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सर्वेश्वर दयाल सक्सेना: हिंदी का वह कवि जो चुप नहीं रहा, फिर भी हम उसे भूल गए

सितंबर आते ही हिंदी साहित्य में एक सवाल फिर खड़ा होता है कि क्या हम अपने उन लेखकों को याद रखते हैं, जिन्होंने अपने समय की सबसे जरूरी बातें कहीं थीं?

Written By Amit Singh
Published: Sep 14, 2026, 11:18 PM IST | Updated: Sep 14, 2026, 11:23 PM IST
Image Credit: AI के जरिए बनाई गई तस्वीर
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सितंबर हिंदी साहित्य के लिए सिर्फ एक महीना नहीं है. इस महीने की 15 तारीख को एक ऐसा कवि पैदा हुआ था, जिसने आम आदमी की पीड़ा, गांव की गरीबी, शहर की निर्ममता और राजनीति के छल को अपनी कविताओं में आवाज दी. 24 सितंबर को वह चला भी गया. नाम सर्वेश्वर दयाल सक्सेना था.

अजीब संयोग है कि जिस हिंदी पखवाड़े में उनका जन्म हुआ, उसी हिंदी पखवाड़े में उनकी मृत्यु भी हुई. लेकिन विडंबना यह है कि हिंदी साहित्य में उनका कद जितना बड़ा था, हमारी सामूहिक स्मृति में उनकी जगह उतनी बड़ी नहीं बन पाई.

मशहूर लेखक मनोहर श्याम जोशी कहते थे कि सर्वेश्वर अपने दौर के हर लिहाज से सबसे बड़े कवि थे लेकिन क्या उन्हें वह मुकाम मिला, जिसके वे हकदार थे? यह सवाल आज भी पीछा करता है.

साहित्यिक संस्मरणों और चर्चाओं में एक दिलचस्प प्रसंग का अक्सर उल्लेख किया जाता है. मनोहर श्याम जोशी ने एक बार नामवर सिंह से पूछा कि उन्होंने सर्वेश्वर की कविताओं की उपेक्षा क्यों की. नामवर सिंह ने जवाब दिया, 'सर्वेश्वर लड़ता बहुत था.'

यह एक वाक्य शायद सर्वेश्वर के व्यक्तित्व को समझने की सबसे छोटी और सबसे दिलचस्प कुंजी है.

व्यवस्था से लड़ने वाले सर्वेश्वर

सर्वेश्वर सचमुच लड़ते थे लेकिन किसी व्यक्ति से कम और अपने समय से ज्यादा. वह उस व्यवस्था से लड़ते थे जो आम आदमी को सिर्फ चुनाव के समय याद करती है.

वह उस साहित्यिक सुविधा से लड़ते थे जिसमें कवि जनता के दुख पर कविता तो लिखता है लेकिन खुद उस दुख से दूरी बनाए रखता है. और वह उस राजनीतिक पाखंड से भी लड़ते थे, जिसमें गरीब आदमी का नाम तो बार-बार लिया जाता है, मगर उसकी जिंदगी बदलने की चिंता कम दिखाई देती है.

वाणी प्रकाशन द्वारा 2004 में प्रकाशित सर्वेश्वर रचनावली, खंड 2 में ‘कुआनो नदी’ की भूमिका में सर्वेश्वर लिखते हैं, ‘. . . कोई भी राजनीतिक दल आम आदमी के साथ नहीं है. सबने अपने मतलब से उसे छला है. वह अपनी लड़ाई में अकेला है. मैं उसके साथ किसी राजनीतिक दल के नेता की तरह नहीं हूं. न उनकी तरह उसका नाम लेता हूं. मैं भौतिक रूप से भी और संवेदना के स्तर पर भी उसकी यातना झेलता हूं अतः मेरी कविता उससे अलग नहीं हो सकती.’

आखिर कौन थे सर्वेश्वर दयाल सक्सेना?

सर्वेश्वर सिर्फ कवि नहीं थे. वह पत्रकार थे, नाटककार थे, कहानीकार थे, बाल साहित्यकार थे और अपने समय के बेहद सजग नागरिक भी थे.

15 सितंबर 1927 को उत्तर प्रदेश के बस्ती में जन्मे सर्वेश्वर की शिक्षा बस्ती, बनारस और इलाहाबाद में हुई. उन्होंने अध्यापन किया, सरकारी नौकरी की, फिर आकाशवाणी से जुड़े.

आगे चलकर अज्ञेय के आमंत्रण पर ‘दिनमान’ से जुड़े और उसके उपसंपादक रहे. बाद में बाल पत्रिका ‘पराग’ के संपादक बने. पत्रकारिता में उनका ‘चरचे और चरखे’ स्तंभ बेहद चर्चित रहा. साहित्य के साथ रंगमंच, संस्कृति, राजनीति और समकालीन समाज पर उनकी पैनी नजर बनी रही.

अज्ञेय द्वारा संपादित ‘तीसरा सप्तक’ में शामिल होना उन्हें नई कविता की उस पीढ़ी के महत्वपूर्ण कवियों में स्थापित करता है, जिसने हिंदी कविता को पुराने ढांचे से निकालकर आधुनिक जीवन के सवालों के सामने खड़ा किया.

कुआनो सिर्फ एक नदी नहीं है

अगर किसी कवि को उसकी एक रचना से समझना हो तो सर्वेश्वर के मामले में ‘कुआनो नदी’ को पढ़ना चाहिए. उनकी कविता की दुनिया में सबसे महत्वपूर्ण जगह ‘कुआनो नदी’ की है. यह सिर्फ बस्ती की एक नदी नहीं थी.

वह सर्वेश्वर के लिए भारत के उस हिस्से की पहचान थी जिसे राजधानी अक्सर भूल जाती है. एक नदी बस्ती में बहती है, लेकिन उसमें भारत के गरीब, भूखे और हाशिये पर खड़े लोगों की पूरी कहानी दिखाई देती है.

कविता से क्रांति नहीं होगी तो कवि क्या करे?

सर्वेश्वर का एक महत्वपूर्ण सवाल यही था. वह जानते थे कि सिर्फ कविता लिख देने से समाज नहीं बदल जाएगा. वह यह भ्रम भी नहीं पालते थे कि कवि की कविता किसी सरकार को गिरा देगी या किसी व्यवस्था को रातोंरात बदल देगी.

लेकिन उनका अगला सवाल और महत्वपूर्ण था कि अगर कविता से समाज नहीं बदल सकता तो क्या कवि चुप हो जाए?

सर्वेश्वर का जवाब 'नहीं' में था. वो कहते थे कविता परिवर्तन की गारंटी नहीं है लेकिन अपने समय के सामने अपनी मौजूदगी दर्ज कराने का माध्यम जरूर है. यही वजह है कि उनकी कविता में नारेबाजी से ज्यादा बेचैनी दिखाई देती है.

आज सर्वेश्वर क्यों जरूरी हैं?

क्योंकि आज हम उस दौर में हैं जहां सूचना बहुत है लेकिन संवेदना कम होती जा रही है. हमारे पास हर घटना की खबर है लेकिन हर घटना के पीछे छिपे आदमी की कहानी सुनने का समय कम है.

सर्वेश्वर हमें उस आदमी तक ले जाते हैं. वह बताते हैं कि किसी भी देश की असली कहानी सिर्फ उसकी राजधानी, संसद, बड़ी सड़कें और बड़ी इमारतें नहीं होतीं.असली कहानी उस नदी के किनारे भी होती है जहां कोई भूख से मरता है. उस खेत में भी होती है जहां मजदूर काम करता है.

सितंबर हर साल लौटता है. 15 सितंबर उनकी जन्मतिथि याद दिलाता है और 24 सितंबर उनकी पुण्यतिथि. शायद इन दोनों तारीखों के बीच सर्वेश्वर को याद करने का सबसे अच्छा तरीका कोई श्रद्धांजलि सभा नहीं बल्कि उनकी किताब खोलना है.

क्योंकि कुआनो अब भी बह रही है.नदियां मरती नहीं हैं. बस कभी-कभी हम उनकी तरफ देखना बंद कर देते हैं.

और सर्वेश्वर दयाल सक्सेना शायद इसलिए भुला दिए गए कि उन्होंने हमें वही देखने के लिए मजबूर किया था जिसे देखने से हम अक्सर बचना चाहते हैं.

अंत में प्रस्तुत है उनकी एक कालजयी कविता...जो मुझे बहुत पसंद है..

यदि तुम्हारे घर के
एक कमरे में आग लगी हो
तो क्या तुम
दूसरे कमरे में सो सकते हो?
यदि तुम्हारे घर के एक कमरे में
लाशें सड़ रहीं हों
तो क्या तुम
दूसरे कमरे में प्रार्थना कर सकते हो?
यदि हां
तो मुझे तुम से
कुछ नहीं कहना है.

देश कागज पर बना
नक्शा नहीं होता
कि एक हिस्से के फट जाने पर
बाकी हिस्से उसी तरह साबुत बने रहें
और नदियां, पर्वत, शहर, गांव
वैसे ही अपनी-अपनी जगह दिखें
अनमने रहें.
यदि तुम यह नहीं मानते
तो मुझे तुम्हारे साथ
नहीं रहना है.

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About the Author

अमित सिंह देश के वरिष्ठ पत्रकारों और डिजिटल मीडिया संपादकों में शामिल हैं. राजनीति, अर्थव्यवस्था, सार्वजनिक नीति और सामाजिक मुद्दों पर लेखन का उन्हें 18 वर्षों से अधिक का अनुभव है. अपने लंबे पत्रकारिता करियर में उन्होंने अनेक महत्वपूर्ण राष्ट्रीय विषयों की रिपोर्टिंग, विश्लेषण और संपादकीय नेतृत्व किया है. उनकी पहचान तथ्यों पर आधारित, संतुलित और गहन विश्लेषणात्मक लेखन के लिए है. वर्तमान में अमित सिंह Zee News की हिंदी वेबसाइट के संपादक हैं. इस भूमिका में वे संपादकीय दिशा तय करने, विशेष कवरेज की रणनीति बनाने और डिजिटल न्यूज़रूम के संचालन का नेतृत्व करते हैं.पत्रकारिता में उत्कृष्ट योगदान के लिए अमित को देश के सबसे प्रतिष्ठित सम्मानों में से एक Ramnath Goenka Excellence in Journalism Awards से सम्मानित किया जा चुका है. यह सम्मान उनकी पेशेवर विश्वसनीयता, खोजी दृष्टि और जनसरोकारों से जुड़े मुद्दों पर प्रभावशाली पत्रकारिता का प्रमाण है.अमित ने अपने करियर के दौरान भारत के अग्रणी मीडिया संस्थानों The Wire, Tehelka, Dainik Jagran, Hindustan और Aaj Tak में महत्वपूर्ण भूमिकाओं में कार्य किया है. उन्हें प्रिंट, टेलीविजन और डिजिटल तीनों माध्यमों में काम करने का अनुभव है. आप अमित सिंह से सीधे amit.singh@india.com पर ईमेल के जरिए संपर्क कर सकते हैं.
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