तड़प-तड़प कर मर रहीं डल और झेलम! रोजाना बहाया जा रहा बिना ट्रीट किया हुआ 147 मिलियन लीटर सीवेज वाटर
Pollution in Dal Lake and Jhelum River: कश्मीर की जलधाराओं पर संकट का साया छाया हुआ है. एक स्टडी के मुताबिक़, 147 मिलियन लीटर बिना ट्रीट किया हुआ सीवेज वाटर झेलम नदी और डल झील में गिर रहा है.
Causes of pollution in Dal Lake and Jhelum River: क्या कश्मीर की मशहूर झेलम और डल झील अपनी मौत मर रही हैं? यह सवाल इन दिनों पर्यावरणविदों को परेशान कर रही हैं. एक अहम वैज्ञानिक स्टडी से पता चला है कि कश्मीर के मशहूर जल-स्रोत - झेलम और डल झील - सीवेज के बढ़ते संकट के कारण गंभीर खतरे में हैं. श्रीनगर का लगभग 147 मिलियन लीटर बिना ट्रीट किया हुआ सीवेज हर दिन इनमें बहाया जा रहा है.
मर रहीं डल और झेलम!
यह आंकड़ा 'वॉटर' (Water) जर्नल में छपी स्टडी "असेसमेंट ऑफ स्पैटियो-टेम्पोरल डायनामिक्स ऑफ डल लेक ट्रॉफिक स्टेट" (Assessment of Spatio-Temporal Dynamics of Dal Lake’s Trophic State) से सामने आया है. रिसर्च करने वालों का अनुमान है कि श्रीनगर में रोज़ाना लगभग 201 मिलियन लीटर सीवेज वाटर पैदा होता है, जिसमें से लगभग 73% (यानी करीब 147 मिलियन लीटर) बिना ट्रीट किया हुआ सीवेज डल झील और झेलम नदी में बहा दिया जाता है. हालांकि, स्टडी में झेलम और डल झील में जाने वाली मात्रा का अलग-अलग ब्योरा नहीं दिया गया है.
ये नतीजे और भी चिंताजनक हैं क्योंकि दोनों जल-स्रोत पहले से ही गंभीर इकोलॉजिकल दबाव में हैं. झेलम नदी पूरे कश्मीर से होकर बहती है, इसलिए उस पर भी वेस्टवॉटर का बोझ बढ़ रहा है. नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) में जमा की गई एक 'एक्शन-टेकन रिपोर्ट' में झेलम में गिरने वाले 10 आउटफॉल का ज़िक्र है, जिनमें घरों से निकलने वाला वेस्टवॉटर भी शामिल है.
CAG (कंप्ट्रोलर एंड ऑडिटर जनरल) की ऑडिट में श्रीनगर के ड्रेनेज सिस्टम की कमियां भी सामने आई हैं. पता चला है कि शहर में सीवेज और बारिश के पानी (स्टॉर्म-वॉटर) के लिए अलग-अलग नेटवर्क नहीं हैं. इसके अलावा, डल झील के आसपास J&K लेक कंजर्वेशन एंड मैनेजमेंट अथॉरिटी (LCMA) के बहुत कम STP (सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट) हैं. इनकी संख्या सिर्फ़ 4 है और इनकी क्षमता रोज़ाना 36.74 ML सीवेज साफ करने की है, जबकि बाकी पूरे शहर के लिए सिर्फ 2 STP काम कर रहे हैं.
'डल की गहराई ढाई फीट तक आई'
स्टडी के रिसर्चर डॉ. तौसीफ़ भट कहते हैं, 'हर जगह जो कॉस्मेटिक बदलाव किए जा रहे हैं, वही इन जल निकायों (water bodies) के साथ भी हो रहा है. हम इन्हें बस ऊपर-ऊपर से सुंदर बनाने की कोशिश कर रहे हैं ताकि लोग आएं और कहें, 'वाह, हमने एक शानदार झील देखी है.' लेकिन मुख्य निगीन पार्क से बस 500 या 1000 मीटर दूर जाने पर, हमने पाया कि डल झील की गहराई 2.5 फ़ीट भी नहीं है, 2 फ़ीट भी नहीं है. यानी गहराई के मामले में यह झील मर चुकी है.'
उन्होंने आगे कहा, झेलम और डल झील ये दोनों कश्मीर की जीवन रेखाएं हैं, लेकिन इनकी हालत बहुत खराब है. आप पानी का रंग देखिए, वह एकदम काला पड़ चुका है. डल झील के आसपास का बोझ काफी बढ़ गया है. यह 2 लाख से बढ़कर 3 लाख हो गया है और तेज़ी से बढ़ रहा है. उस सारे सीवेज का कितना ट्रीटमेंट किया गया है? आपने सभी इलाकों में STP तो लगा दिए, लेकिन उन STP से निकलने वाला पानी 100% ट्रीटेड नहीं होता. तो समस्या कई स्तरों पर है और हमें समाधान भी कई स्तरों पर चाहिए, सिर्फ़ एक स्तर पर नहीं.
डॉ. तौसीफ़ भट कहते हैं, 'हाल ही में हमने एक रिसर्च की है. उससे पता चला है कि श्रीनगर में एक औसत इंसान खाना पकाने, पीने, नहाने, कपड़े धोने वगैरह के लिए रोज़ाना 120 से 150 लीटर पानी इस्तेमाल करता है. अब अगर हम श्रीनगर की कुल आबादी का औसत लें (ग्रेटर श्रीनगर को छोड़कर), तो यह लगभग 10 से 12 लाख ML बैठता है. मान लीजिए पैमाना 10 लाख लीटर का है. तो 10 लाख को 24 घंटे में प्रति व्यक्ति इस्तेमाल होने वाले 150 लीटर से गुणा करें.'
बिना ट्रीट किए पानी झील-नदी में छोड़ा जा रहा
इससे आप समझ सकते हैं कि कम से कम 30 से 40% पानी बिना ट्रीट किए इन जल निकायों में चला जाता है. इस पानी में न्यूट्रिएंट लोड (पोषक तत्वों का भार) बहुत ज़्यादा है. इसमें फास्फोरस और सोडियम की मात्रा बहुत ज़्यादा है. इसी वजह से झील में जो हरियाली दिख रही है, वह इसलिए नजर आ रही है क्योंकि वहां शैवाल और लिली बहुत तेज़ी से बढ़ रहे हैं,
असल में पौधों को बढ़ने के लिए पोषक तत्वों की ज़रूरत होती है. जबकि उन्हें यहाां पर मुफ़्त में न्यूट्रिएंट्स मिल रहे हैं. अगर हम समय रहते कदम नहीं उठाते, तो क्या हम नेपाल या दूसरी जगहों जैसी तबाही देख सकते हैं? अगर समय रहते इलाज नहीं किया गया तो मुझे लगता है कि 5 साल बाद आप और मैं यहां खड़े नहीं हो पाएंगे, क्योंकि इस पानी की बदबू आपको टिकने नहीं देगी.
डल झील की सफ़ाई और सुरक्षा के लिए काम करने वाले वॉलंटियर्स ने भी चेतावनी दी है. उनका आरोप है कि बार-बार चेतावनी देने के बावजूद सरकार इन जल निकायों को बचाने के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठा रही है. दशकों की सरकारी लापरवाही के कारण प्रदूषण और अतिक्रमण ने झील को बर्बादी की कगार पर पहुंचा दिया है.
हजारों मछलियां बेमौत मरती जा रहीं
डल की सफ़ाई के लिए काम करने वाले वॉलंटियर तारिक अहमद पटलू ने कहा, 'मैं बार-बार यह मुद्दा उठाता हूं. अभी मैं सबसे बड़ा ज़िम्मेदार जम्मू-कश्मीर के UEED (अर्बन एनवायर्नमेंटल इंजीनियरिंग डिपार्टमेंट) को मानता हूं. UEED के सभी पंप स्टेशन बिना साफ़ किया हुआ पानी और सारा कचरा सीधे झील में डाल देते हैं. अगर हम बस एक काम करें कि उन पंप स्टेशनों को STP में बदल दें तो हम 80% जल निकाय को बचा सकते हैं. यही लोग, यही विभाग हमारे जल निकायों को बर्बाद कर रहे हैं. मैंने इस बारे में RTI भी दायर की है.'
तारिक अहमद पटलू ने आगे कहा, 'आप डलगेट के 80 पंप स्टेशनों को देखिए. वहां का वीडियो बनाइए और देखिए कि ज़ैनाकदाल या अंसारी मोटर्स के सामने कितना कचरा आता है. अगर आप नवाइयार, खानयार या ज़ोजिलांगर के पास जाएं तो देखेंगे कि वहां कितना कचरा है. यह इसलिए बर्बाद हुआ क्योंकि हमने सड़कें बनाईं. झील के अंदर हमें सड़कों या रास्तों की ज़रूरत नहीं है. वोट बैंक की राजनीति ने डल को बर्बाद कर दिया. एक तरफ नेशनल कॉन्फ़्रेंस ऐसा कर रही है, तो दूसरी तरफ़ PDP ने ऐसा किया है. आने वाले समय में हमें झील दिखेगी भी नहीं. अगर हम झील में जाएं तो देखेंगे कि कितनी मरी हुई मछलियां हैं.'
वॉलंटियर ने कहा, 'हज़ारों मछलियाँ मर रही हैं. कोई कहता है कि किसी ने इसमें दवा डाल दी है, कोई कुछ और कहता है. हर किसी की अपनी कहानी है. लेकिन मेरा कहना यह है कि हम सीवेज को कंट्रोल नहीं कर पाए और न ही यह विभाग इसके बारे में ज़्यादा कुछ कर सकता है. वे मोटरबोट पर जा सकते हैं, दूर से मुआयना कर सकते हैं, लेकिन वे झील के एक्सपर्ट नहीं हैं. इसके लिए हमें एक्सपर्ट्स की ज़रूरत है.'
'हमें प्रदूषण करने के लिए एक्सपर्टो की जरूरत'
हमें विदेशियों की ज़रूरत है. हमें ऐसे पढ़े-लिखे लोगों की ज़रूरत है जो यहाँ आकर पूरी ज़िम्मेदारी संभाल लें. जैसे नीदरलैंड या उन देशों में होता है जहाँ पानी के बड़े स्रोत हैं. वे उन एक्सपर्ट्स को यहाँ ला सकते हैं. मैं माननीय प्रधानमंत्री से अपील करना चाहता हूं. चूंकि उन्होंने 'मन की बात' में मेरे बारे में बात की थी, इसलिए कृपया इसे किसी प्राइवेट कंपनी, विदेशियों या भारत के बड़े एक्सपर्ट्स को सौंप दें. वरना, आने वाली पीढ़ियां हमारी डल झील को नहीं देख पाएंगी.
डल झील के पास रहने वाले आम लोगों के साथ-साथ पंप शेड और सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट के आस-पास रहने वालों ने भी अधिकारियों की लापरवाही के बारे में कड़ी शिकायतें की हैं. कई लोगों का कहना है कि बिना ट्रीट किया हुआ कचरा लगातार बह रहा है. वहां पर बदबू बनी हुई है और सुधार के जो वादे किए गए थे, वे अधूरे हैं.
डल झील के पास डाउनटाउन के ज़ोजिलंकर इलाके में रहने वाले मोहम्मद शफ़ी बाबा ने कहा, 'अब यह पानी कहां जाता है? सीधे डल झील में. सारी गंदगी और कचरा वहीं आता है. कभी-कभी, महीने में एक बार कोई अधिकारी इसे देखने आता है. रैनावाड़ी, हसलाबाद, पुज़मोहल्ला, कसाई मोहल्ला जैसे इलाकों का पानी वहीं जाता है, वे सब इसे यहीं लाते हैं. गायों का गोबर भी उसी में जाता है और फिर वे इसे फ़िल्टर करके हमें पीने के लिए देते हैं. हमने MLA से बहुत गुहार लगाई. साहब, इसे कौन करेगा? इसे साफ़ करने के लिए कौन सी मशीन है? मशीन वही है, वे इसे नदी के अंदर ही छोड़ देते हैं, बस इतना ही. कभी-कभी वे पानी को ट्रीटमेंट के लिए खानियार ले जाते हैं. बस इतना ही.'
'नालियों का कचरा पानी में बहा दिया जाता है'
इलाके के एक और निवासी बशीर अहमद ने कहा, 'इसकी सफाई नहीं होती, आखिर हो क्या रहा है? यह बेकार हो गया है. इसे वैसे ही छोड़ दिया जाता है जैसे हम नाली में कचरा फेंकते हैं. इसे फ़िल्टर नहीं किया जाता. वे इसे नदी में डाल देते हैं निगीन और शालीमार से आने वाला पानी भी उसी नदी में मिला दिया जाता है. एक समय था जब इसमें हाउस-बोट, बड़ी शिकारे और डोंगे चला करते थे. आज इसकी वजह से यह बेकार हो गया है. इसमें हमारी भी लापरवाही है और उनकी भी. ऐसा नहीं है कि उन्होंने इस पर पैसे खर्च नहीं किए, लेकिन सब बेकार गया.'
रैनावाड़ी का सारा पानी यहीं आता है और शालीमार व हज़रतबल में रहने वाले लोगों का पानी भी इसी में मिलता है. यह डल झील में जाता है, फिर निगीन झील में. इसमें सब कुछ गंदा हो रहा है. बिना सफाई के बस यही हाल है. आप खुद जाकर देख सकते हैं कि इसकी हालत क्या है. बस पैसे की बर्बादी हो रही है. आस-पास रहने वाले लोगों को ज़्यादा परेशानी होती है. इसमें कोई शक नहीं है. मच्छर पनपते हैं, बीमारियां होती हैं और गंदगी से बीमारियां फैलती हैं. सरकार को कदम उठाने चाहिए. लोगों को कुछ राहत और फायदा मिलना चाहिए.
मुखीमंत्री उमर अब्दुल्ला भी मानते हैं कि यह एक बड़ा संकट है और पिछले दो सालों से यह संकट ज़्यादा उभरा है और इसे रातोंरात ठीक नहीं किया जा सकता है और हम पूरी कोशिश कर रहे है कि अपनी वाटर बॉडीज़ को बचा लें.
'यह लेगेसी इश्यू, रातोंरात ठीक नहीं हो सकता'
उमर अब्दुल्ला ने कहा कि यह पिछले दो साल का बना हुआ मसला नहीं है. यह एक लेगेसी इशू है. रातों-रात इसको हम डील नहीं कर पाएंगे, लेकिन कर रहे हैं. प्रोजेक्ट बन रहे हैं, मुख्तलिफ स्कीमों के हवाले से चाहे वो सा स्कीम में हो, चाहे और स्कीमों में हो और कोशिश की जा रही है कि हम अपने वाटर बॉडीज जो हैं उनको न सिर्फ बचा पाएं, लेकिन उनको बढ़ा लें.
डल झील का आकार काफी कम हो गया है. कभी लगभग 24 वर्ग किलोमीटर में फैली यह झील अब सिमटकर लगभग 8 वर्ग किलोमीटर रह गई है. इसने अपने मूल विस्तार का दो-तिहाई हिस्सा खो दिया है. दोनों जल-क्षेत्रों की गहराई भी कम हो गई है. झील के पिछले हिस्से में कई जगहों पर गहराई अब सिर्फ़ 2 फ़ीट रह गई है, जबकि सामने का हिस्सा, जो कभी 24 फ़ीट गहरा हुआ करता था, अब लगभग 6 फ़ीट ही गहरा है.
शोधकर्ताओं ने इस गिरावट का कारण मानवीय गतिविधियों और बिना साफ़ किए छोड़े गए गंदे पानी वेस्ट-वॉटर से होने वाले प्रदूषण को बताया है. अध्ययन में कहा गया है कि पोषक तत्वों (न्यूट्रिएंट्स) की अत्यधिक मात्रा शैवाल (एल्गी) के विकास को बढ़ावा दे सकती है. यह पानी की गुणवत्ता कम कर सकती है और जलीय पारिस्थितिकी तंत्र (एक्वेटिक इकोसिस्टम) के प्राकृतिक संतुलन को बिगाड़ सकती है.
तुरंत कदम नहीं उठाए तो खत्म हो जाएंगे जलीय स्रोत
कश्मीर यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों की पिछली रिसर्च में श्रीनगर से होकर झेलम नदी में शहरी कचरा ले जाने वाले कई नालों की पहचान की गई थी और नदी के पानी की क्वालिटी के कई पैमानों में गिरावट दर्ज की गई थी. एक्सपर्ट्स ने गंभीर चेतावनी दी है कि अगर अभी ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो कश्मीर की जीवनरेखा माने जाने वाले डल झील और झेलम नदी का अस्तित्व खत्म हो सकता है.
सरकार ने इंफ्रास्ट्रक्चर की कमी को दूर करने के लिए कई सीवेज ट्रीटमेंट और प्रदूषण नियंत्रण प्रोजेक्ट शुरू किए हैं. लेकिन एक्सपर्ट्स, वॉलंटियर्स और स्थानीय लोगों का कहना है कि सिर्फ़ ट्रीटमेंट प्लांट से समस्या हल नहीं हो सकती. इसके लिए घरों को ठीक से काम करने वाले सीवर नेटवर्क से जोड़ना और बिना ट्रीट किए गए नालों और आउटफ़ॉल को रोकना ज़रूरी है. इसलिए चुनौती सिर्फ़ ट्रीटमेंट क्षमता बढ़ाने की नहीं है, बल्कि यह पक्का करने की है कि सीवेज नदी या झील तक पहुंचे ही नहीं.