न बची नौकरी की तलाश, न शहर जाने की मजबूरी! SHG ने बदली पहाड़ की बेटियों की जिंदगी
हिमाचल की ग्रामीण महिलाएं स्वयं सहायता समूहों के जरिए स्थानीय उत्पाद, खेती, हस्तशिल्प और छोटे कारोबार को नया बाजार दे रही हैं. जानिए कैसे SHG उनके लिए रोजगार और आत्मनिर्भरता का जरिया बन रहे हैं.
हिमाचल के गांवों में स्वयं सहायता समूह यानी एसएचजी अब केवल बचत और छोटे कर्ज तक सीमित नहीं रह गए हैं. महिलाएं समूह बनाकर खेती, खाद्य उत्पाद, हस्तशिल्प, स्थानीय सामान और छोटे कारोबार से जुड़ रही हैं. हिमाचल प्रदेश में दीनदयाल अंत्योदय योजना-राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (DAY-NRLM) को हिमाचल प्रदेश राज्य ग्रामीण आजीविका मिशन (HPSRLM) के जरिए 91 ब्लॉकों में लागू किया जा रहा है. राज्य के आर्थिक सर्वेक्षण के मुताबिक, यह मिशन ग्रामीण गरीब परिवारों को महिलाओं के जरिए स्वयं सहायता समूहों से जोड़कर टिकाऊ आजीविका से जोड़ने पर केंद्रित है.
महिला आर्थिक सशक्तिकरण का एक बड़ा संकेत लखपति दीदी पहल है. केंद्र सरकार के दिसंबर 2024 के आंकड़ों के अनुसार हिमाचल प्रदेश में 40,417 महिलाएं लखपति दीदी के रूप में दर्ज थीं. इस पहल का लक्ष्य स्वयं सहायता समूह से जुड़ी महिलाओं को टिकाऊ तरीके से कम से कम 1 लाख रुपये सालाना आय हासिल करने में सक्षम बनाना है.
हिमाचल में स्वयं सहायता समूहों को कितना सहारा मिल रहा है?
राज्य सरकार ने 2026-27 के बजट में हिमाचल प्रदेश राज्य ग्रामीण आजीविका मिशन के जरिए 3,000 स्वयं सहायता समूहों को 4.50 करोड़ रुपये का चक्रीय कोष और 15 करोड़ रुपये का सामुदायिक निवेश कोष देने का प्रावधान किया है. इसके अलावा 8,000 महिला स्वयं सहायता समूहों को आजीविका सुधारने के लिए 150 करोड़ रुपये का ऋण 7 प्रतिशत ब्याज दर पर उपलब्ध कराने की योजना रखी गई है.
महिलाएं कौन-से काम कर रही हैं?
स्वयं सहायता समूह से जुड़ी महिलाओं के लिए स्थानीय संसाधन ही कारोबार की ताकत बन रहे हैं. खाद्य पदार्थ, अचार, मसाले, शहद, हस्तशिल्प, ऊनी सामान, कृषि उत्पाद और पारंपरिक चीजों को बाजार तक पहुंचाने की कोशिश हो रही है. जनवरी 2026 में हमीरपुर प्रशासन ने स्वयं सहायता समूह के उत्पादों को ऑनलाइन मंच तक पहुंचाने पर जोर दिया था. वहां कुछ समूहों ने अमेजन पर अपने उत्पाद शुरू किए, जबकि एक ब्लॉक में महिलाओं ने पारंपरिक भोजन बेचने के लिए खाद्य वाहन भी शुरू किया.
क्या ऑनलाइन बाजार बदल रहा है तस्वीर?
अब गांव की महिला का बाजार सिर्फ स्थानीय मेले या आसपास के दुकानदार तक सीमित नहीं है. केंद्र सरकार के अनुसार ई-सारस के जरिए स्वयं सहायता समूह के उत्पादों को डिजिटल बाजार तक पहुंचाया जा रहा है. जुलाई 2026 तक इस मंच पर 8.99 करोड़ से ज्यादा स्वयं सहायता समूह सदस्यों और 1,400 से अधिक उत्पादों का उल्लेख किया गया. इसमें खाद्य पदार्थों से लेकर शहद, हस्तशिल्प और ऊनी उत्पाद शामिल हैं.
क्या स्वयं सहायता समूह से गांव में रोजगार बढ़ रहा है?
स्वयं सहायता समूह मॉडल का असर सिर्फ उस महिला तक सीमित नहीं रहता जो उत्पाद बेचती है. अगर किसी समूह को ऑर्डर बढ़ते हैं तो पैकिंग, कच्चे माल, परिवहन, खेती, पशुपालन और बिक्री जैसे कामों में भी स्थानीय स्तर पर अवसर बन सकते हैं. हालांकि हर स्वयं सहायता समूह की कमाई और सफलता एक जैसी नहीं होती. बाजार, उत्पाद की गुणवत्ता, प्रशिक्षण, पूंजी और नियमित बिक्री इसकी सफलता तय करने वाले महत्वपूर्ण कारक हैं.
क्या पहाड़ की महिलाएं नया मॉडल बना रही हैं?
हिमाचल की कहानी बताती है कि महिला स्वयं सहायता समूह गांवों की अर्थव्यवस्था में नई भूमिका निभा सकते हैं. यहां चुनौती केवल महिलाओं को समूह से जोड़ने की नहीं, बल्कि उत्पाद को बाजार, ब्रांडिंग, पैकेजिंग, डिजिटल बिक्री और लगातार आय से जोड़ने की है. अगर ये कड़ियां मजबूत होती हैं तो स्वयं सहायता समूह केवल बचत का समूह नहीं रहेंगे, बल्कि पहाड़ की महिलाओं के लिए स्थानीय रोजगार और उद्यमिता का स्थायी आधार बन सकते हैं.