भारतीय राजनीति में नेताओं की कमी कभी नहीं रही. कुछ नेता सत्ता तक पहुंचने के लिए राजनीति करते हैं, कुछ सत्ता में बने रहने के लिए और कुछ सत्ता से बाहर रहकर भी अपनी प्रासंगिकता बचाए रखने के लिए लेकिन जयप्रकाश नारायण यानी जेपी इस पूरी जमात से अलग खड़े दिखाई देते हैं.
उनके पास जनता का अपार समर्थन था. देश की राजनीति को प्रभावित करने की ताकत थी. और 1977 में प्रधानमंत्री बनने का अवसर भी उनके सामने हो सकता था. फिर भी उन्होंने सत्ता की कुर्सी पर बैठने के बजाय उस कुर्सी पर बैठने वालों को जवाबदेह बनाने का रास्ता चुना. यही जेपी की सबसे बड़ी ताकत और शायद सबसे बड़ी त्रासदी भी थी.
11 अक्टूबर 1902 को बिहार के सिताबदियारा में जन्मे जयप्रकाश नारायण ने जिस राजनीतिक यात्रा की शुरुआत की, उसका अंत किसी पद, पार्टी या सरकारी उपलब्धि पर नहीं हुआ. उनकी विरासत एक सवाल छोड़ गई कि क्या राजनीति का उद्देश्य केवल सरकार बदलना है या समाज और व्यवस्था को भीतर से बदल देना है?
अमेरिका में सीखा विद्रोह का ककहरा
जेपी की कहानी को केवल 1974 के बिहार आंदोलन से शुरू करना इतिहास के साथ अन्याय होगा. उनकी बेचैनी की जड़ें इससे कई दशक पहले पहुंचती हैं. स्वतंत्रता आंदोलन के दौर में जब बहुत से नौजवान ब्रिटिश शासन के खिलाफ लड़ाई में उतर रहे थे, जेपी ने भी पढ़ाई और करियर के पारंपरिक रास्ते से अलग राह चुनी.
अमेरिका में उच्च शिक्षा के दौरान उन्होंने अपना खर्च चलाने के लिए मेहनत-मजदूरी की. यहीं समाजवाद के विचारों से उनका परिचय गहरा हुआ और आर्थिक असमानता उनके चिंतन का अहम हिस्सा बनी. भारत लौटने के बाद वे स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय हुए. कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी के गठन में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही.
वे समाजवाद के समर्थक थे लेकिन समय के साथ उनका राजनीतिक चिंतन किसी एक विचारधारा की सीमा में नहीं रुका. गांधी के अहिंसक दर्शन, सर्वोदय और सामाजिक परिवर्तन की अवधारणाओं ने उनके विचारों को नई दिशा दी.
आजादी मिलने के बाद उनके सामने भी सक्रिय सत्ता की राजनीति का रास्ता खुला था लेकिन जेपी धीरे-धीरे चुनावी राजनीति से दूर होते गए. उन्होंने विनोबा भावे के भूदान और सर्वोदय आंदोलनों से जुड़कर समाज के भीतर परिवर्तन की कोशिश की. चंबल के दस्युओं के आत्मसमर्पण और पुनर्वास के प्रयासों में भी उनकी भूमिका रही.
यहां जेपी को समझने की एक महत्वपूर्ण कुंजी मिलती है. वे मानते थे कि सरकार बदलने से समाज की समस्याएं अपने आप समाप्त नहीं होतीं. व्यवस्था की बुराइयां केवल संसद में नहीं, सामाजिक व्यवहार, प्रशासन और नागरिक जीवन में भी मौजूद होती हैं. इसलिए उनके लिए राजनीति का अर्थ धीरे-धीरे सत्ता की राजनीति से आगे बढ़कर लोकनीति बन गया.
जब छात्रों का गुस्सा बना राष्ट्रीय आंदोलन
सत्तर के दशक का भारत आज के भारत से अलग जरूर था लेकिन आम आदमी की कई परेशानियां पहचानी जा सकती थीं. महंगाई बढ़ रही थी. भ्रष्टाचार को लेकर असंतोष था. बेरोजगारी युवाओं को बेचैन कर रही थी. सरकारों की कार्यशैली पर सवाल उठ रहे थे.
गुजरात में छात्र आंदोलन ने राजनीतिक हलचल पैदा की. बिहार में भी छात्रों का गुस्सा सड़कों पर उतर आया. 18 मार्च 1974 को पटना में बिहार विधानसभा की ओर बढ़े छात्र आंदोलन ने हिंसक घटनाओं और पुलिस कार्रवाई के बीच एक बड़े राजनीतिक संघर्ष का रूप लेना शुरू किया.
छात्रों को ऐसा नेतृत्व चाहिए था जिस पर सत्ता की राजनीति का सीधा आरोप लगाना आसान न हो. उनकी निगाहें जेपी पर गईं. उम्र के सातवें दशक में पहुंच चुके इस नेता ने पहले सक्रिय राजनीति से दूरी बना ली थी लेकिन जब युवाओं ने उनसे आंदोलन का नेतृत्व करने की अपील की तो उन्होंने अपनी दूरी तोड़ दी.
यह महज एक बुजुर्ग नेता की वापसी नहीं थी. यह उस समय की राजनीति में भरोसे की कमी का संकेत भी था. छात्र किसी ऐसे व्यक्ति की तलाश में थे जो उनके गुस्से को दिशा दे सके और उनकी आवाज को नैतिक विश्वसनीयता दे सके.
जेपी ने आंदोलन को भ्रष्टाचार और कुशासन के विरोध तक सीमित नहीं रखा. 5 जून 1974 को पटना के गांधी मैदान में उन्होंने संपूर्ण क्रांति का आह्वान किया. यहां से आंदोलन का चरित्र बदल गया.
अब सवाल सिर्फ यह नहीं था कि सरकार कितनी अच्छी या खराब है. सवाल यह भी था कि राजनीति कैसी हो. शिक्षा किस दिशा में जाए. प्रशासन किसके प्रति जवाबदेह हो. समाज जातिवाद, असमानता तथा भ्रष्टाचार से कैसे मुक्त हो.
जेपी का सपना किसी एक सरकार को हटाकर दूसरी सरकार बैठाने भर का नहीं था. वे चाहते थे कि बदलाव नागरिक के भीतर से शुरू हो और संस्थाओं तक पहुंचे.
लेकिन इतिहास की विडंबना देखिए. जिस आंदोलन ने व्यवस्था बदलने का सपना दिखाया, उसकी सबसे बड़ी पहचान अंततः सत्ता परिवर्तन बन गई. संपूर्ण क्रांति का व्यापक विचार चुनावी राजनीति की उथल-पुथल में कहीं पीछे छूटने लगा.
इंदिरा गांधी बनाम जेपी
जेपी आंदोलन और तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के बीच टकराव को सिर्फ दो व्यक्तियों की राजनीतिक लड़ाई मानना अधूरी व्याख्या होगी. इसके केंद्र में सत्ता की जवाबदेही, जनांदोलन की वैधता और लोकतांत्रिक संस्थाओं की सीमाओं से जुड़े सवाल थे.
इंदिरा गांधी की राजनीतिक ताकत अपने चरम पर थी. दूसरी ओर जेपी एक ऐसे जनांदोलन का चेहरा बन चुके थे जो केंद्र सरकार की नीतियों और कार्यशैली को खुली चुनौती दे रहा था.
12 जून 1975 को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने राजनारायण की चुनाव याचिका पर फैसला सुनाते हुए रायबरेली से इंदिरा गांधी के चुनाव को अमान्य घोषित कर दिया.
इस फैसले ने राजनीतिक संकट को और गहरा कर दिया. इंदिरा गांधी ने फैसले के खिलाफ अपील की जबकि विपक्ष उनके इस्तीफे की मांग तेज करने लगा.
25 जून 1975 को दिल्ली के रामलीला मैदान में जेपी की रैली इस संघर्ष का निर्णायक क्षण बनी. उन्होंने सरकार और प्रशासन से जुड़े लोगों से अपील की कि वे असंवैधानिक आदेशों का पालन न करें.
उनकी इस अपील की व्याख्या को लेकर तब भी विवाद था और आज भी है. समर्थकों ने इसे अन्यायपूर्ण आदेशों के विरुद्ध अंतरात्मा की आवाज बताया जबकि आलोचकों ने इसे राज्य की व्यवस्था को चुनौती देने वाला कदम माना.
उसी रात देश में आपातकाल लागू कर दिया गया. विपक्षी नेताओं की गिरफ्तारियां हुईं, प्रेस पर सेंसरशिप लगी और नागरिक स्वतंत्रताओं पर कठोर प्रतिबंध लगाए गए. जेपी भी गिरफ्तार कर लिए गए.
एक दिलचस्प ऐतिहासिक विरोधाभास यहां सामने आता है. जिस नेता ने जीवनभर सत्ता के केंद्रीकरण का विरोध किया, उसे उसी सत्ता ने जेल में बंद कर दिया जिसके सामने वह जनता की आवाज लेकर खड़ा हुआ था.
जेपी की तबीयत पहले से खराब थी. हिरासत के दौरान उनकी सेहत और बिगड़ी लेकिन आपातकाल का राजनीतिक अर्थ उनकी गिरफ्तारी से कहीं बड़ा था.
अब सवाल किसी आंदोलन या नेता की लोकप्रियता का नहीं बल्कि यह था कि असहमति की आवाज के लिए लोकतंत्र में कितनी जगह बची है.
जनता ने सरकार बदली, क्या व्यवस्था बदली?
आपातकाल मार्च 1977 में समाप्त हुआ और लोकसभा चुनाव हुए. विपक्षी दल एकजुट हुए. जनता पार्टी बनी और कांग्रेस को ऐतिहासिक पराजय का सामना करना पड़ा. आजाद भारत में पहली बार केंद्र में गैर-कांग्रेसी सरकार बनी.
इस परिवर्तन के पीछे जेपी की भूमिका निर्णायक थी. वे खुद चुनाव नहीं लड़ रहे थे लेकिन अलग-अलग विचारधाराओं वाले नेताओं को एक मंच पर लाने में उनकी नैतिक प्रतिष्ठा ने महत्वपूर्ण काम किया.
यह भारतीय लोकतंत्र की ताकत का बड़ा उदाहरण था. जनता ने दिखा दिया कि सत्ता कितनी भी मजबूत क्यों न हो, मतदाता के सामने उसकी ताकत सीमित है.
लेकिन चुनावी जीत के बाद वही प्रश्न सामने आया जिससे जेपी लगातार जूझते रहे थे कि क्या सत्ता में पहुंचने के बाद राजनीति अपने मूल उद्देश्यों को याद रख पाती है?
जनता पार्टी के भीतर महत्वाकांक्षाएं, वैचारिक मतभेद और नेतृत्व का संघर्ष उभरने लगा. जिस एकता ने कांग्रेस को हराया था, वही एकता सरकार चलाने की कसौटी पर कमजोर पड़ती गई. सरकार अंततः अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर सकी और 1979 में गिर गई.
जेपी ने जिस नैतिक राजनीति की कल्पना की थी, उसे व्यवहार में उतारना आसान नहीं निकला. जिन नेताओं को उन्होंने एक मंच पर लाने में मदद की थी, वे सत्ता के सवाल पर एक-दूसरे से दूर होते गए.
इसका अर्थ यह नहीं कि 1977 का परिवर्तन व्यर्थ था. उसने लोकतंत्र की वापसी कराई और यह प्रमाणित किया कि भारतीय मतदाता सरकारों को बदल सकता है.
हालांकि उसने यह भी बताया कि सरकार बदलना और राजनीतिक संस्कृति बदलना दो अलग-अलग काम हैं. संपूर्ण क्रांति का सपना यहीं सबसे ज्यादा अधूरा दिखाई देता है.
आज के भारत में जेपी की प्रासंगिकता
जेपी की असली चुनौती आज भी उतनी ही प्रासंगिक है कि क्या लोकतंत्र सिर्फ पांच साल में एक बार वोट डालने का नाम है? क्या चुनाव जीत लेना किसी सरकार को आलोचना से मुक्त कर देता है?
क्या राजनीतिक दल अपने भीतर असहमति और आत्मालोचना के लिए पर्याप्त जगह रखते हैं? और क्या भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई केवल विरोधियों पर आरोप लगाने तक सीमित रह सकती है?
ये सवाल किसी एक दल, सरकार या विचारधारा के लिए नहीं हैं. लोकतंत्र में सत्ता पक्ष से सवाल करना जितना जरूरी है, विपक्ष की जवाबदेही भी उतनी ही जरूरी है.
संस्थाओं की स्वतंत्रता, प्रेस की आजादी, नागरिक अधिकार और प्रशासन की निष्पक्षता किसी एक राजनीतिक खेमे की संपत्ति नहीं हैं.
जेपी की संपूर्ण क्रांति का एक महत्वपूर्ण पक्ष सामाजिक परिवर्तन था. इसका मतलब था कि भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाने वाला समाज अपने भीतर के अन्याय को भी पहचाने.
समानता की मांग करने वाली राजनीति जातिगत भेदभाव से भी लड़े. लोकतंत्र की बात करने वाले दल अपने संगठन में भी लोकतांत्रिक व्यवहार दिखाएं.
यही वह कसौटी है, जिस पर जेपी की विरासत को परखा जाना चाहिए.
उनकी कहानी यह भी सिखाती है कि जनांदोलन अपने आप में अंतिम समाधान नहीं होते. वे बदलाव का रास्ता खोल सकते हैं, सरकारों को जवाबदेह बना सकते हैं और नागरिकों में नई चेतना पैदा कर सकते हैं.
लेकिन स्थायी परिवर्तन के लिए संस्थाओं को मजबूत करना, नीतियों को बेहतर बनाना और सत्ता में आने के बाद भी अपने मूल्यों पर कायम रहना जरूरी है.
क्रांति का सबसे कठिन चरण शायद सत्ता को चुनौती देना नहीं बल्कि बदलाव का अवसर मिलने के बाद खुद को बदलना है.
एक अधूरा सपना
जेपी ने प्रधानमंत्री बनने की महत्वाकांक्षा के बिना भारतीय राजनीति की दिशा बदल दी. यह अपने आप में असाधारण है. वे उस भारत का सपना देखते थे जहां राजनीति का मूल्य केवल सत्ता हासिल करने से तय न हो.
जहां नागरिक सरकार के सामने याचक नहीं, लोकतंत्र के सक्रिय भागीदार हों. जहां व्यवस्था में बदलाव का अर्थ केवल चेहरे बदलना नहीं बल्कि काम करने के तौर-तरीके बदलना भी हो.
उनकी जयंती पर सबसे जरूरी सवाल यही है कि क्या हम संपूर्ण क्रांति को केवल इतिहास की किताबों में दर्ज एक नारे की तरह याद करेंगे, या उसे अपने वर्तमान की कसौटी भी बनाएंगे?
जेपी की सबसे बड़ी विरासत शायद कोई पार्टी, सरकार या चुनावी नतीजा नहीं है. वह एक बेचैन नागरिक चेतना है जो हर दौर में सत्ता से पूछती है कि आप जनता के लिए हैं या जनता सिर्फ आपके लिए है?
इस सवाल का जवाब हर दिन, हर सरकार, हर संस्था और हर नागरिक को अपने आचरण से देना होगा. क्योंकि जेपी की कहानी का असली अंत 8 अक्टूबर 1979 को नहीं हुआ था.
वह कहानी तब पूरी होगी, जब संपूर्ण क्रांति का सपना सत्ता बदलने से आगे बढ़कर समाज, संस्थाओं और नागरिक जीवन में दिखाई देने लगेगा.