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लोकतंत्र में विपक्ष का काम सिर्फ सरकार को घेरना नहीं, सरकार को जवाब देने के लिए मजबूर करना भी है. इस काम में एक बुनियादी शर्त है कि जनता को विपक्ष की बात पर भरोसा होना चाहिए.
आरोप कितना बड़ा है, इससे ज्यादा अहम है कि उसके पीछे सबूत कितने ठोस हैं. भीड़ कितनी बड़ी है, इससे ज्यादा जरूरी है कि मुद्दा कितना व्यापक है. कैमरे पर प्रदर्शन कितना प्रभावशाली दिखता है, इससे ज्यादा मायने रखता है कि प्रदर्शन के बाद जनता की जिंदगी में क्या बदला.
राहुल गांधी और विपक्ष की हालिया राजनीतिक रणनीति को इसी कसौटी पर परखने की जरूरत है. मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर पर सवाल, वोट चोरी के आरोप, सुप्रीम कोर्ट तक मार्च और सड़कों पर विरोध के बीच एक सवाल लगातार खड़ा है कि क्या विपक्ष अपनी बात को मजबूत करने में जुटा है या अपने विरोध को ही राजनीति का मुख्य उद्देश्य बना बैठा है?
यह फर्क मामूली नहीं है. पहली रणनीति लोकतंत्र को मजबूत करती है, दूसरी में लोकतंत्र का मंच तो रहता है, लेकिन जनता का भरोसा धीरे-धीरे खिसकने लगता है.
भारत ने आजादी की लड़ाई आंदोलनों से जीती. संविधान शांतिपूर्ण विरोध और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की रक्षा करता है. लिहाजा किसी भी सरकार की आलोचना करना, उसके फैसलों पर सवाल उठाना और उसके खिलाफ सड़कों पर उतरना लोकतंत्र का स्वाभाविक हिस्सा है. सरकार के पास बहुमत हो सकता है लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि उसके पास हर सवाल का सही जवाब भी है.
यहीं विपक्ष की भूमिका अहम हो जाती है. उसे सरकार की गलतियां सामने लानी चाहिए, संस्थाओं की जवाबदेही सुनिश्चित करनी चाहिए और उन लोगों की आवाज बनना चाहिए जिनकी सुनवाई नहीं हो रही. लेकिन विरोध का अधिकार अराजकता का लाइसेंस नहीं है.
जब आंदोलन के नाम पर सड़कें घेर दी जाती हैं, सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचता है, दुकानदारों पर दुकान बंद रखने का दबाव बनता है या आम लोगों का रास्ता रोकना राजनीतिक ताकत का प्रदर्शन माना जाने लगता है, तब सवाल सरकार से हटकर आंदोलन करने वालों पर भी उठते हैं.
किसी प्रदर्शन की सफलता का पैमाना यह नहीं हो सकता कि उससे कितने लोगों को परेशानी हुई. पैमाना यह होना चाहिए कि उससे कितनी समस्याओं का समाधान हुआ.
जनता पहले से महंगाई, रोजगार, परिवहन और रोजमर्रा की चुनौतियों से जूझ रही है. उसे अपने अधिकारों के लिए लड़ने वाले प्रतिनिधि चाहिए, उसकी मुश्किलें बढ़ाने वाले राजनीतिक आयोजन नहीं. जनता के लिए लड़ने और जनता को परेशान करके लड़ने में बहुत अंतर है. विपक्ष को यह अंतर समझना होगा.
राहुल गांधी ने मतदाता सूचियों में कथित गड़बड़ियों को लेकर वोट चोरी का मुद्दा उठाया है. यह गंभीर विषय है. मतदाता सूची में किसी पात्र नागरिक का नाम छूटना भी चिंता की बात है और किसी अपात्र व्यक्ति का नाम बने रहना भी गलत है. चुनाव की निष्पक्षता के लिए दोनों समस्याओं का समाधान जरूरी है.
लेकिन गंभीर मुद्दा उठाने भर से आरोप अपने आप साबित नहीं हो जाता. उसके लिए प्रमाण चाहिए, स्पष्ट आंकड़े चाहिए और ऐसी पड़ताल चाहिए जिसे कोई स्वतंत्र व्यक्ति भी जांच सके. राजनीति में आरोप लगाना आसान है, आरोप को प्रमाणित करना अक्सर कठिन होता है. विपक्ष की असली परीक्षा इसी दूसरे मोर्चे पर है.
यदि किसी क्षेत्र में बड़ी संख्या में पात्र मतदाताओं के नाम हटे हैं, तो उन नामों की सूची, संबंधित दस्तावेज, प्रभावित परिवारों के बयान और चुनाव अधिकारियों के जवाब सामने आने चाहिए.
जिन मामलों में गलती साबित होती है, वहां सुधार की मांग होनी चाहिए. जिन मामलों में आशंका गलत निकलती है, वहां उसे स्वीकार करने का साहस भी दिखना चाहिए.
इसके बजाय यदि हर प्रशासनिक प्रक्रिया को सीधे लोकतंत्र पर हमले के रूप में पेश किया जाए तो विरोध की धार कमजोर पड़ सकती है. हर सवाल साजिश नहीं होता और हर सरकारी जवाब अंतिम सत्य नहीं होता है. लोकतंत्र को इन दोनों अतियों से बचाना होगा.
कांग्रेस और दूसरे विपक्षी दलों की कमजोरी यह है कि वे अब तक इस मुद्दे पर ऐसा व्यापक, प्रमाण-आधारित जनअभियान खड़ा करने में सफल होते नहीं दिखे जो आरोपों को राजनीतिक नारों से आगे ले जाए.
यदि मतदाता सूची में गड़बड़ियां हैं तो उन्हें दूर कराने में विपक्ष की भूमिका सबसे आगे दिखनी चाहिए. सिर्फ मंच से चिंता जताने से किसी मतदाता का नाम सूची में वापस नहीं आता.
विपक्ष का सुप्रीम कोर्ट तक मार्च और मतदाता सूची से जुड़े मामले में याचिका दाखिल करने की कोशिश एक अहम राजनीतिक प्रसंग है. न्यायपालिका के सामने अपनी बात रखना लोकतांत्रिक और संवैधानिक रास्ता है. किसी फैसले से असहमति हो तो कानूनी विकल्पों का इस्तेमाल करना भी स्वाभाविक है.
लेकिन यहां एक बुनियादी सवाल है. जब कोई पक्ष न्यायपालिका के दरवाजे पर जाता है तो क्या उसे अपनी दलीलें रखने के साथ न्यायिक प्रक्रिया का सम्मान भी नहीं करना चाहिए?
याचिका में कमियां हों तो उन्हें दूर करना, सुनवाई का इंतजार करना और फैसले के बाद उपलब्ध कानूनी विकल्प अपनाना सामान्य प्रक्रिया है. अदालत के समक्ष कानूनी लड़ाई के साथ-साथ राजनीतिक अभियान चलाने की रणनीति कम से कम यह सवाल जरूर पैदा करती है कि प्राथमिकता न्यायिक निर्णय है या राजनीतिक संदेश देना है.
हालांकि, अदालत के बाहर प्रदर्शन करना अपने आप में न्यायपालिका का अपमान नहीं माना जा सकता. शांतिपूर्ण विरोध और न्यायिक प्रक्रिया साथ-साथ चल सकते हैं. असली कसौटी यह है कि प्रदर्शन किसी संस्थान को धमकाने या उससे मनचाहा फैसला हासिल करने का माध्यम न बने.
राहुल गांधी और विपक्ष को यह स्पष्ट करना होगा कि वे अदालत से न्याय चाहते हैं या अदालत में लंबित मुद्दे को राजनीतिक संघर्ष का स्थायी ईंधन बनाए रखना चाहते हैं. दोनों के बीच महीन लेकिन निर्णायक अंतर है. संस्थाओं पर सवाल उठाना लोकतांत्रिक अधिकार है, संस्थाओं से अपनी पसंद का नतीजा मांगना लोकतांत्रिक मर्यादा नहीं है.
चुनाव आयोग की जवाबदेही भी जरूरी
विपक्ष की रणनीति की आलोचना का अर्थ चुनाव आयोग को सवालों से छूट देना नहीं है. लोकतंत्र में चुनाव आयोग की विश्वसनीयता बेहद महत्वपूर्ण है. मतदाता सूची का पुनरीक्षण पारदर्शी होना चाहिए. पात्र मतदाता का नाम छूटने की आशंका को गंभीरता से लिया जाना चाहिए. नोटिस, दस्तावेज और आपत्तियों की प्रक्रिया इतनी सरल हो कि आम नागरिक भी उसे समझ सके.
यदि किसी मतदाता को अपना नाम बचाने या जुड़वाने के लिए अनावश्यक दफ्तरों के चक्कर लगाने पड़ रहे हैं तो यह प्रशासनिक विफलता है. आयोग को समयसीमा, शिकायत निवारण, सुनवाई और अपील की व्यवस्था के बारे में स्पष्ट जानकारी देनी चाहिए. आंकड़े सार्वजनिक हों और जहां गलती मिले, वहां सुधार की कार्रवाई भी दिखनी चाहिए.
विपक्ष को भी अपने आरोपों के साथ यही करना चाहिए. जिन लोगों के नाम कटने का दावा है, उनके मामलों को दस्तावेजों के साथ सामने लाए. बूथ स्तर पर सहायता शिविर लगाए. नागरिकों को फॉर्म भरने और आपत्ति दर्ज कराने में मदद करे. फिर बताए कि कितने लोगों की समस्या हल हुई.
कल्पना कीजिए कि कांग्रेस या विपक्षी दल किसी राज्य में हजारों पात्र मतदाताओं के नाम दोबारा जुड़वाने में सफल होते हैं. यह उपलब्धि किसी बड़े धरने से अधिक प्रभावशाली हो सकती है. इससे जनता को प्रत्यक्ष लाभ मिलेगा और आरोपों को विश्वसनीयता भी मिलेगी.
यानी चुनाव आयोग की जवाबदेही और विपक्ष की जिम्मेदारी एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक प्रक्रिया के दो जरूरी हिस्से हैं.
आज विपक्ष की चुनौती सिर्फ राहुल गांधी की बयानबाजी या किसी एक आंदोलन की रणनीति तक सीमित नहीं है. बड़ी समस्या यह है कि सरकार के खिलाफ साझा असहमति को साझा राजनीतिक कार्यक्रम में बदलना आसान नहीं हो पा रहा है.
विपक्षी गठबंधन में अलग-अलग दलों के अपने राज्य, अपने हित और अपने राजनीतिक समीकरण हैं. जो मुद्दा एक दल के लिए केंद्रीय हो सकता है, वह दूसरे के लिए उतना महत्वपूर्ण नहीं है. ऐसे में किसी एक नेता के नेतृत्व में पूरे विपक्ष का एक सुर में बोलना अपने आप में चुनौती है.
राहुल गांधी यदि किसी मुद्दे पर व्यापक सहमति का दावा करते हैं तो उन्हें यह भी सुनिश्चित करना होगा कि उनके सहयोगी दल उस मुद्दे पर वास्तव में साथ हैं. गठबंधन सिर्फ संयुक्त तस्वीर से नहीं चलता है. उसके लिए साझा कार्यक्रम, जिम्मेदारियां और जनता के सामने स्पष्ट प्रस्ताव जरूरी हैं.
विपक्ष को यह भी बताना होगा कि सत्ता में आने पर वह क्या अलग करेगा. चुनाव सुधारों पर उसका प्रस्ताव क्या है? रोजगार बढ़ाने का रोडमैप क्या है? शिक्षा और स्वास्थ्य पर उसकी प्राथमिकताएं क्या हैं?
किसानों, छोटे कारोबारियों और युवाओं के लिए उसकी योजनाएं क्या हैं? इन सवालों का जवाब केवल सरकार की आलोचना से नहीं मिलेगा.
सत्ता विरोधी भावना अपने आप सत्ता परिवर्तन की गारंटी नहीं होती है. जनता को विकल्प दिखाई देना चाहिए. लोकतंत्र में सरकार की विफलता विपक्ष की सफलता नहीं बन जाती, जब तक विपक्ष यह साबित न करे कि वह बेहतर शासन दे सकता है.
राहुल गांधी और कांग्रेस के सामने अब चुनाव केवल इस बात का नहीं है कि वे कितनी बड़ी रैली कर सकते हैं या कितनी देर तक सड़क पर बैठ सकते हैं. सवाल यह है कि वे जनता के बीच कितनी विश्वसनीयता बना सकते हैं.
एक आंदोलन लोगों का ध्यान खींच सकता है लेकिन भरोसा लगातार काम करने से बनता है. एक नारा समर्थकों को उत्साहित कर सकता है लेकिन लोकतांत्रिक बहुमत जुटाने के लिए तर्क, तथ्य और समाधान चाहिए. सरकार को घेरना विपक्ष का काम है लेकिन हर घेराव को राजनीतिक उपलब्धि मान लेना उसकी भूल हो सकती है.
यह कसौटी सिर्फ कांग्रेस पर लागू नहीं होती. सत्ता पक्ष को भी विरोध की आवाज सुननी चाहिए, शांतिपूर्ण प्रदर्शन की जगह सुनिश्चित करनी चाहिए और असहमति को राष्ट्रविरोध का तमगा देने से बचना चाहिए. प्रशासन को कानून लागू करते समय निष्पक्षता रखनी चाहिए. लोकतंत्र में जिम्मेदारी एकतरफा नहीं होती.
लेकिन जिस दल का दावा है कि वह जनता के अधिकारों की रक्षा के लिए लड़ रहा है, उससे अपेक्षाएं भी अधिक होंगी. उसे अपने आरोपों के प्रमाण देने होंगे, अपने आंदोलन की मर्यादा बनाए रखनी होगी और अदालत के सामने रखे गए तर्कों पर भरोसा करना होगा.
अंततः लोकतंत्र में सड़क जरूरी है, अदालत जरूरी है और संसद भी. लेकिन इन सबके बीच सबसे जरूरी है जनता का विश्वास. वह विश्वास न केवल सरकार को जवाबदेह बनाता है, बल्कि विपक्ष को भी प्रासंगिक रखता है.
विपक्ष को यह समझना होगा कि सरकार के खिलाफ गुस्सा पैदा करना और जनता के भीतर भरोसा पैदा करना दो अलग-अलग राजनीतिक कौशल हैं. पहला क्षणिक सुर्खियां दे सकता है, दूसरा भविष्य बनाता है.
अगर विपक्ष ने यह फर्क नहीं समझा तो आंदोलन जारी रहेंगे, नारे गूंजते रहेंगे और कैमरे भी चलते रहेंगे लेकिन लोकतंत्र के सबसे अहम सवाल का जवाब अधूरा रहेगा आखिर जनता भरोसा किस पर करे?