)
देश में मौसम का मिजाज तो बदल गया है, लेकिन सियासी तापमान में कोई गिरावट नहीं आई है. संसद का 'मानसून सत्र' समाप्त होने का नाम नहीं ले रहा है. 20 जुलाई को मानसून सत्र शुरू हुआ था और 13 अगस्त को अनिश्चित काल के लिए स्थगित कर दिया गया था. सत्र की आखिरी बैठक के 83 दिन बीत चुके हैं, लेकिन इसकी औपचारिक विदाई अब तक नहीं हुई है. राष्ट्रपति की ओर से अभी तक 'सत्रावसान' की औपचारिक घोषणा नहीं हुई है, इससे संसद के दरवाजे पूरी तरह से बंद नहीं हुए हैं. इसी के साथ 39 साल पुराना रिकॉर्ड भी ध्वस्त हो गया है. इससे पहले 1989 में ऐसा देखने को मिला था. उस वक्त दोनों सदन 53 दिन ऐसी स्थिति में रहे थे. इस असामान्य घटनाक्रम ने राजनीतिक गलियारों में नई चर्चाएं छेड़ दी हैं. सियासी गलियारों में अटकलें लगाई जा रही हैं कि सरकार विशेष सत्र बुला सकती है.
'सत्रावसान' को लेकर अटकलबाजी जारी
बता दें कि 'सत्रावसान' नहीं होने पर सरकार के पास जरूरत पड़ने पर इसी सत्र की बैठक दोबारा बुलाने का विकल्प खुला रहता है. यही वजह है कि सरकार की ओर से विशेष सत्र बुलाए जाने की अटकलें लगाई जा रही हैं.

इस सत्र में कितना काम हुआ था?
पीआईबी की रिपोर्ट के अनुसार, पूरा मानसून सत्र नीट पेपर लीक और छात्र आंदोलन की भेंट चढ़ गया था. सत्र के 25 दिनों की अवधि में कुल 19 बैठकें हुई थीं. इस दौरान लोकसभा और राज्यसभा की ओर से कुल 12 विधेयक पारित किए गए. विपक्ष की आपत्ति के बाद विदेशी अभिदाय (विनियमन) संशोधन विधेयक 2026 (FCRA Amendment Bill 2026) को संयुक्त संसदीय समिति (JPC) के भेज दिया गया था.
विशेष सत्र बुलाए जाने की आशंका
सियासी गलियारों में चर्चा है कि परिसीमन (delimitation) और महिला आरक्षण कानून से जुड़े विधेयकों को पारित कराने के लिए सरकार की ओर से विशेष सत्र बुलाया जा सकता है. हालांकि, सरकार की ओर से अभी तक ऐसा कोई आधिकारिक निर्णय सामने नहीं आया है.
कांग्रेस ने क्या आशंका जताई?
'सत्रावसान' नहीं होने पर कांग्रेस के सांसद जयराम रमेश ने सरकार की मंशा पर सवाल उठाए हैं. उन्होंने आरोप लगाया है कि गृह मंत्री अमित शाह विशेष सत्र के जरिए परिसीमन विधेयक आगे बढ़ाने की संभावना पर विचार कर रहे हैं. उन्होंने कहा कि विपक्ष को इन प्रस्तावों की जानकारी देनी चाहिए और सर्वदलीय बैठक बुलाकर चर्चा करनी चाहिए.