अब बैंक में अंगूठा नहीं, साइन करती हूं... पानीपत के चेतना स्कूल में बुजुर्ग महिलाओं ने थामी कलम; बदल रही जिंदगी
पानीपत के चेतना स्कूल में 50 से 70 साल तक की महिलाएं अपने अधूरे पढ़ाई के सपने को पूरा कर रही हैं. 2013 में शुरू हुए इस स्कूल में अब तक 100 से अधिक महिलाएं पढ़ना-लिखना सीख चुकी हैं. कभी बैंक में अंगूठा लगाने वाली रामप्यारी अब हस्ताक्षर करती हैं, वहीं मजदूरी करने वाली महिलाएं हिसाब-किताब और जरूरी चीजें पढ़ना सीख रही हैं.
Panipat News: कहते हैं कि पढ़ने की कोई उम्र नहीं होती. पढ़ाई सिर्फ अक्षर का ज्ञान नहीं देती, बल्कि इंसान को अपने अधिकारों और आत्मसम्मान के साथ जीना भी सिखाती है. पानीपत के भारत नगर में एक छोटा-सा स्कूल इसी सोच को साकार कर रहा है. यहां कभी छोटी-छोटी बच्चियां पढ़ने आती थीं, लेकिन आज उसी स्कूल में 50 से 70 वर्ष तक की महिलाएं अपने जीवन के उस अधूरे सपने को पूरा कर रही हैं, जिसे गरीबी और परिस्थितियों ने कभी पूरा नहीं होने दिया.
भारत नगर की एक छोटी-सी जगह पर 13 जुलाई 2013 को चेतना स्कूल की शुरुआत हुई थी. शुरुआत में महज करीब 20 महिलाएं यहां पढ़ने आती थीं. इनमें अधिकांश ऐसी महिलाएं थीं, जो दिनभर मजदूरी करने के बाद शाम को स्कूल पहुंचती थीं. धीरे-धीरे इनके उत्साह को देखकर दूसरी महिलाएं भी जुड़ती गईं. आज तकरीबन 100 से अधिक महिलाएं यहां पढ़ना-लिखना सीख चुकी हैं.
कभी बैंक में अंगूठा लगाने वाली ये महिलाएं अब अपने हस्ताक्षर करती हैं. बस और ट्रेन के टिकट पढ़ लेती हैं और सबसे बड़ी बात अपनी मजदूरी और घर के खर्च का हिसाब-किताब खुद रखने लगी हैं.
70 साल की रामप्यारी ने कहा- अब बैंक में अंगूठा नहीं, साइन करती हूं
70 वर्षीय रामप्यारी के चेहरे पर पढ़ाई सीखने की खुशी साफ दिखाई देती है. जब उनसे पूछा गया कि इस उम्र में पढ़ने में कैसा लगता है तो उनका सीधा जवाब था- 'अच्छा लगता है.'
रामप्यारी बताती हैं कि पहले उन्हें अपना नाम तक लिखना नहीं आता था. बैंक में जाना होता तो अंगूठा लगाना पड़ता था. अब वह बैंक में अपने हस्ताक्षर कर लेती हैं. पुलिस या दूसरे जरूरी काम में भी साइन कर लेती हैं. इतना ही नहीं, अब उन्हें गिनती भी आती है. बातचीत के दौरान उन्होंने 1 से 30 तक गिनती सुनाकर अपनी सीखने की ललक का उदाहरण भी दिया.
50 साल की गुरमीत कौर ने पांच साल में बदली अपनी पहचान
गुरमीत कौर पिछले पांच साल से चेतना स्कूल में पढ़ रही हैं. करीब 50 वर्षीय गुरमीत कहती हैं कि पहले उन्हें कुछ भी नहीं आता था और हर जगह अंगूठा लगाना पड़ता था. अब वह पढ़ भी लेती हैं और अपने हस्ताक्षर भी कर लेती हैं.
उनका कहना है कि पहले बस या ट्रेन से कहीं जाना होता था तो काफी दिक्कत होती थी, लेकिन अब वह रास्ते और जरूरी चीजें समझने लगी हैं. गुरमीत अपनी कॉपी खोलकर पढ़कर दिखाते हुए कहती हैं कि 'पढ़ना बहुत अच्छा लगता है.'
सास ने बहू को नहीं, बहू ने सास को पढ़ने के लिए प्रेरित किया
चेतना स्कूल की सबसे खूबसूरत तस्वीर यह है कि यहां कई जगह सास और बहू एक साथ पढ़ने आती हैं. 32 वर्षीय सोनिया करीब डेढ़-दो साल से अपनी सास राजग्री के साथ यहां आती हैं.
सोनिया ने कहा कि उन्हें थोड़ा-बहुत पढ़ना-लिखना आता था. उन्होंने अपनी सास से कहा कि अपना नाम लिखना तो आना ही चाहिए. इसी सोच के साथ दोनों स्कूल आने लगीं. अब सोनिया पहले से बेहतर हस्ताक्षर कर लेती हैं और सास के साथ पढ़ने को लेकर पूरा परिवार खुश है.
मां-बाप नहीं रहे, मजदूरी की... अब 60 साल की अंगूरी सीख रही हिसाब-किताब
60 वर्षीय अंगूरी की कहानी भी दर्द और हौसले से भरी है. वह बताती हैं कि माता-पिता के निधन के बाद पढ़ाई का मौका नहीं मिला और जिंदगी मजदूरी करते हुए गुजरती रही. लेकिन उम्र के इस पड़ाव पर उन्होंने तय किया कि जितना समय बचा है, उसमें कुछ नया सीखा जाए.
दो साल से चेतना स्कूल में पढ़ रहीं अंगूरी अब अपना नाम लिख लेती हैं, हस्ताक्षर कर लेती हैं और हिसाब-किताब भी खुद कर लेती हैं. वह मजदूरी करने के साथ-साथ पढ़ाई के लिए समय निकालती हैं.
40 साल की विधवा मां, चिनाई की मजदूरी और फिर पढ़ाई का सपना
एक अन्य महिला की कहानी और भी भावुक कर देती है. 40 वर्षीय यह महिला चिनाई के काम पर मजदूरी करती हैं. पति की मौत को पांच साल हो चुके हैं. उस समय बच्चे छोटे थे. डेढ़ साल का बेटा था और परिवार की जिम्मेदारी उनके कंधों पर आ गई.
उन्हें कभी स्कूल जाने का मौका नहीं मिला. वह बताती हैं कि पहले वह पूरी तरह अंगूठा टेक थीं. उनके बच्चे चेतना स्कूल में पढ़ते थे. बच्चों ने ही एक दिन कहा- 'मम्मी, आप भी शाम को लेडीज के साथ पढ़ने जाया करो, अपना नाम लिखना सीख जाओगी.'
बस, यहीं से उनकी जिंदगी ने नया मोड़ लिया. अब वह साइन कर लेती हैं, अपना हिसाब-किताब जोड़ लेती हैं और दूसरी महिलाओं को भी पढ़ने के लिए प्रेरित करती हैं. उनकी चार बेटियां भी पढ़ रही हैं, जिनमें दो हॉस्टल में हैं और दो कावड़ी में पांचवीं और छठी कक्षा में पढ़ रही हैं.
जिस स्कूल में पढ़ी, उसी में अब बुजुर्ग महिलाओं को पढ़ा रही अंजलि
चेतना स्कूल की सबसे भावुक कहानी अंजलि की है. जब स्कूल शुरू हुआ था, तब मैम उनके घर जाकर बच्चों को स्कूल भेजने के लिए कहती थीं. अंजलि और उसके भाई-बहन चेतना स्कूल में पढ़ने लगे. यहीं से अंजलि ने पढ़ाई के साथ सिलाई और ब्यूटी पार्लर का काम भी सीखा. आज वह खुद इसी स्कूल में शिक्षिका की भूमिका निभा रही हैं और 55 से 70-80 वर्ष तक की महिलाओं को पढ़ाती हैं.
यानी जिस स्कूल ने कभी अंजलि के हाथ में किताब थमाई थी, आज उसी स्कूल में अंजलि दूसरी महिलाओं के हाथ में कलम थमा रही हैं.
सिर्फ अक्षर ज्ञान नहीं, आत्मनिर्भरता की पाठशाला
अध्यापिका सुनीता बताती हैं कि चेतना स्कूल में महिलाओं को पढ़ाई के साथ सिलाई और ब्यूटी पार्लर का प्रशिक्षण भी दिया जाता है. अब तक करीब 100 महिलाएं यहां से पढ़कर निकल चुकी हैं. इनमें कई ऐसी महिलाएं हैं जो पहले अपना नाम तक नहीं लिख पाती थीं, लेकिन अब हस्ताक्षर करने के साथ जोड़-घटाव और अपने काम की कमाई का हिसाब भी रख लेती हैं.
सुनीता का कहना है कि जब महिला पढ़ती है तो उसका असर सिर्फ उस महिला तक सीमित नहीं रहता, बल्कि पूरा परिवार उससे प्रभावित होता है.
बिना प्रचार और सरकारी मदद के चल रही उम्मीद की पाठशाला
भारत नगर की इस छोटी-सी जगह पर चल रहा चेतना स्कूल किसी बड़े भवन में नहीं, बल्कि आज भी बिना प्लास्टर की दीवारों वाले एक साधारण हॉलनुमा कमरे में महिलाओं को शिक्षा दे रहा है. न कोई बड़ा प्रचार, न कोई तामझाम. इसके बावजूद यहां आने वाली महिलाओं की संख्या और उनके भीतर सीखने की ललक लगातार बढ़ रही है.
अध्यापिका सुनीता का सपना है कि एक बार शिक्षा मंत्री महिपाल ढांडा इस स्कूल में आएं और इन महिलाओं को देखें, जिन्होंने साबित किया है कि सीखने की कोई उम्र नहीं होती.
सबक उन लोगों के लिए, जो मानते हैं कि बदलाव सिर्फ सरकारी योजनाओं से आता
चेतना स्कूल की कहानी सिर्फ एक स्कूल की कहानी नहीं है. यह उन महिलाओं की कहानी है, जिन्होंने गरीबी, मजदूरी, विधवापन और उम्र की बंदिशों के बावजूद अपने हाथ में कलम थाम ली. यह उन बच्चों की कहानी है जिन्होंने अपनी मां को पढ़ने के लिए प्रेरित किया और उस छात्रा की कहानी है जो कभी यहां पढ़ती थी और आज उसी जगह बुजुर्ग महिलाओं को पढ़ा रही है.
भारत नगर की इस छोटी-सी पाठशाला ने यह साबित कर दिया है कि अगर नीयत में सेवा और दिल में बदलाव की चाह हो तो बिना बड़े संसाधनों के भी जिंदगी बदली जा सकती है. कभी जिन हाथों में मजदूरी का फावड़ा था, उन्हीं हाथों में अब कलम है और कभी जो महिलाएं बैंक में अंगूठा लगाती थीं, आज वही आत्मविश्वास के साथ अपना नाम लिख रही हैं.
(पानीपत से राकेश भयाना की रिपोर्ट)