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केंद्र का फैसला बरकरार: 'ऐसे हिंदू संगठनों को नहीं दे सकते रजिस्ट्रेशन की अनुमति', FCRA पर मद्रास हाईकोर्ट की कड़ी टिप्पणी

मद्रास हाईकोर्ट ने FCRA से जुड़ी एक याचिका पर सुनवाई करते हुए कड़ी टिप्पणी की. उच्च न्यायालय ने माना कि धार्मिक परिवर्तन से जुड़ी संस्थाओं को एफसीआरए के अंतर्गत रजिस्ट्रेशन की अनुमति नहीं दी जा सकती है.

Written By abhinav tripathi
Published: Oct 08, 2026, 10:39 AM IST | Updated: Oct 08, 2026, 11:54 AM IST
Image Credit: मद्रास हाईकोर्ट ने FCRA बिल पर की टिप्पणी. (फाइल फोटो)
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High Court News: हाल के समय में ही देश में एफसीआरए बिल में संशोधन को लेकर चर्चा की जा रही थी. इस बीच मद्रास हाईकोर्ट ने FCRA रजिस्ट्रेशन के एक मामले की सुनवाई के दौरान तीखी टिप्पणी की. कोर्ट ने कहा कि अगर कोई कट्टरपथी हिंदू संगठन घर वापसी जैसी गतिविधियों में सम्मिलित है, तो उसको FCRA के तहत पंजीकरण नहीं दिया जा सकता है. इसके साथ ही बेंच मे मुस्लिम और ईसाई धर्म समेत अब्राहमिक धर्मों की प्रकृति को लेकर पर टिप्पणी की.

रिपोर्ट्स के अनुसार, मद्रास हाईकोर्ट ने केंद्र सरकार के उस फैसले को बरकरार रखा है, जिसमें जेन मेडिटेशन सेंटर चलाने वाले कान्जिओन पब्लिक चैरिटेबल ट्रस्ट को एफसीआरए रजिस्ट्रेशन देने कराने से इनकार किया गया था. कोर्ट ने धर्म परिवर्तन से जुड़ी गतिविधियों और विदेशी फंडिंग को लेकर भी कई प्रकार टिप्पणिया की हैं. 

समझिए पूरा मामला

बार एंड बेंच की ओर रिपोर्ट बताती है कि मामले की सुनवाई के दौरान मद्रास उच्च न्यायालय ने कहा कि धार्मिक परिवर्तन से जुड़ी संस्थाओं को एफसीआरए अधिनियम के अंतर्गत रजिस्ट्रेशन नहीं दिया जा सकता है. सुनवाई के दौरान जस्टिस जीआर स्वामीनाथन और जस्टिस एमडी सुमति ने इस मामले पर टिप्पणी की. बता दें कि कान्जिओन पब्लिक चैरिटेबल ट्रस्ट कोडाइकनाल में जेन मेडिटेशन सेंटर चलाता है. केंद्र सरकार की ओर से इस संस्थान को FCRA के तहत रजिस्ट्रेशन देने से इनकार किया गया था, जिसको हाईकोर्ट ने बरकरार रखा.  

कोर्ट ने क्या-क्या कहा?

मामले की सुनवाई के दौरान कोर्ट की ओर से कहा गया कि FCRA की धारा 12(4)(a)(ii) सभी धर्मों पर समान रूप से लागू होती है. ये धाराएं धार्मिक परिवर्तन से संबंधित है. बेंच की ओर से कहा गया कि अगर कोई कट्टरपंथी हिंदू संगठन घर वापसी जैसी गतिविधियों में शामिल है, तो उसको किसी भी स्थिति में FCRA के तहत रजिस्ट्रेशन नहीं दिया जा सकता है. कोर्ट ने कहा कि अगर धार्मिक परिवर्तन के लिए विदेशी फंड को बिना किसी रोक-टोक के अनुमति दी गई, तो देश की संप्रभुता खतरे में पड़ सकती है.

जानिए जेन मेडिटेशन से जुड़ा पूरा विवाद

ट्रस्ट ने यह दलील दी थी कि जेन मेडिटेशन भारत की ध्यान परंपरा का हिस्सा है. उनकी गतिविधियों  धार्मिक चश्में से न देखा जाए. इससे पहले केंद्र सरकार ने कहा था कि ट्रस्ट धार्मिक कार्यक्रमों में शामिल है. ऐसे में कोर्ट ने ट्रस्ट की जांच कराई, जिसमें बेंच ने पाया कि इसके संस्थापक और मुख्य सूत्रधार, रेवरेंड फादर अमा सैमी एसजे एक नियुक्त ईसाई पादरी थे. फैसले के दौरान हाईकोर्ट ने एक कहावत का हवाल दिया और कहा कि तेंदुआ अपने धब्बे नहीं बदलता. बेंच ने कहा कि हिंदू धर्म विपरीत समावेशी है, अब्राहमिक धर्म स्वभाव से विशिष्ट है. कोर्ट की ओर से कहा गया कि आस्थावान यहूदी, ईसाई और मुस्लिम मानते हैं कि उनका धर्म  एकमात्र सच्चा और पूर्ण रहस्योद्घाटन है. 

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About the Author

अभिनव त्रिपाठी जी न्यूज हिंदी में बतौर सब एडिटर कार्यरत हैं।  पत्रकारिता के क्षेत्र में 3 साल से अधिक समय का अनुभव रखते हैं। डेस्क पर रियल टाइम की देश-विदेश की खबरों को कवर करते हैं। राष्ट्रीय राजनीति और अंतरराष्ट्रीय खबरों को लिखना पसंद है। वैश्विक घटनाक्रम के किसी भी जटिल मुद्दे को आसान भाषा में समझाना अच्छी तरीके से आता है। इससे पहले जागरण डॉट कॉम के साथ सब एडिटर के तौर पर काम कर चुके हैं।  करियर की शुरुआत एक सैटेलाइट चैनल से की थी। पत्रकारिता की पढ़ाई काशी विद्यापीठ वाराणसी से की है। 
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