ओवैसी हर चुनाव में हाथ फैलाकर खड़े रहते हैं, राजनीति में विपक्ष के लिए अछूत क्यों?
असदुद्दीन ओवैसी यूपी में विपक्षी गठबंधन में शामिल होने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन कांग्रेस और समाजवादी पार्टी इसके लिए तैयार नहीं हैं. ओवैसी का दावा है कि AIMIM के बिना बीजेपी को हराना मुश्किल होगा. वहीं विपक्षी दलों के अपने राजनीतिक समीकरण और वोटबैंक को लेकर चिंताएं हैं.
अपनी मजहबी तकरीरों और कट्टर भड़काऊ बयानों के लिए विख्यात असदुद्दीन ओवैसी आज फिर चर्चा में हैं, लेकिन आज उनकी चर्चा इसलिए हो रही है क्योंकि उनका सियासी फ्रेंड रिक्वेस्ट एक बार फिर से रिजेक्ट हो गया है. वो उत्तर प्रदेश में एंटी बीजेपी गठबंधन में शामिल होने के लिए बेचैन हैं, लेकिन कांग्रेस या समाजवादी पार्टी, दोनों में से कोई उन्हें पूछ ही नहीं रहा है. असदुद्दीन ओवैसी ने कहा है कि अगर बीजेपी को हैट्रिक से रोकना है तो AIMIM को गठबंधन में शामिल करना होगा. असदुद्दीन ओवैसी हाथ फैलाकर खड़े हैं, लेकिन इंडिया अलायंस की ओर से एक बार फिर वही जवाब आया है, जो पहले आता रहा है. यानी ओवैसी बार-बार फ्रेंड रिक्वेस्ट भेजते हैं और विपक्षी पार्टियां रिजेक्ट कर देती हैं. सवाल है, जो कांग्रेस केरल में मुस्लिम लीग के साथ सरकार में है, वो ओवैसी की पार्टी को अछूत क्यों मानती है?
ओवैसी यूपी में अपनी पार्टी और राजनीति का विस्तार करना चाहते हैं. चुनाव की आहट से पहले ही उन्होंने अपने वोटबैंक को साधना शुरू कर दिया है. इसी सिलसिले में वो कानपुर पहुंचे थे. वहां बगाही ईदगाह मैदान में एक रैली को संबोधित करते हुए कांग्रेस और समाजवादी पार्टी के सामने अपनी झोली फैला दी. उन्होंने कहा कि गठबंधन में AIMIM को शामिल किए बगैर योगी आदित्यनाथ को हराना संभव नहीं है. ओवैसी ने गठबंधन के लिए इंडी अलायंस को बाकायदा 2 अक्टूबर तक की डेडलाइन भी दी है. एंटी बीजेपी अलायंस में शामिल होने के लिए ओवैसी ने सार्वजनिक मंच से अपनी इच्छा जाहिर की है.
पिछले एक हफ्ते में ये दूसरी बार है, जब ओवैसी ने यूपी में गठबंधन को लेकर ये ऑफर दिया है. इससे पहले भोपाल में बैठकर उन्होंने यही ऑफर दिया था, लेकिन कोई उन्हें स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं है. ऐसा पहली बार नहीं है, जब उन्होंने आगे बढ़कर सार्वजनिक मंचों से ये इच्छा जताई हो कि वो एंटी बीजेपी गठबंधन में शामिल होने के लिए तैयार हैं.
इसी उत्तर प्रदेश में जब 2022 में चुनाव हुआ था, तब भी ओवैसी ने ऐसा ही ऑफर दिया था, लेकिन तब अखिलेश यादव और मायावती, दोनों ने ओवैसी के साथ मंच साझा करने से इनकार कर दिया था. नतीजा ये हुआ कि पश्चिमी यूपी और रूहेलखंड में करीब एक दर्जन सीटों पर ओवैसी की पार्टी को हार-जीत के अंतर से ज्यादा वोट मिले.
बिहार में 2020 और 2025, दोनों विधानसभा चुनाव में भी ओवैसी एंटी बीजेपी अलायंस में शामिल होने के लिए बेकरार थे. उन्होंने आरजेडी को खुला ऑफर दिया, यहां तक कि चिट्ठी लिखकर सिर्फ 6 सीटों की मांग की, लेकिन आरजेडी ने कोई तवज्जो नहीं दी. वहां पर सीमांचल में ओवैसी की पार्टी ने 5 सीटें जीत लीं. ये सीधा नुकसान आरजेडी को हुआ था.
इसी तरह महाराष्ट्र में भी 2019 और 2024 के चुनाव में गठबंधन में शामिल करने के लिए कहा था. कांग्रेस और उद्धव ठाकरे की शिवसेना ने ओवैसी को साथी बनाने से इनकार कर दिया और नतीजा ये हुआ कि छत्रपति संभाजीनगर, धुले और मराठवाड़ा-विदर्भ की कई मुस्लिम बहुल सीटों पर वोटों का बिखराव हुआ. महाविकास अघाड़ी के कई कैंडिडेट हार गए.
इस बार फिर ओवैसी आगे बढ़कर हाथ फैलाकर अलायंस में शामिल होने के लिए कह रहे हैं, लेकिन इंडी अलायंस में शामिल पार्टियों ने साफ इनकार कर दिया है. कांग्रेस और समाजवादी पार्टी ने स्पष्ट कहा कि उत्तर प्रदेश में जो पहले से गठबंधन है वही रहेगा. इसके पीछे उनका तर्क भी सामने आया है. एंटी बीजेपी पार्टी अगर ओवैसी को अपना साथी बनाने के लिए तैयार नहीं हैं तो इसके पीछे उनका कुछ तर्क है.
तर्क है कि ओवैसी के साथ औपचारिक मंच साझा करने से बीजेपी को 'तुष्टिकरण' का नैरेटिव बनाने का सीधा मौका मिलेगा. इससे गैर-यादव OBC, दलित या सवर्ण मतदाता, जो स्थानीय मुद्दों पर विपक्ष को वोट दे सकते थे, वे पूरी तरह बीजेपी के पाले में लामबंद हो सकते हैं.
लेकिन ये सिर्फ कट्टर एजेंडा या फिर बहुसंख्यक ध्रुवीकरण का मामला नहीं है. दरअसल, असली मामला ये है कि चाहे कांग्रेस हो या फिर उसके सहयोगी क्षेत्रीय पार्टियां, इनका वोटबैंक मुसलमान हैं. इन्हें डर है कि अगर ओवैसी उनके साथ आ गए तो ओवैसी को मुस्लिम वोटरों के बीच पैठ बनाने में मजबूती होगी. विपक्ष कभी नहीं चाहता कि उसके पारंपरिक वोट बैंक के भीतर एक समानांतर और स्वतंत्र मुस्लिम राजनीतिक नेतृत्व खड़ा हो.
विपक्ष के अंदर विचारों के आधार पर इस बिखराव को लेकर बीजेपी का कहना है कि कोई भी मिल जाए, कोई भी हैट्रिक लगाने से रोक नहीं पाएंगे. विपक्ष में वोट के बंटवारे से सबसे ज्यादा फायदा बीजेपी को हो रहा है. इसलिए वो नश्तर चला रहे हैं. राजनीति में हर किसी का अपना स्वार्थ होता है और उसी स्वार्थ के हिसाब से जोड़-घटाव की सियासत होती है. ओवैसी भी वही कर रहे हैं और दूसरी विपक्षी पार्टियां भी वही कर रही हैं.