मोदी का संवाद, RSS की चर्चा और राहुल की ‘गूंज’... Gen Z को साधने की सियासी होड़ के पीछे क्या है प्लान?
2027 में यूपी समेत सात राज्यों के विधानसभा चुनावों में Gen Z बड़ा वोटर समूह होगा. BJP-RSS से कांग्रेस तक युवा मतदाताओं को साधने में जुटे हैं, जबकि रोजगार, शिक्षा और सुरक्षा जैसे मुद्दे अहम रहेंगे.
ना सिर्फ देश बल्कि, दुनियाभर की राजनीति में एक नया मोर्चा खुला हुआ है. इस मोर्चे का नाम है GEN Z. भारत में भाजपा, कांग्रेस और RSS भी इस मोर्चे को साधने में लगी हुई हैं. गुजरात में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी करीब 6 हजार युवाओं के बीच पहुंचे. इससे पहले RSS प्रमुख मोहन भागवत भी Gen Z और Gen Alpha के साथ संवाद कर चुके हैं. कांग्रेस की तरफ से राहुल गांधी भी ‘छात्रों की गूंज’ के जरिए देशभर के युवाओं तक पहुंच बनाने में जुटे हैं. सत्ता-संगठन और विपक्ष तीनों मोर्च इस दिशा में तेजी से काम कर रहे हैं.
भारतीय जनता पार्टी ने इस ग्रुप के युवाओं को साधने के लिए बाकायदा एक खास टीम बनाई है. नितिन नबीन की अगुआई में बनी टीम में पूर्व केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी और विनोद तावड़े समेत कई नेता शामिल हैं. इस टीम का फोकस नौजवानों की आकांक्षाओं, रोजगार, शिक्षा और दूसरी चिंताओं को समझने और उनसे सीधे संवाद करने पर है. इसके अलावा प्रधानमंत्री मोदी भी सोशल मीडिया, खासकर Instagram, के जरिए युवाओं से सीधे संवाद कर रहे हैं. साथ ही आज यानी 8 सितंबर को पीएम मोदी ने गुजरात में 6000 युवाओं के साथ सीधे संवाद भी किया है.
वहीं अगर कांग्रेस की बात करें तो राहुल गांधी 'छात्रों की गूंज' कार्यक्रम की मदद से GEN Z तक पहुंच बढ़ा रहे हैं. इस प्रोग्राम में राहुल गांधी युवाओं के मुद्दे, जैसे- पेपर लीक, परीक्षा व्यवस्था, शिक्षा की महंगाई, बेरोजगारी जैसे मुद्दों पर खुलकर चर्चा करते हैं. कांग्रेस राहुल गांधी के इस प्रोग्राम को अलग-अलग शहरों में करने की तैयारी कर रही है.
आखिर में RSS की बात करें तो, यह सीधे राजनीतिक प्रचार से हटकर संवाद और वैचारिक संपर्क साध रहा है. RSS का टार्गेट सीधे वोट मांगना नहीं है, बल्कि युवाओं के साथ संवाद का रास्ता बनाना है. अगस्त में खुद मोहन भागवत ने मुंबई में करीब 2000 Gen Z और Gen Alpha से बातचीत की. खास बात यह रही कि उन्होंने युवाओं के सवालों और असहमति को खारिज करने के बजाय उसे स्वीकार किया और खुलकर उनके मुद्दों पर चर्चा भी की.
ऐसे में सवाल उठने लाजमी हैं कि आखिर Gen Z को साधने की यह होड़ क्यों शुरू हुई है और इसके पीछे असली राजनीतिक मकसद क्या है? दरअसल 2027 में होने वाले 5 राज्यों के विधानसभा चुनाव बेहद नजदीक हैं. इन राज्यों में उत्तर प्रदेश, गुजरात, पंजाब, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, मणिपुर और गोवा शामिल हैं. चुनाव आयोग के मुताबिक इन पांचों राज्यों में 18 से 29 साल की उम्र के वोटरों की तादाद लगभग 22% है. युवाओं का यह समूह इसलिए और ज्यादा अहम हो जाता है, क्योंकि पिछले चुनावों के नतीजों के मुताबिक, इन सातों राज्यों की 940 में से 257 विधानसभा सीटों पर जीत का अंतर 5% या उससे कम आंका गया है.
ऊपर दिए गए आंकड़े बताते हैं कि वोटरों की पसंद में थोड़ा सा बदलाव भी कड़े मुकाबले वाली कई सीटों पर नतीजों को प्रभावित कर सकता है. हालांकि, Gen Z वोटरों के बीच 5 प्रतिशत का बदलाव होने का मतलब अपने आप सरकार बदलना नहीं होगा, क्योंकि वोटिंग में हिस्सा लेने वालों की संख्या, गठबंधन, क्षेत्रीय मुद्दे, उम्मीदवार और दूसरे समूहों के वोटिंग व्यवहार जैसी बातें भी अहम भूमिका निभाएंगी.
वरिष्ठ पत्रकार पुष्पेंद्र शर्मा ने ZEE NEWS से बात करते हुए कहा,'GEN Z और GEN Alpha को लेकर कहा कि हमारे युवा बहुत कमाल के हैं. खास बात यह है कि ये जनरेशन किसी एक व्यक्ति और या फिर पार्टी के खिलाफ नहीं हैं, बल्कि ये खराब सिस्टम के खिलाफ हैं. व्यवस्था और सिस्टम से सवाल पूछती है. उनका असंतोष किसी खास चेहरे से ज्यादा उस व्यवस्था को लेकर है जिसे वे अपने लिए जिम्मेदार मानते हैं.'
उन्होंने आगे बताया,'GEN Z ने राजनीतिक पार्टियों को एक संदेश स्पष्ट दिया है कि देश का युवा अब सिर्फ चुनावी प्रचार के लिए दर्शक मात्रभर नहीं है. वे अब खुद अपने मुद्दों को मुखर होकर उठाएंगे और राजनीति किस दिशा में होनी है, यह भी खुद ही तय करेंगे. क्योंकि उनके अंदर ना सिर्फ सिस्टम में बदलाव लाने की क्षमता है, बल्कि चुनाव के परिणाम को बदलने की ताकत भी है.'
उत्तर प्रदेश
भाजपा के पूर्व प्रवक्ता और सीनियर जर्नलिस्ट नवीद जिंदल से बात की. हमने उनसे पूछा कि भारत की राजनीति के लिए GEN Z शब्द नया है. ऐसे में पार्टियां किस तरह इस जनरेशन निपटेगी? उन्होंने जवाब में बताया कि भारत विश्व का सबसे ज्यादा युवा आबादी वाला देश है. ऐसे में लगभग सभी पार्टियों ने अपने यूथ विंग पहले से ही बनाए हुए हैं. Gen Z शब्द आ जाने से सिर्फ कुछ बदलाव किए गए हैं.
नवीन जिंदल से जब हमने पूछा कि क्या युवा खुद अपने विवेक से चुनाव में वोट डालेंगे या फिर अपने अभिभावकों के इशारे पर चलेंगे? जिंदल ने जवाब दिया कि मेरा मानना है कि हो सकता है कि 5-10 फीसदी युवा अपने परिवार की राजनीतिक पसंद से अलग जाकर फैसला लेंगे, लेकिन अधिकतर युवा काफी समझदार हैं और अपने आसपास के माहौल को देखकर फैसला लेते हैं. उनके लिए सुरक्षा की भावना भी एक महत्वपूर्ण फैक्टर है और मेरा मानना है कि उत्तर प्रदेश में योगी सरकार ने युवाओं के बीच यह सुरक्षा की भावना पैदा की है. इसलिए परिवार की राजनीतिक विरासत का असर जरूर रहेगा, लेकिन युवा अपने अनुभव और मौजूदा सरकार के काम को भी ध्यान में रखकर फैसला करेगा.
गुजरात
गुजरात को लेकर हमने ZEE MEDIA ग्रुप की गुजरात वेबसाइट के संपादक करन सिंह से बात की तो, उन्होंने बताया,'गुजरात में इस बार करीब 4.40 करोड़ वोटर्स हैं. चुनाव में युवाओं और आम मतदाताओं से जुड़े कई मुद्दे अहम रहेंगे. इनमें बेरोजगारी और सरकारी भर्तियां, शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं का बुनियादी ढांचा, महंगाई और बिजली की दरें, खेती-किसानी से जुड़े सवाल और शहरी-ग्रामीण इलाकों में बुनियादी सुविधाओं का अंतर प्रमुख हैं.'
करन सिंह ने आगे बताया कि गुजरात में शहरी इलाकों में बीजेपी की पकड़ अब भी मजबूत मानी जाती है, लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में सरकार के खिलाफ नाराजगी यानी एंटी-इनकंबेंसी की भावना मौजूद है. ऐसे में कांग्रेस और AAP इस बार बेरोजगारी, सरकारी भर्ती, आदिवासी अधिकार और किसानों के मुद्दों को जोर-शोर से उठाने की कोशिश करेंगी.
गुजरात में बीजेपी के सामने सबसे बड़ी चुनौती
करन सिंह ने भाजपा की चुनौतियों को लेकर बताया,'गुजरात में करीब 40 फीसदी वोट अब भी बीजेपी के खिलाफ जाता है, लेकिन बीजेपी का सबसे बड़ा फायदा यह है कि सरकार विरोधी वोट एकजुट नहीं है. कांग्रेस और AAP के बीच एंटी-बीजेपी वोटों का बंटवारा बीजेपी को चुनावी फायदा पहुंचाता रहा है. इसलिए 2027 में विपक्ष के सामने सिर्फ बीजेपी के खिलाफ माहौल बनाने की चुनौती नहीं होगी, बल्कि उस वोट को एकजुट रखने की चुनौती भी होगी.
पंजाब
15 वर्षों से पंजाब की राजनीति पर नजर रखने वाले ZEE पंजाब हरियाणा के सीनियर प्रिंसिपल कॉरेस्पॉन्डेंस रोहित से बात की तो उन्होंने बताया कि इस बार के चुनाव में युवाओं का किरदार बहुत बड़ा होने वाला है. उन्होंने पिछले कुछ चुनावों को नजर में रखते हुए बताया कि जिस पार्टी को करीब 35 से 37 फीसदी वोट मिल जाता है, उसके लिए सरकार बनाने के रास्ते साफ हो जाते हैं. ऐसे में अगर पंजाब का करीब 46 लाख युवा वोटर चुनावी मैदान में हैं, तो स्वाभाविक है कि सभी राजनीतिक दल इस वर्ग को अपने साथ जोड़ने की कोशिश करेंगे.
रोहित से जब हमने सवाल किया कि इस बार पंजाब के चुनाव में क्या प्रमुख मुद्दे हो सकते हैं? तो उन्होंने पंजाब का एक बेहद पुराना मुद्दा फिर से इस चुनाव का प्रमुख केंद्र बताया. रोहित ने बताया,'पंजाब में युवाओं के लिए ड्रग्स एक बड़ा मुद्दा है. इसके अलावा सरकारी कर्मचारियों की मांगें, DA और अस्थायी यानी टेंपरेरी कर्मचारियों से जुड़े सवाल भी चुनाव में महत्वपूर्ण रहेंगे. ये ऐसे मुद्दे हैं जिनका सीधा असर युवाओं और उनके परिवारों पर पड़ता है.'
उन्होंने यह भी कहा कि पंजाब में युवाओं का वोट पूरी तरह स्वतंत्र नहीं कहा जा सकता. यहां परिवार की राजनीतिक पसंद और राजनीतिक विरासत का असर काफी देखने को मिलता है. अगर किसी परिवार की किसी पार्टी के प्रति लंबे समय से निष्ठा रही है, तो उसका प्रभाव युवा वोटर पर भी पड़ता है.
उत्तराखंड
उत्तराखंड में युवाओं के लिए बेरोजगारी, सरकारी भर्तियां और पेपर लीक सबसे अहम मुद्दों में हैं. इसके साथ पहाड़ों से पलायन, शिक्षा-स्वास्थ्य सुविधाएं, सड़क और कनेक्टिविटी तथा पर्यटन के जरिए स्थानीय रोजगार भी चुनावी मुद्दे रहेंगे.
हिमाचल प्रदेश
हिमाचल में सरकारी नौकरी, बेरोजगारी और भर्ती प्रक्रिया युवाओं के प्रमुख सवाल हैं. इसके अलावा सरकारी कर्मचारियों के मुद्दे, महंगाई, शिक्षा-स्वास्थ्य, पर्यटन और राज्य की आर्थिक स्थिति भी चुनाव में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है.
मणिपुर
मणिपुर में बाकी राज्यों की तुलना में मुद्दे बिल्कुल अलग हैं. यहां युवाओं के लिए सबसे बड़ा सवाल शांति, सुरक्षा और सामान्य जिंदगी की वापसी का है. जातीय हिंसा, विस्थापन, मैतेई-कुकी के बीच तनाव, कानून-व्यवस्था, शिक्षा और रोजगार चुनावी राजनीति के केंद्र में रहेंगे.
गोवा
गोवा में युवाओं के लिए रोजगार और स्थानीय अवसर प्रमुख मुद्दे हैं. इसके साथ जमीन और स्थानीय लोगों के अधिकार, पर्यटन का बढ़ता दबाव, पर्यावरण संरक्षण, ट्रैफिक, बुनियादी ढांचा, महंगाई और आदिवासी प्रतिनिधित्व जैसे मुद्दे भी 2027 में असर डाल सकते हैं.
दुनिया के कई देश GEN Z को के लेकर बदल रहे रणनीति
GEN Z को लुभाने के लिए सिर्फ भारत में ही होड़ नहीं मची हुई, बल्कि दुनिया के कई देश इस जनरेशन को अपने तरफ खींचने के लिए उनकी तरीकों पर चल रहे हैं. अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस और जर्मनी जैसे देश की राजनीतिक पार्टियां भी इस खास उम्र के युवाओं को लुभाने के लिए इन्फ्लुएंसर्स, कंटेंट क्रिएटर्स, मीम्स, TikTok पर सक्रियता बढ़ा रहे हैं. पूरी स्टोरी पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें