कमजोर मानसून, जलाशयों में घटता जलस्तर: क्या भीषण जल संकट की ओर बढ़ रहा है भारत?
इस साल मानसून में सामान्य से 12.6 प्रतिशत कम बारिश हुई है. दूसरी ओर, केंद्रीय जल आयोग की निगरानी वाले देश के प्रमुख 178 जलाशयों में अब क्षमता के मुकाबले 67 फीसदी पानी ही बचा है. ऐसे में सवाल है कि क्या भारत अपनी प्यास बुझाने के लिए वक्त रहते जागेगा?
इस साल जून से सितंबर के बीच सामान्य से 12.6 प्रतिशत कम बारिश हुई. यह सिर्फ मौसम विभाग का आंकड़ा नहीं है, बल्कि खेती, शहरों, उद्योगों और देश में खाने-पीने की चीजों की उपलब्धता से जुड़ा एक बड़ा सवाल है. जब बारिश कम होती है तो पानी की कमी से जुड़ी समस्याएं बढ़ने लगती हैं और हमारी जल व्यवस्था की कमजोरियां भी सामने आने लगती हैं.
केंद्रीय जल आयोग (सीडब्ल्यूसी) के 15 अक्टूबर 2026 के बुलेटिन के अनुसार, देश के 178 प्रमुख जलाशयों में 126.717 अरब घन मीटर पानी बचा था. यह उनकी कुल उपयोगी भंडारण क्षमता का 68.58 प्रतिशत था. 22 अक्टूबर को यह घटकर 123.228 अरब घन मीटर रह गया. यानी सात दिन में 3.489 अरब घन मीटर पानी कम हो गया. अब यह कुल उपयोगी भंडारण क्षमता का 66.70 प्रतिशत है.
पिछले साल इसी अवधि में इन जलाशयों में 167.910 अरब घन मीटर पानी था. यानी एक साल में भंडारण करीब 41.2 अरब घन मीटर घट गया. यह गिरावट इसलिए गंभीर है क्योंकि मानसून विदा हो चुका है. अब अगली बारिश तक इसी पानी से सिंचाई, पेयजल और बिजली की जरूरतें पूरी करनी हैं.
मानसून गया, संकट छोड़ गया
आंकड़ों की गंभीरता समझने के लिए तीन तुलनाएं जरूरी हैं. जलाशयों में पानी उनकी कुल उपयोगी क्षमता से 31.42 प्रतिशत कम है. पिछले साल की समान अवधि के मुकाबले भंडारण 24.53 प्रतिशत कम है, जबकि पिछले दस सालों के औसत से यह 16.44 प्रतिशत नीचे है. ये तीन अलग-अलग पैमाने हैं, लेकिन इनका संदेश एक है कि देश अगली गर्मियों के लिए पर्याप्त सुरक्षा कवच तैयार नहीं कर पाया है.
हालांकि, भारत में पानी की कहानी हर जगह एक जैसी नहीं है. कहीं जलाशयों में अपेक्षाकृत बेहतर भंडारण है तो कहीं हालात बेहद नाजुक हैं. सीडब्ल्यूसी के आंकड़े बताते हैं कि पेन्नार नदी बेसिन में भंडारण सामान्य से 72.32 प्रतिशत और कावेरी बेसिन में 60.50 प्रतिशत कम था.
दक्षिण भारत की स्थिति विशेष चिंता पैदा करती है. 15 अक्टूबर के बुलेटिन में दक्षिणी क्षेत्र के 50 प्रमुख जलाशयों में उनकी कुल उपयोगी क्षमता का सिर्फ 44.31 प्रतिशत पानी था. एक साल पहले यह आंकड़ा 89.65 प्रतिशत था. इसका असर केवल बांधों के आंकड़ों तक सीमित नहीं रहेगा.
कम भंडारण का अर्थ सिंचाई के लिए कम पानी, शहरों में पानी की आपूर्ति पर दबाव और जलविद्युत उत्पादन की संभावनाओं में कमी है. यानी जल संकट एक साथ कृषि, अर्थव्यवस्था और घरेलू जीवन को प्रभावित कर सकता है.
असली बीमारी बारिश की कमी नहीं
भारत की समस्या यह नहीं कि हर साल बारिश कम होती है. समस्या यह है कि हम बारिश पर निर्भरता तो बनाए रखते हैं लेकिन उसके पानी को बचाने और इस्तेमाल करने की व्यवस्था पर्याप्त मजबूत नहीं बना पाए हैं.
मानसून में हुई बारिश का बड़ा हिस्सा तेजी से नदियों के जरिए समुद्र तक पहुंच जाता है, जबकि कई शहरों में कंक्रीट और पक्की सतहें पानी को जमीन के भीतर जाने से रोकती हैं. परिणाम यह होता है कि बारिश के दिनों में जलभराव और कुछ महीने बाद पानी की किल्लत एक ही शहर की दो तस्वीरें बन जाती हैं.
इस संकट की दूसरी परत भूजल है. केंद्रीय भूजल बोर्ड के 2025 के आकलन के मुताबिक, भारत में सालाना भूजल दोहन 247.22 अरब घन मीटर था. देश के 6,762 आकलन क्षेत्रों में से 730 क्षेत्र ऐसे थे जिन्हें भूजल के अत्यधिक दोहन की श्रेणी में रखा गया. यानी करीब 10.8 प्रतिशत आकलन क्षेत्रों में पानी निकालने की रफ्तार प्राकृतिक रूप से उपलब्ध होने वाले संसाधन से आगे निकल चुकी थी.
नीति आयोग ने 2018 में ही चेताया था कि भारत में करीब 60 करोड़ लोग उच्च से अत्यधिक जल तनाव का सामना कर रहे हैं. रिपोर्ट ने 2030 तक पानी की मांग उपलब्ध आपूर्ति से दोगुनी होने की आशंका भी जताई थी. यह एक पुराना अनुमान था, आज की स्थिति का नया माप नहीं लेकिन इससे साफ है कि जल संकट की चेतावनी वर्षों से मौजूद थी.
इसलिए आज की कमी को अचानक आई प्राकृतिक आपदा कहकर पूरा मामला खत्म नहीं किया जा सकता. यह लंबे समय से जमा होती आ रही प्रबंधन संबंधी कमजोरियों का भी परिणाम है.
‘कैच द रेन’ से आगे की राह
जल संरक्षण की योजनाएं जरूरी हैं लेकिन उनका मूल्यांकन खर्च किए गए बजट या बनाए गए तालाबों की संख्या से आगे बढ़कर होना चाहिए. असली कसौटी यह है कि कितने जलस्रोत पुनर्जीवित हुए. कितना पानी जमीन में पहुंचा. भूजल स्तर में क्या बदलाव आया.
शहरों को अपने जल बजट बनाने चाहिए. कितना पानी आता है, कितना इस्तेमाल होता है, कितना रिसाव में जाता है और कितना शोधित पानी दोबारा उपयोग में लाया जा सकता है. उद्योगों और बड़े व्यावसायिक परिसरों में ट्रीटेड वेस्टवॉटर का पुनः उपयोग बढ़ाना चाहिए.
खेती में सूक्ष्म सिंचाई, मिट्टी की नमी के मुताबिक सिंचाई और स्थानीय जल उपलब्धता के अनुरूप फसल चयन को बढ़ावा देना होगा. इसके लिए किसानों को केवल सलाह नहीं, भरोसेमंद बाजार, तकनीक और आर्थिक प्रोत्साहन भी चाहिए.
भारत के सामने चुनौती केवल अगली गर्मी निकालने की नहीं है. चुनौती ऐसी व्यवस्था बनाने की है जिसमें कमजोर मानसून पूरे समाज की कमजोरी उजागर न कर दे.
बारिश का हिसाब आसमान रखता है, लेकिन पानी का भविष्य जमीन पर तय होता है. बारिश कब और कितनी होगी, यह हमारे नियंत्रण में नहीं. लेकिन जो बारिश होती है, उसका कितना पानी बचाया जाए, कहां इस्तेमाल किया जाए और किसे कितना मिले यह फैसला हमारे हाथ में है.
जल संकट का असली समाधान बादलों से ज्यादा अपनी व्यवस्था पर भरोसा करने में है. अगर पानी की हर बूंद को केवल संकट आने पर याद किया जाएगा, तो अगली बार चेतावनी जलाशयों के आंकड़ों में नहीं, घरों के सूखे नलों में सुनाई देगी.
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