व्यंग्य: कलयुग में सब उल्टा होगा! असली उलटबांसी तो हमारे घर में है, जहां बच्चे कहते हैं- 'बूमर, चुप रहो'
'कलयुग में सब उल्टा होगा'...इस जुमले को हमने इस कदर अपनाया है कि अब अपनी गलतियों को सुधारने की बजाय सारा दोष सीधे वक्त के सिर मढ़ देते हैं. इस व्यंग्य के बहाने आइए जानते हैं कि क्या सचमुच दौर ही उलटा चल रहा है, या फिर हमने ही सहूलियत के हिसाब से तर्क छोड़कर नजरिया बदलना सीख लिया...?
"कलयुग में सब उल्टा होगा." यह पंक्ति हमारे भीतर इतनी मजबूती से बिठाई जा चुकी है कि अब छोटा-मोटा उलटापन हमें चौंकाता तक नहीं. हर गड़बड़ी का ठीकरा कलयुग के सिर फोड़ देना हमारी राष्ट्रीय आदत है. बिजली गई तो कलयुग, नेटवर्क गया तो कलयुग, और रिश्तेदार का बेटा हमसे ज्यादा कमा गया तो घोर कलयुग. कलयुग हमारा सबसे वफादार बलि का बकरा है, जो न कभी सफाई मांगता है, न कभी पलटकर जवाब देता है.
असली उलटापन तो वह है, जो कलयुग के आने से बहुत पहले हमारे घर में बस चुका है, जरा गिनकर देखिए. कभी जंगल में तपस्या होती थी, आज उसी शांति का 'मेडिटेशन रिट्रीट' बिकता है, जीएसटी समेत. मौन व्रत कभी साधना था, आज 'डिजिटल डिटॉक्स' है, जिसकी बुकिंग ऑनलाइन होती है और जिसकी रील बनाना लगभग अनिवार्य है.
पानी कभी प्याऊ पर पुण्य के नाम पर पिलाया जाता था, आज बोतल में बिकता है और हम उसकी शुद्धता पर बहस करते हैं. गुरु कभी शिष्य ढूंढता था, आज शिष्य 'कोर्स' ढूंढता है और गुरु फॉलोअर्स गिनता है. मां-बाप कभी बच्चों को दुनिया से बचाते थे, आज बच्चे मां-बाप को यूपीआई फ्रॉड और फॉरवर्डेड झूठ से बचा रहे हैं. इन सबके लिए कलयुग का नाम लेने की जरूरत भी नहीं, यह हमारी अपनी मेहनत की कमाई है.
नजरिया बदलने की उलटबांसी
इस उलटबांसी में एक कदम और आगे चलिए. कॉकरोच आज प्रेरणा का प्रतीक बन चुका है और बंदर मजाक का विषय. इसी उलटेपन की देन है कि रामकथा अब रावण के नजरिए से लिखी जा रही है, जहां बताया जाता है कि राम रावण को मारने नहीं, तारने आए थे.
तारना ही था तो कोई शॉर्टकट निकाल लेते, न हनुमान की पूंछ जलती, न लंका में आग लगती और इस तरन-तारन की प्रक्रिया में सीता का अपहरण क्यों जरूरी था, यह साफ नहीं होता. पूछिए तो जवाब मिलता है, परिप्रेक्ष्य बदलिए. यानी जब तर्क लंगड़ा जाए, तो उसे बैसाखी देने की बजाय नजरिया ही बदल दिया जाता है. आजकल हर खलनायक के पास एक बैकस्टोरी है और हर बैकस्टोरी के पीछे एक प्रोडक्शन हाउस.
'बूमर, चुप रहो' की विडंबना
अब उल्टा हो चुका है, बड़ों से कहा जाता है कि बच्चों की बात सुनो. बीच का कोई रास्ता निकल आता तो शायद बेहतर होता, कभी बच्चे सुन लेते, कभी बड़े. हमारी पीढ़ी तो बड़ों और बच्चों, दोनों की सुनते-सुनते ही निकल गई. जवानी में बड़ों ने कहा 'चुप रहो', अब बच्चे कहते हैं 'बूमर, चुप रहो.' यानी बोलने की बारी हमारे हिस्से कभी आई ही नहीं. आने वाले वक्त में पलड़ा Gen-Z की तरफ झुका दिखता है और हमारे हिस्से अब सिर्फ मौन बचा है, जिसकी बुकिंग भी ऑनलाइन चल रही है.
श्रद्धा बनाम सवाल
शायद अब वही सही समय है, जब हम अपने पूर्वजों के कृत्यों को भावनाओं से परे, ठंडे दिमाग से परखें. इसका मतलब उन्हें कटघरे में खड़ा करना नहीं, बस इतना भर है कि श्रद्धा और सवाल एक-दूसरे के दुश्मन नहीं हैं. जो परंपरा सवालों से डरती है, वह भीतर से खोखली होती है, और जो उन्हें झेल जाती है, वही सदियों टिकती है. असली उलटापन यह नहीं कि बच्चे अब बड़ों को सिखा रहे हैं. असली उलटापन यह है कि हर गड़बड़ी का ठीकरा कलयुग पर फोड़कर, हमने सोचना ही बंद कर दिया है.
अस्वीकरण: यह रचना विशुद्ध रूप से व्यंग्य है, जिसका उद्देश्य हल्के-फुल्के अंदाज में समकालीन सामाजिक प्रवृत्तियों पर टिप्पणी करना है. इसमें आए पौराणिक और धार्मिक संदर्भ साहित्यिक व्यंग्य-परंपरा के अंतर्गत प्रयोग किए गए हैं, किसी धर्म, आस्था, समुदाय या व्यक्ति विशेष की भावनाओं को आहत करने के इरादे से नहीं. लेख में व्यक्त विचार विशुद्ध रूप से लेखक के निजी विचार हैं और इन्हें किसी संस्था या प्रकाशन के आधिकारिक रुख के रूप में न पढ़ा जाए.
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