माउंट एवरेस्ट को दुनिया की सबसे ऊंची और खतरनाक चोटी में से एक है. हर साल बड़ी संख्या में पर्वतारोही इस चोटी को फतह करने के लिए चढ़ाई करते हैं, लेकिन काफी कम ही इस मिशन को पूरा कर पाते हैं. पहली बार 29 मई 1953 को दो लोगों ने दुनिया की इस सबसे ऊंची चोटी को फतह किया था. इसके बाद से लोगों में इस पर्वत पर चढ़ने की उत्सुकता काफी बढ़ गई.
दरअसल, इस चोटी पर चढ़ना जितना मुश्किल है, उससे कहीं अधिक मुश्किल यहां वापस सुरक्षित नीचे आना. ऐसे में कई बार नीचे उतरने के लोगों की दौरान मौत हो जाती है और उनका शव नीचे लेकर आना मुश्किल हो जाता है. कुछ ऐसी ही घटना 1996 में यानी करीब 30 साल पहले एवरेस्ट पर घटी थी, जब एक भीषण तूफान में 8 लोगों की जान चली गई थी. उसके बाद से ग्रीन बूट ऑफ माउंट एवरेस्ट का नाम काफी चर्चा में आया.
इस दौरान तिब्बत की ओर से चढ़ाई करने वाले तीन भारतीय पर्वतारोही भी लापता हो गए थे. उनमें से एक का शव पिछले तीस सालों से शिखर के करीब 300 मीटर नीचे बर्फ में दबा है. चमकीले जूते के कारण पर्वतारोही पीढ़ियों से इस शख्स को ग्रीन बूट्स के नाम से जाना जाता है. हाल में ही एक गुप्त अभियान के दौरान शेरपाओं की टीम ने उसका डीएनए सैंपल लेकर इस रहस्य को सुलझा दिया है. उनकी पहचान उत्तरी भारत के दोरजे मोरुप के रूप में हुई. वह भारत-तिब्बत सीमा पुलिस बल में तैनात थे.
47 साल की उम्र में वह इस हादसे का शिकार हुए और उस वक्त से उनका शव वहीं पर पड़ा रहा. पिछले कुछ वर्षों में भारत सरकार की ओर से एक जोखिम भरे मिशन की शुरुआत की गई और उनके शव को डेथ जोन से वापस लाने की तैयारी शुरू की जा रही है.
इस बीच जानकार मानते हैं कि करीब 3 दशक से बर्फ के नीचे दबे शव को वापस लाना एक बड़ी चुनौती है. यह किसी इंपॉसिबल मिशन से कम नहीं है. अधिकारी यह भी बताते हैं कि एक शव को लाने के लिए कई लोगों की जान जोखिम में पड़ सकती है. ऐसे में अन्य किसी विकल्प पर फोकस किया जा रहा है.
गौरतलब है कि माउंट एवरेस्ट की ऊंचाई करीब 8848 मीटर के करीब है. इतनी ऊंचाई पर ऑक्सीजन का स्तर काफी कम हो जाता है. ऐसे में जो भी यहां पर चढ़ाई करता है उसके दिमाग और फेफड़ों की नसें फटने का खतरा होता है. रिपोर्ट्स बताती हैं कि सबसे अधिक मौतें 8000 मीटर के ऊपर वाले हिस्से में होती है. यही कारण है इस क्षेत्र को डेथ जोन के नाम से भी जाना जाता है.
रिपोर्ट्स बाताती है कि साल 2019 तक चढ़ाई के दौरान करीब 308 पर्वतारोहियों की मौत हुई थी. ऐसे में इतनी ऊंचाई से शव लाना काफी मुश्किल होता है. यही कारण है कि पर्वतारोही शवों को वहीं छोड़ आते हैं. यहां पर तापमान -16 से -40 डिग्री सेल्सियस के करीब होता है. यह एक डीप फ्रीजर काम करता है, इस कारण शव सड़ते नहीं हैं.