SOCIAL MEDIA

Newsletter

PARTNER SITES
Select language

'ऑफिस के गधों' से पक्षपात के आरोपों तक...जब चुनाव आयोग में खुलकर दिखे मतभेद

चुनाव आयोग में घमासान मचने का दावा किया जा रहा है. विपक्षी पार्टियां हमलावर हैं. लेकिन चुनाव आयोग में मतभेदों का आरोप नया नहीं है.इससे पहले भी कई मौकों पर मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों के बीच मतभेदों की खबरें आती रही हैं.

Written By Rachit Kumar
Published: Sep 24, 2026, 01:43 PM IST | Updated: Sep 24, 2026, 02:36 PM IST
Image Credit: चुनाव आयोग में मतभेदों का इतिहास काफी पुराना है.
Join

मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार पर 'द इंडियन एक्सप्रेस' की रिपोर्ट के बाद सियासी खलबली मची हुई है. पूरा विपक्ष एकजुट होकर ज्ञानेश कुमार पर हमलावर है. दूसरी ओर, चुनाव आयोग की ओर से सफाई भी आई है कि जिन फैसलों की बात कही जा रही है, उन पर निर्णय सर्वसम्मति से लिए गए हैं.

लेकिन चुनाव आयोग में मतभेदों के आरोप पहली बार सामने नहीं आए हैं. साल 1989 से लेकर अब तक यह सिलसिला बदस्तूर जारी है. जब से चुनाव आयोग बहुसदस्यीय संस्था बना है, तब से लेकर अब तक विभिन्न मौकों पर कामकाज को लेकर मतभेद सामने आते रहे हैं.

1989 में शामिल हुए दो चुनाव आयुक्त

साल 1989 तक चुनाव आयोग में एक मुख्य चुनाव आयुक्त होते थे. लेकिन साल 1989 में इसमें दो और चुनाव आयुक्तों एसएस धनोआ और वीएस सीगल को शामिल किया गया. उस वक्त मुख्य चुनाव आयुक्त थे आरवीएस पेरी शास्त्री. उन्होंने कभी खुलकर तो इस बारे में कोई बात नहीं कही. लेकिन यह माना कि आयोग में दो नए सदस्यों के आ जाने से उनके अधिकारों में कमी आई है. लेकिन जब साल 1990 आया तो चुनाव आयोग फिर से एक सदस्य वाला संस्थान बन गया और दोनों आयुक्तों की नियुक्ति रद्द कर दी गई.

टीएन शेषन ने कह दिया था ऑफिस के गधे

1993 में जब टीएन शेषन मुख्य चुनाव आयुक्त थे. उस दौर में एक बार फिर से चुनाव आयोग को बहुसदस्यीय संस्था बनाया गया. तब जीवीजी कृष्णमूर्ति और एमएस गिल को चुनाव आयुक्त बनाया गया. लेकिन इन दोनों का तत्कालीन सीईसी टीएन शेषन के साथ लंबा टकराव चला. टीएन शेषन का कहना था कि इन दोनों की नियुक्ति उनके कार्यालय की स्वतंत्रता पर अटैक है. उन्होंने दोनों आयुक्तों को मान्यता तक नहीं दी थी.

टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट में कहा गया कि इन दोनों चुनाव आयुक्तों के साथ टीएन शेषन ने आधिकारिक दस्तावेज तक साझा नहीं किए. साथ ही बैठकों में भी इनको नहीं बुलाया जाता था. ना ही इनको चुनाव आयोग में कोई काम दिया. रिपोर्ट के मुताबिक, खुलेआम इनका इंटरव्यू में मजाक उड़ाया गया और इनको अपने 'ऑफिस के दो गधे' तक कह डाला.

नवीन चावला Vs गोपालस्वामी

यह विवाद साल 2006-2009 के बीच चला. तब मुख्य चुनाव आयुक्त एन गोपालस्वामी थे और चुनाव आयुक्त थे नवीन चावला. जब कार्यकाल खत्म होने वाला था, तब गोपालस्वामी ने राष्ट्रपति को खत लिखकर चावला को हटाने की दरख्वास्त की थी. उनका आरोप था कि चावला कांग्रेस के नेताओं को बैठक की जानकारी लीक करते हैं. यह भी आरोप लगाया गया था कि कई बार टॉयलेट ब्रेक का बहाना बनाकर वह चुनाव आयोग के बैठकों की जानकारी कांग्रेस के सीनियर नेताओं को देते थे.

मगर उस वक्त की मनमोहन सरकार ने गोपालस्वामी की इस सिफारिश को नहीं माना और इसे ठुकरा दिया. बाद में नवीन चावला मुख्य चुनाव आयुक्त बनाए गए.

सुनील अरोड़ा बनाम अशोक लवासा

साल था 2019 और मुख्य चुनाव आयुक्त थे सुनील अरोड़ा. उनका भी चुनाव आयुक्त अशोक लवासा से मतभेद चला. मीडिया रिपोर्ट्स में कहा गया कि अशोक लावासा ने पीएम मोदी और गृह मंत्री अमित शाह (उस वक्त बीजेपी चीफ) के खिलाफ आचार संहिता के उल्लंघन की शिकायतों से जुड़े मामलों पर असहमति दिखाई थी. लेकिन न सिर्फ उनकी राय को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया बल्कि असहमति के नोट को पब्लिक भी नहीं किया गया. इसके बाद 18 अगस्त 2020 को अशोक लवासा ने पद से इस्तीफा दे दिया. उस वक्त उनके कार्यकाल को दो साल बचे हुए थे. फिर अरुण गोयल ने चुनाव आयुक्त का पद संभाला. लेकिन  उन्होंने भी निजी कारणों से इस्तीफा दे दिया. कहा जाता है कि उनके तत्कालीन सीईसी राजीव कुमार से रिश्ते ठीक नहीं थे.

ताजा मामला क्या है?

अंग्रेजी अखबार द इंडियन एक्सप्रेस ने अपनी रिपोर्ट में दावा किया है कि मौजूदा चुनाव आयुक्तों विवेक जोशी और सुखबीर सिंह संधू ने 10 महीने में 14 बार फैसलों पर आपत्ति जताई. आयुक्तों के मुताबिक, ये फैसले उनकी जानकारी के बिना जारी किए गए. लेकिन चुनाव आयोग ने कहा कि अलग-अलग राय होना आम बात है और सभी फैसले संधु और जोशी की सहमति से ही लिए गए हैं.    
 

 

Add Zee News as a Preferred Source
TAGS:

About the Author

रचित कुमार जी न्यूज डिजिटल में असिस्टेंट एडिटर हैं. देश, दुनिया और डिफेंस की खबरों को आसान भाषा में बताने में महारत हासिल है. जी न्यूज से मई 2022 में जुड़े और शिफ्ट देखने का 12 साल से ज्यादा का अनुभव है. जी न्यूज में Best Performer अवॉर्ड भी मिल चुका है. जी न्यूज, आजतक और एबीपी न्यूज में शिफ्ट देखते हुए महामहिम, बिहार के बाहुबली सीरीज शुरू की और कई एक्सप्लेनर खबरों पर काम किया.  इंडिया न्यूज और जनसत्ता में शिफ्ट देखने के साथ-साथ ट्रैफिक लाने वाली खबरों को तवज्जो दी. नवभारत टाइम्स से करियर की शुरुआत हुई और वहां तकरीबन ढाई साल तक फ्रंट पेज 2 और देश-विदेश के पन्नों की जिम्मेदारी संभाली. जर्नलिज्म में पोस्टग्रेजुएट और IIMC से डिप्लोमा करने  वाले रचित कुमार 13 साल से पत्रकारिता के क्षेत्र में काम कर रहे हैं. आप Rachit.kumar@India.com पर सीधे ईमेल कर इनसे जुड़ सकते हैं. 
Read More

ZEENEWS TRENDING STORIES