हिमाचल प्रदेश की वित्तीय स्थिति को लेकर भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) की 2024-25 की रिपोर्ट ने गंभीर सवाल खड़े किए हैं. मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू द्वारा विधानसभा में पेश की गई रिपोर्ट में राज्य के बढ़ते कर्ज, राजकोषीय घाटे और विकास कार्यों के लिए सीमित वित्तीय संसाधनों पर चिंता जताई गई है. रिपोर्ट के अनुसार, राज्य का राजकोषीय घाटा निर्धारित सीमा से ऊपर पहुंच गया है.
CAG रिपोर्ट के मुताबिक, वित्त वर्ष 2024-25 में हिमाचल प्रदेश का राजस्व घाटा 6,804.61 करोड़ रुपये रहा. वहीं राजकोषीय घाटा 12,611.05 करोड़ रुपये तक पहुंच गया, जो राज्य के सकल राज्य घरेलू उत्पाद यानी GSDP का 5.44 प्रतिशत है. रिपोर्ट में कहा गया है कि राज्य सरकार राजकोषीय उत्तरदायित्व एवं बजट प्रबंधन यानी FRBM कानून के तहत तय लक्ष्यों के भीतर इन घाटों को नियंत्रित नहीं कर सकी.
क्या कर्ज का बोझ भी बढ़ा है?
ऑडिट रिपोर्ट में राज्य की बकाया देनदारियों को लेकर भी चिंता जाहिर की गई है. CAG के अनुसार, राज्य की देनदारियां 15वें वित्त आयोग और राज्य के अपने बजट अनुमानों में तय लक्ष्यों से काफी अधिक रहीं. बढ़ती देनदारियों का असर भविष्य में उपलब्ध वित्तीय संसाधनों और विकास कार्यों पर पड़ सकता है.
राजस्व का 86 प्रतिशत कहां जा रहा है?
रिपोर्ट की सबसे अहम बात यह है कि राज्य की कुल राजस्व प्राप्तियों का करीब 86 प्रतिशत हिस्सा प्रतिबद्ध व्यय और सब्सिडी में खर्च हो रहा है. इसके कारण बुनियादी ढांचे और पूंजीगत निवेश के लिए सीमित संसाधन बच रहे हैं. CAG ने बताया कि अकेले वेतन, पेंशन और ग्रेच्युटी पर राजस्व व्यय का लगभग 70 प्रतिशत खर्च हो रहा है.
बिजली सब्सिडी से कितना दबाव बढ़ रहा है?
CAG ने बिजली सब्सिडी और ऋण राहत जैसे उपायों पर बढ़ते खर्च को भी वित्तीय दबाव का कारण बताया है. ऐसी प्रतिबद्ध देनदारियां राज्य के उपलब्ध राजस्व पर अतिरिक्त बोझ डालती हैं. रिपोर्ट के अनुसार, विकासात्मक गतिविधियों और पूंजीगत व्यय के लिए केवल करीब 14 प्रतिशत राजस्व संसाधन बचते हैं, जिससे लंबे समय के बुनियादी ढांचा निवेश की गुंजाइश सीमित होती है.
अर्थव्यवस्था बढ़ी, फिर चिंता क्यों?
रिपोर्ट के अनुसार हिमाचल प्रदेश की अर्थव्यवस्था ने 2024-25 में 9.20 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की. इसके बावजूद भारत के कुल GDP में राज्य का योगदान केवल 0.70 प्रतिशत रहा और पिछले पांच वर्षों में इसमें गिरावट दर्ज की गई. CAG ने इसे चिंता का विषय माना है.
क्या राजस्व संग्रह में सुधार हुआ?
राज्य की राजस्व प्राप्तियों में 4.34 प्रतिशत की वृद्धि हुई. इसमें GST संग्रह और केंद्रीय करों में राज्य की हिस्सेदारी का योगदान रहा. गैर-कर राजस्व में भी 22.40 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई. हालांकि, इन सुधारों के बावजूद राज्य अभी भी केंद्र से मिलने वाले अनुदानों पर काफी निर्भर है.
सरकारी फंड के प्रबंधन पर क्या सवाल उठे?
CAG ने सरकारी निधियों के प्रबंधन से जुड़ी कुछ अनियमितताओं को भी उजागर किया. रिपोर्ट में कहा गया कि मिल्क सेस, एनवायरनमेंट सेस और बिल्डिंग एंड अदर कंस्ट्रक्शन वर्कर्स वेलफेयर सेस जैसे लेवी से जुटाई गई धनराशि सरकारी खाते से बाहर रखी गई थी. ऐसे मामलों में वित्तीय पारदर्शिता और फंड प्रबंधन की प्रक्रिया पर सवाल उठते हैं.
कुल मिलाकर, CAG की रिपोर्ट हिमाचल प्रदेश के सामने मौजूद वित्तीय चुनौतियों की ओर संकेत करती है. आर्थिक वृद्धि और राजस्व संग्रह में सुधार के बावजूद उच्च राजकोषीय घाटा, प्रतिबद्ध खर्च, सब्सिडी और बढ़ती देनदारियां राज्य के विकास एवं पूंजीगत निवेश की क्षमता को प्रभावित कर रही हैं.