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न ज्यादा जहर और न आम सांपों जैसी बनावट... कच्छ में मिले इन दुर्लभ जीवों पर 150 साल बाद क्यों बढ़ी दिलचस्पी?

Kutch Snakes: गुजरात का कच्छ इन दिनों चर्चा में है. इसकी मुख्य वजह यहां पाए गए ऐसे सांप हैं, जो आमतौर पर कम ही दिखाई देते हैं. यहां ब्लैक-हेडेड रॉयल स्नेक और एफ्रो-एशियन सैंड स्नेक जैसे सांपों की दुर्लभ प्रजाति देखी गई है.

न ज्यादा जहर और न आम सांपों जैसी बनावट... कच्छ में मिले इन दुर्लभ जीवों पर 150 साल बाद क्यों बढ़ी दिलचस्पी?

Rare Snakes Species In Kutch: गुजरात के कच्छ में बीते महीने सितंबर 2026 में एक फॉरेस्ट ऑफिसर ने काला डूंगर के पास अपनी गाड़ी के सामने एक ऐसा अनोखा सांप रेंगता हुआ देखा, जिसे उन्होंने आजतक कहीं नहीं देखा था. इसके थोड़ी ही देर बाद उन्हें 'ब्लैक-हेडेड रॉयल स्नेक' भी दिखा. उन्होंने सांप का फोटो-वीडियो बनाकर कई एक्सपर्ट्स से उसकी पहचान करने का आग्रह किया. 

ये सांप गुजरात से लेकर पश्चिमी अफ्रीका के तटीय क्षेत्रों तक फैली शुष्क जगहों में रहते हैं और आमतौर पर पश्चिमी एशिया और उत्तरी-पूर्वी अफ्रीका के तटीय क्षेत्रों के बड़े हिस्से में पाए जाते हैं. इन सांपों को लेकर चर्चा इसलिए भी हो रही है, क्योंकि आखिरी बार इस प्रजाति के सांपों को कच्छ में 150 साल पहले देखा गया था.

सड़क पर रेंगते मिले दुर्लभ सांप 


'इंडियन एक्सप्रेस' की रिपोर्ट के मुताबिक, गुजरात वन विभाग के भुज नॉर्थ रेंज के 32 साल के रेंज फॉरेस्ट ऑफिसर (RFO) जयेश दुमाडिया ने बताया कि उनकी गांड़ी में एक सांप घुस गया था और वे उससे निपटने की कोशिश कर रहे थे कि तभी गाड़ी के अंदर एक और काले सिर वाला सांप घुस गया. 

सांप

यह 'ब्लैक-हेडेड रॉयल स्नेक' था और जैसे ही वह उसे निकालने की कोशिश करने लगे तो उनकी गाड़ी के सामने अन्य सांप 'एफ्रो-एशियन सैंड स्नेक'  उनकी गाड़ी के पास आ गया. 

ब्लैक-हेडेड रॉयल स्नेक  


कच्छ में दिखाई दिया गया ब्लैक-हेडेड रॉयल स्नेक ( Spalerosophis Atriceps) अपने खास रंगों और बनावट के लिए जाना जाता है. इसे फिशर्स रॉयल स्नेक के नाम से भी पहचाना जाता है. ' आई नेचुरलिस्ट' की रिपोर्ट के मुताबिक, इस सांप के सिर का ऊपरी हिस्सा काला या गहरे लाल-काले रंग का होता है. वहीं, इसके शरीर में गुलाबी, पीला, नारंगी और काले धब्बे दिखाई देते हैं. इसकी लंबाई भी लगभग 1.5-2 मीटर तक होती है. 

ब्लैक

ब्लैक-हेडेड रॉयल स्नेक की प्रजाति मुख्य रूप से इंडियन सबकॉन्टिनेंट के उत्तर-पश्चिमी हिस्सों में दिखाई देती है. भारत के गुजरात-राजस्थान समेत यह पाकिस्तान के कुछ इलाकों में भी दिखाई देती है. ब्लैक-हेडेड रॉयल स्नेक आमतौर पर चूहे का शिकार करके खाता है.      

एफ्रो-एशियन सैंड स्नेक 


'इंडियन स्नेक्स' की रिपोर्ट के मुताबिक, एफ्रो-एशियन सैंड स्नेक (Psammophis schokari) एक पतला और फुर्तीला सांप है, जो रेतीले और शुष्क इलाकों में रहता है. इसकी शारीरिक बनावट के चलते यह तेजी से रेंगकर अपने शिकार का पीछा कर सकता है. यह रेगिस्तान के अलावा रेत के टीलों और घास के मैदानों में पाया जाता है. यह गर्म और कम नमी वाले इलाकों में भी आसानी से जीवित रह सकता है. 

एफ्रो

एफ्रो-एशियन सैंड स्नेक की लंबाई 128 सेंटीमीटर तक होती है. इसका शरीर पतला होता है, जिस पर चिकने स्केल्स होते हैं और आखिर में एक लंबी पूंछ होती है. इसका सिर भी काफी लंबा होता है. यह सांप छिपकलियों जैसे छोटे जीवों का शिकार करता है और इसमें जहर भी बेहद कम होता है.  

कच्छ में ही क्यों मिले ये दुर्लभ सांप?


गुजरात का कच्छ अपने पथरीले इलाकों, झाड़ियों, रेतीली जमीन और शुष्क जलवायु के लिए जाना जाता है. यह वातावरण उन रेप्टाइल्स को रहने के लिए अनुकूल जगह देता, जो कम नमी और गर्म परिस्थितियों वाली जगहों पर जिंदा रह सकते हैं. 

एफ्रो

सितंबर 2026 में गश्त के दौरान वन विभाग को मिले एफ्रो-एशियन सैंड स्नेक और ब्लैक-हेडेड रॉयल स्नेक में से एफ्रो-एशियन सैंड स्नेक की मौजूदगी यहां आखिरी बार 1872 में दर्ज हुई थी. कच्छ में इन सांपों का मिलना यह भी दिखाता है कि इलाके की बायोडायवर्सिटी पर अभी और रिसर्च की आवश्यकता है. इनके पुराने आवास, मौजूदा संख्या और डिस्ट्रीब्यूशन को समझने के लिए लगातार सर्वे करना जरूरी है.

क्या भारत में दुर्लभ हैं ये सांप?


कच्छ में मिले ब्लैक हेडेड रॉयल स्नेक और एफ्रो-एशियन सैंड स्नेक भारत में पहले से ही दर्ज प्रजातियां हैं. इनके कम दिखाई देने का यह अर्थ नहीं है कि दोनों विलुप्त हो रहे हैं. 'इंटरनेशनल यूनियन फॉर कन्जर्वेशन ऑफ नेचर' (IUCN) की रेड लिस्ट में ब्लैक-हेडेड रॉयल स्नेक को लीस्ट कंर्सन यानी कम चिंता वाले जीव की लिस्ट में रखा गया है. 

कच्छ

 एफ्रो-एशियन सैंड स्नेक को कच्छ में आखिरी बार 1872 में मिलने की पुष्टि हुई थी. ऐसे में सितंबर 2026 में इसकी दोबारा पुष्टि एक महत्वपूर्ण वैज्ञानिक रिकॉर्ड है. इससे पता चलता है कि यह विलुप्त होने के खतरे में नहीं है.  

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Shruti Kaul

Shruti Kaul

ज़ी न्यूज में सब एडिटर. वनस्थली विद्यापीठ यूनिवर्सिटी, राजस्थान से जर्नलिज्म और मास कम्युनिकेशन में ग्रेजुएशन. ये राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय मुद्दो से जुड़े विषयों पर लिखती हैं. लिखने के अलावा श्रुति को नई जगहों पर घूमना, संगीत सुनना, फिल्में देखना और फूड एक्सप्लोर करने का बेहद शौक है. 
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