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पंजाब में नशे के खिलाफ एक बार फिर राजनीति सड़क पर है. बीजेपी 18 सितंबर से 'नशा मुक्त पंजाब यात्रा' निकाल रही है. चार दिशाओं से शुरू हुई यह यात्रा 30 सितंबर तक करीब 4,000 किलोमीटर की दूरी तय कर राज्य की सभी 117 विधानसभा सीटों तक पहुंचने का दावा कर रही है. बीजेपी इसे नशे के खिलाफ जन-जागरण बता रही है.
दूसरी तरफ कांग्रेस भी आम आदमी पार्टी सरकार को घेर रही है और नशे के मुद्दे पर जवाब मांग रही है. सत्तारूढ़ आम आदमी पार्टी का तर्क है कि उसने पिछले अभियानों के मुकाबले कार्रवाई, उपचार और रोकथाम तीनों मोर्चों पर काम तेज किया है.
यानी चुनाव से पहले पंजाब में नशा फिर बड़ा राजनीतिक मुद्दा बन चुका है. लेकिन राजनीति के इस शोर के बीच एक सवाल बिल्कुल शांत खड़ा है कि पिछले दस सालों में पंजाब ने नशे के खिलाफ आखिर हासिल क्या किया?
क्योंकि सरकारें बदलीं, सीएम बदले, घोषणाएं बदलीं, अभियान बदले लेकिन नशे के खिलाफ लड़ाई समाप्त नहीं हुई और यही आज पंजाब की सबसे बड़ी चिंता है.
नशे की समस्या का आकलन केवल इस आधार पर नहीं किया जा सकता कि कितने लोग पकड़े गए या कितने किलो नशीला पदार्थ बरामद हुआ.
फिर भी नारकोटिक ड्रग्स एंड साइकोट्रॉपिक सब्सटेंस कानून के तहत दर्ज मामले इस संकट की व्यापकता का एक महत्वपूर्ण संकेत देते हैं.
NCRB आंकड़ों के मुताबिक, पंजाब में इस कानून के तहत दर्ज मामलों की संख्या 2016 में 5,906 थी. 2017 में यह बढ़कर 12,356 हो गई. 2018 में 11,654, 2019 में 11,536 और 2020 में 6,909 मामले दर्ज हुए.
2021 में मामले फिर बढ़कर 9,972 और 2022 में 12,423 हो गए. 2023 में 11,564 और 2024 में 9,025 मामले दर्ज हुए.

यानी 2016 से 2024 के बीच आंकड़ों में उतार-चढ़ाव जरूर आया लेकिन ये कहना मुश्किल है कि नशे की समस्या किसी स्थायी गिरावट के दौर में पहुंच गई है.
2024 में पंजाब में इस कानून के तहत प्रति लाख आबादी पर करीब 29 मामले दर्ज हुए. यह राष्ट्रीय औसत से कई गुना ज्यादा था. राष्ट्रीय दर करीब 7.8 थी.
यहां एक महत्वपूर्ण बात समझनी होगी. मामलों की संख्या बढ़ना हमेशा नशा बढ़ने का प्रमाण नहीं होता. पुलिस की सक्रियता बढ़ने पर भी प्राथमिकी बढ़ सकती हैं. इसी तरह मामलों की संख्या घटने का अर्थ यह भी नहीं कि नशा घट गया.
असली तस्वीर के लिए गिरफ्तारी, बरामदगी, इलाज, दोबारा नशे की गिरफ्त में आने वालों और मौत इन सभी आंकड़ों को एक साथ देखना होगा. इसमें मौत का आंकड़ा बेहद गंभीर है.
राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के अनुसार पंजाब में नशे की अधिक मात्रा लेने से 2021 में 78, 2022 में 144 और 2023 में 89 मौतें दर्ज हुईं.
2024 में यह संख्या बढ़कर 106 हो गई. 2024 में पंजाब इस मामले में देश में दूसरे स्थान पर था लेकिन यहां भी आंकड़े पूरी कहानी नहीं बताते.
पंजाब पुलिस की ओर से अलग अवधि के लिए अदालत में पेश आंकड़ों में नशे की अधिक मात्रा से हुई मौतों की संख्या अलग दिखाई देती है. विशेषज्ञों और अधिकारियों ने कई बार यह भी संकेत दिया है कि ऐसी मौतें पूरी तरह दर्ज नहीं हो पातीं.

इसका मतलब साफ है कि पंजाब को नशे से होने वाली मौतों का एक भरोसेमंद, नियमित और सार्वजनिक आंकड़ा तंत्र चाहिए.
कितने लोग नशे के कारण मर रहे हैं, कितने अस्पताल पहुंच रहे हैं, कितने इलाज के बाद वापस नशे में जा रहे हैं, जब तक इन सवालों के जवाब नियमित रूप से नहीं मिलेंगे, तब तक किसी भी सरकार की सफलता का सही आकलन मुश्किल रहेगा.
पंजाब में नशा आज का संकट नहीं है. 2017 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने नशे को बड़े चुनावी मुद्दे के रूप में उठाया था. तत्कालीन कांग्रेस नेता कैप्टन अमरिंदर सिंह ने सरकार बनने के बाद नशे को खत्म करने का वादा किया और विशेष कार्यबल बनाया गया. लेकिन नशा खत्म नहीं हुआ.
2022 में आम आदमी पार्टी सत्ता में आई. नशे के खिलाफ सख्त कार्रवाई का वादा किया गया। सरकार ने पुलिस कार्रवाई के साथ इलाज और पुनर्वास को जोड़ने की कोशिश की. लेकिन नशा खत्म नहीं हुआ.
अब 2026 में भाजपा यात्रा निकाल रही है और दो साल में पंजाब को नशा मुक्त करने का वादा कर रही है.
यही पंजाब के मतदाता के सामने सबसे बड़ा सवाल है कि क्या नशे के खिलाफ हर चुनाव में एक नया वादा जरूरी है या एक ऐसी दीर्घकालिक नीति चाहिए जो सरकार बदलने के बाद भी जारी रहे?
भगवंत मान सरकार ने मार्च 2025 में 'युद्ध नशेयां विरुद्ध' अभियान शुरू किया. सरकार का कहना है कि इसका उद्देश्य केवल नशा बेचने वालों को पकड़ना नहीं बल्कि नशे के आदी लोगों को इलाज तक पहुंचाना भी है.
पंजाब स्वास्थ्य विभाग के आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार 2024 में राज्य के सरकारी नशामुक्ति केंद्रों में 9,577 लोगों ने इलाज लिया. 2025 में यह संख्या बढ़कर 25,290 हो गई यानी 164 प्रतिशत से ज्यादा की वृद्धि दर्ज की गई. इस साल जुलाई 2026 तक 14,000 से अधिक लोग सरकारी नशामुक्ति केंद्रों में पहुंच चुके थे.

यह आंकड़ा दो तरह से पढ़ा जा सकता है. सरकार कह सकती है कि ज्यादा लोग इलाज के लिए सामने आ रहे हैं इसलिए व्यवस्था की पहुंच बढ़ी है.
विपक्ष पूछ सकता है कि अगर इलाज लेने वालों की संख्या इतनी तेजी से बढ़ रही है तो क्या इसका अर्थ यह नहीं कि नशे की समस्या अब भी बहुत बड़ी है?
सच यह है कि अकेले भर्ती होने वालों की संख्या इन दोनों सवालों का जवाब नहीं देती.
असली आंकड़ा यह होगा कि 25,290 में से कितने लोग इलाज पूरा करके सामान्य जीवन में लौटे? छह महीने बाद कितने नशे से दूर रहे? एक साल बाद कितने फिर नशे की गिरफ्त में गए? कितनों को रोजगार मिला?
जब तक यह जानकारी सार्वजनिक नहीं होती तब तक '25 हजार इलाज' एक संख्या भर है.
पंजाब ने पिछले सालों में नशामुक्ति के लिए अपना ढांचा काफी बढ़ाया है. राज्य में बाह्य रोगी आधारित अफीम उपचार केंद्रों का बड़ा नेटवर्क है. सरकारी व्यवस्था में नशामुक्ति और पुनर्वास केंद्र भी चलाए जा रहे हैं.
पंजाब के स्वास्थ्य विभाग की व्यवस्था में बाह्य रोगी उपचार केंद्रों की सूची और निजी केंद्रों के लिए दिशा-निर्देश भी उपलब्ध हैं. नशे के आदी व्यक्ति के लिए यह व्यवस्था इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि हर नशेड़ी तस्कर नहीं होता.
नशा बेचने वाले और नशे के शिकार व्यक्ति के साथ एक जैसा व्यवहार समस्या को हल नहीं करेगा. तस्कर के खिलाफ कठोर कार्रवाई जरूरी है लेकिन नशे की गिरफ्त में आए युवक के लिए इलाज, परामर्श, परिवार का सहयोग और रोजगार भी उतना ही जरूरी है.
नशा छोड़ने के बाद व्यक्ति घर लौटता है. वही दोस्त, वही बेरोजगारी, वही तनाव और कई बार वही माहौल उसका इंतजार कर रहा होता है.
यदि उसके पास काम नहीं है, परिवार का सहयोग नहीं है और नियमित परामर्श नहीं है तो दोबारा नशे में लौटने का खतरा बना रहता है. इसलिए नशामुक्ति केंद्र बनाना पर्याप्त नहीं है. नशामुक्त जीवन की व्यवस्था बनानी होगी.
बीजेपी की 'नशा मुक्त पंजाब यात्रा' ने एक बार फिर इस मुद्दे को राज्य की राजनीति के केंद्र में ला दिया है. पार्टी का आरोप है कि आम आदमी पार्टी सरकार नशे पर लगाम लगाने में विफल रही है. बीजेपी का कहना है कि सत्ता में आने पर वह नशे के खिलाफ और कठोर कार्रवाई करेगी.
आम आदमी पार्टी इसका जवाब देते हुए बीजेपी से उसके पिछले शासनकाल का हिसाब मांग रही है. मुख्यमंत्री भगवंत मान ने 2007 से 2017 के अकाली दल-बीजेपी शासन का संदर्भ देते हुए पूछा है कि उस दौर में नशे की समस्या क्यों खत्म नहीं हुई.
हाल की बहस में आम आदमी पार्टी की ओर से गुजरात के मुंद्रा बंदरगाह का भी मुद्दा उठाया गया है. अरविंद केजरीवाल ने कहा कि नशे के खिलाफ लड़ाई केवल पंजाब में नहीं, देश के प्रवेश बिंदुओं और बड़े तस्करी नेटवर्क पर भी होनी चाहिए.
यह तर्क अपने आप में एक जरूरी नीति प्रश्न उठाता है. नशे की लड़ाई केवल उस राज्य में क्यों लड़ी जाए जहां नशा पहुंच रहा है? उस रास्ते को क्यों न रोका जाए जहां से नशा देश में प्रवेश करता है?
इसका दूसरा पहलू भी उतना ही महत्वपूर्ण है. सीमा पार से आने वाला नशा समस्या का एक हिस्सा हो सकता है; स्थानीय वितरण व्यवस्था और स्थानीय मांग खत्म किए बिना केवल सीमा पर रोक भी पर्याप्त नहीं होगी.
यानी पंजाब को एक साथ सीमा, तस्करी नेटवर्क, स्थानीय बिक्री और नशे की मांग चारों मोर्चों पर लड़ना होगा.
कांग्रेस भी आज आम आदमी पार्टी से जवाब मांग रही है लेकिन पंजाब में कांग्रेस लंबे समय तक सत्ता में रही है और 2017 में नशे के खिलाफ कार्रवाई का वादा भी कर चुकी है. इसलिए पंजाब की जनता के सामने यह सवाल केवल वर्तमान सरकार का नहीं है.
अगर पिछले दस सालों में अलग-अलग सरकारों के प्रयासों के बावजूद संकट बना हुआ है तो समस्या किसी एक सरकार से बड़ी है.
यही कारण है कि नशे के मुद्दे को केवल चुनावी आरोप-प्रत्यारोप में सीमित करना पंजाब के साथ न्याय नहीं होगा. पंजाब को अब 'नशा खत्म करेंगे' जैसे नारों से आगे जाना होगा.
बीजेपी की यात्रा 30 सितंबर को खत्म हो जाएगी. आम आदमी पार्टी का अभियान भी एक दिन समाप्त घोषित हो सकता है. कांग्रेस अगली सरकार बनने पर अपनी योजना बताएगी लेकिन नशे से जूझ रहे परिवारों की जिंदगी में कोई अभियान समाप्त नहीं होता.
पंजाब के लिए असली सफलता तब होगी जब नशे के आंकड़े नहीं, नशे से बचाए गए परिवारों की संख्या बढ़े. क्योंकि सवाल यह नहीं है कि किस पार्टी ने कितनी बड़ी यात्रा निकाली.
सवाल यह है कि पंजाब का अगला दस साल भी नशे के खिलाफ वादों में जाएगा या इस बार कोई ऐसी व्यवस्था बनेगी जिसका असर आंकड़ों में भी दिखे और घरों में भी?