदंश से हुई मौतों का करीब 70 प्रतिशत हिस्सा बिहार, झारखंड, मध्य प्रदेश, ओडिशा, उत्तर प्रदेश, आंध्र प्रदेश, राजस्थान और गुजरात जैसे राज्यों में केंद्रित था.
यहां एक महत्वपूर्ण बात समझनी होगी. 58,000 सालाना मौतों का आंकड़ा एक अनुमान है, न कि हर साल सरकारी अस्पतालों में दर्ज मौतों की संख्या है. आधिकारिक रिकॉर्ड और वास्तविक स्थिति के बीच बड़ा अंतर लंबे समय से चिंता का विषय रहा है.
इसी अंतर को समझने के लिए 10 नवंबर 2025 को नेचर कम्युनिकेशन्स में प्रकाशित भारत के एक अध्ययन पर गौर करना जरूरी है. इस शोध में 11 राज्यों के 25 जिलों में करीब छह करोड़ की आबादी को शामिल किया गया और एक साल तक सर्पदंश के मामलों की निगरानी की गई.
इस दौरान 7,094 मामले दर्ज हुए. दर्ज मौतों में लगभग 43 प्रतिशत अस्पताल के बाहर या अस्पताल पहुंचने से पहले हुईं.
करीब 62 प्रतिशत घटनाएं जून से सितंबर के बीच हुईं. औसत इलाज खर्च लगभग 6,500 रुपये रहा जबकि निजी अस्पतालों में यह औसतन 27,400 रुपये के आसपास था.
हालांकि, इस अध्ययन को पूरे भारत का अंतिम आंकड़ा नहीं माना जा सकता. इसके दायरे में उत्तर प्रदेश, बिहार और मध्य प्रदेश जैसे बड़े और सर्पदंश के लिहाज से महत्वपूर्ण राज्य शामिल नहीं थे.
शोधकर्ताओं ने भी राष्ट्रीय स्तर पर आंकड़ों के अधूरेपन और कम रिपोर्टिंग की समस्या रेखांकित की.
यही भारत की पहली बड़ी चुनौती है कि जिस बीमारी के कारण हजारों लोगों की मौत होने का अनुमान है, उसकी वास्तविक व्यापकता, प्रभावित इलाकों और इलाज की जरूरतों का सटीक आकलन अब भी मुश्किल है.
जब आंकड़े ही अधूरे हों तो दवा की जरूरत, अस्पतालों की तैयारी और सरकारी संसाधनों का सही वितरण कैसे सुनिश्चित होगा?
दुनिया में हर साल 70 लाख तक मामले
अब तक डब्ल्यूएचओ के प्रचलित अनुमानों के मुताबिक, दुनिया भर में हर साल करीब 54 लाख सांप काटने की घटनाएं होती हैं. इनमें 18 लाख से 27 लाख मामलों में सांप का जहर शरीर में पहुंचता है.
सर्पदंश के कारण सालाना 81,000 से 1,38,000 मौतें होने का अनुमान है. इसके अलावा, लगभग चार लाख लोग स्थायी अक्षमता या गंभीर शारीरिक समस्याओं का सामना कर सकते हैं.
लेकिन अक्टूबर 2026 में चर्चा में आए एक नए वैश्विक अध्ययन ने इस तस्वीर को और भयावह बना दिया है. 'प्लॉस मेडिसिन' पत्रिका में प्रकाशित शोध के मुताबिक, दुनिया भर में हर साल कम से कम 21 लाख लोगों के शरीर में सांप का जहर पहुंचने की आशंका है.
ऊंचे अनुमान के अनुसार, यह संख्या 70 लाख तक हो सकती है. सालाना मौतों का अनुमान भी 2.74 लाख से 5.13 लाख के बीच है.
इस अध्ययन ने अलग-अलग देशों से उपलब्ध शोध और आंकड़ों की समीक्षा की और सांख्यिकीय मॉडलिंग के जरिए उन इलाकों में भी जोखिम का अनुमान लगाया, जहां विश्वसनीय जानकारी उपलब्ध नहीं है.
शोधकर्ताओं ने खास तौर पर इस बात पर जोर दिया कि अनेक देशों में सर्पदंश की घटनाएं और उनसे होने वाली मौतें व्यवस्थित तरीके से दर्ज नहीं की जातीं. इसलिए वास्तविक वैश्विक बोझ का अनुमान लगाना कठिन है.
यहां एक जरूरी अंतर समझना होगा. 70 लाख और 5.13 लाख के आंकड़े अध्ययन के ऊंचे अनुमान हैं, न कि दुनिया भर में दर्ज मामलों और मौतों की प्रमाणित गिनती है.
इन्हें पुराने डब्ल्यूएचओ अनुमानों के साथ सीधे जोड़ना या यह कहना कि मौतों की संख्या निश्चित रूप से इतनी ही है, वैज्ञानिक रूप से सही नहीं होगा. लेकिन इतना स्पष्ट है कि उपलब्ध रिकॉर्ड वास्तविक खतरे को कम करके दिखा सकते हैं.
नए शोध के अनुसार, उप-सहारा अफ्रीका वैश्विक सर्पदंश के बोझ का सबसे बड़ा केंद्र हो सकता है. अध्ययन में इस क्षेत्र के हिस्से में दुनिया के लगभग 45 प्रतिशत मामले और मौतें आने का अनुमान लगाया गया है.
दक्षिण एशिया और दक्षिण-पूर्व एशिया भी गंभीर रूप से प्रभावित क्षेत्र हैं. यानी सर्पदंश का संकट किसी एक देश या महाद्वीप तक सीमित नहीं, बल्कि गरीबी, ग्रामीण जीवन और स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता से जुड़ी वैश्विक समस्या है.
डब्ल्यूएचओ का लक्ष्य: 2030 तक मौतें और दिव्यांगता आधी करना
विश्व स्वास्थ्य संगठन ने जून 2017 में सर्पदंश से शरीर में जहर फैलने की समस्या को प्राथमिकता वाली उपेक्षित उष्णकटिबंधीय बीमारियों में शामिल किया था.
इसके बाद 2019 में डब्ल्यूएचओ ने सर्पदंश की रोकथाम और नियंत्रण के लिए वैश्विक रणनीति जारी की. इसका लक्ष्य 2030 तक सर्पदंश से होने वाली मौतों और दिव्यांगता को 50 प्रतिशत तक कम करना है.
भारत ने भी मार्च 2024 में 'सर्पदंश की रोकथाम और नियंत्रण के लिए राष्ट्रीय कार्य योजना' शुरू की. इसका उद्देश्य 2030 तक सर्पदंश से होने वाली मौतों और दिव्यांगता को आधा करना है.
योजना में जागरूकता, प्राथमिक उपचार, एंटी-स्नेक वेनम की उपलब्धता, स्वास्थ्यकर्मियों के प्रशिक्षण और मरीजों को समय पर उपयुक्त अस्पताल पहुंचाने पर जोर दिया गया है.
भारत के सामने चुनौतियां
भारत में ग्रामीण इलाकों में दूरी, रात में वाहनों का न मिलना और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों की सीमित सुविधाएं मरीज की जान जोखिम में डालती हैं.
इसके अलावा सही समय पर सही दवा की उपलब्धता न होना और विभिन्न क्षेत्रों के सांपों के जहर की बदलती संरचना के अनुसार एंटीवेनम का प्रभावी न होना एक बड़ी वैज्ञानिक चिंता है.
साथ ही झाड़-फूंक में समय गंवाना, इलाज का भारी खर्च और अस्पतालों में दर्ज न होने वाले मामलों के कारण ठोस स्वास्थ्य नीतियां बनाने में बाधा आती है.
हाथरस, इटारसी, गया और अम्बेडकरनगर की घटनाएं हमें याद दिलाती हैं कि सर्पदंश का खतरा केवल जंगल या खेत तक सीमित नहीं है. यह घर, आंगन, रास्ते और रोजमर्रा के कामकाज के बीच भी सामने आ सकता है.
नए वैश्विक अध्ययन की चेतावनी है कि दुनिया इस खतरे को लंबे समय से कम आंकती रही है. भारत के लिए यह चेतावनी और गंभीर है कि क्योंकि यहां बड़ी ग्रामीण आबादी, कृषि पर निर्भर आजीविका और स्वास्थ्य सेवाओं तक असमान पहुंच इस संकट को बढ़ाती है.
सर्पदंश की हर घटना को रोका नहीं जा सकता लेकिन, समय पर इलाज से होने वाली अनेक मौतें टाली जा सकती हैं.
इसके लिए जागरूकता अभियान चलाने भर से काम नहीं चलेगा. अस्पतालों में एंटीवेनम, प्रशिक्षित डॉक्टर, तेज परिवहन, विश्वसनीय आंकड़े और आर्थिक रूप से सुलभ उपचार इन सबको एक साथ मजबूत करना होगा.
2030 तक मौतों और दिव्यांगता को आधा करने का लक्ष्य महत्वाकांक्षी जरूर है लेकिन असंभव नहीं है.
सवाल यह है कि क्या भारत सर्पदंश को केवल केवल मौसमी घटना मानेगा या इसे ऐसी सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौती के रूप में स्वीकार करेगा, जिस पर साल भर काम करने की जरूरत है?
सांप के डसने और किसी की जान जाने के बीच अक्सर फर्क जहर की ताकत से ज्यादा इलाज मिलने की रफ्तार तय करती है.