पीढ़ियां बदलीं, लेकिन नहीं बदली परंपरा, 100 साल से चली आ रही चरखी दादरी की रामलीला क्यों है शहर की पहचान?
चरखी दादरी की ऐतिहासिक रामलीला 101वें साल में प्रवेश कर चुकी है. 100 साल से ज्यादा पुरानी ये परंपरा शहर की आस्था, संस्कृति और भाईचारे की पहचान है. पीढ़ियां बदलने के बावजूद भगवान श्रीराम की लीलाओं का मंचन आज भी श्रद्धा और उत्साह के साथ किया जा रहा है.
चरखी दादरी के मुख्य हीरा चौक पर आयोजित होने वाली ऐतिहासिक रामलीला केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि चरखी दादरी की सांस्कृतिक विरासत, आस्था और आपसी भाईचारे की पहचान बन चुकी है. 100 साल से ज्यादा पुरानी इस परंपरा को साल 2026 में श्री रामलीला कमेटी, चरखी दादरी द्वारा 101 वें वर्ष में आगे बढ़ाया जा रहा है. समय बदला, पीढ़ियां बदलीं और कलाकारों की नई टोली मंच पर आई, लेकिन भगवान श्री राम की लीलाओं का मंचन करने की परंपरा आज भी उसी श्रद्धा और उत्साह के साथ कायम है.
दर्शक किसे जुड़ते हैं
रामलीला के मंच पर कलाकार जब रामायण के प्रसंगों को संवाद, गायन और अभिनय के माध्यम से जीवित करते हैं, तो दर्शक त्रेता युग की कथाओं से जुड़ जाते हैं. ताड़का वध, सीता स्वयंवर, कैकेयी का कोप भवन और लक्ष्मण-मेघनाद युद्ध जैसे प्रसंग दर्शकों को धर्म, मर्यादा, त्याग और सत्य की राह पर चलने का संदेश देते हैं.
परंपरा से जुड़ने का अवसर
रामलीला में वर्षों से अभिनय कर रहे कलाकारों का कहना है कि ये मंच उनके लिए केवल अभिनय का माध्यम नहीं, बल्कि आस्था और परंपरा से जुड़ने का अवसर है. कलाकारों के अनुसार, उनके पूर्वजों और गुरुओं ने जिस परंपरा को शुरू किया और संभालकर रखा, वो उसी विरासत को आगे बढ़ाने का प्रयास कर रहे हैं. वहीं, नए कलाकार भी इस सांस्कृतिक धरोहर का हिस्सा बनकर गौरव महसूस करते हैं.
नई पीढ़ी की भागीदारी बेहद जरूरी
कलाकारों का मानना है कि रामलीला की परंपरा को जीवित रखने के लिए नई पीढ़ी की भागीदारी बेहद जरूरी है. इसी उद्देश्य से युवा कलाकार भी मंच पर अपनी प्रतिभा दिखाते हुए धार्मिक और सांस्कृतिक मूल्यों से जुड़े रहते हैं. चरखी दादरी की रामलीला की प्रमुख विशेषताओं में भगवान श्रीराम की भव्य बारात शामिल है. बारात शहर के प्रमुख मार्गों से गुजरती है और इसमें शामिल धार्मिक झांकियां श्रद्धालुओं के आकर्षण का केंद्र बनती हैं. इस आयोजन को देखने के लिए शहर के साथ-साथ आसपास के क्षेत्रों से भी बड़ी संख्या में लोग पहुंचते हैं.
विजयदशमी कब है?
शारदीय नवरात्र के दौरान होने वाला रामलीला मंचन विजयदशमी यानी दशहरे पर रावण दहन के साथ संपन्न होता है. इस दौरान पूरा वातावरण धार्मिक उत्साह से सराबोर नजर आता है. एक सदी से ज्यादा समय से चली आ रही यह परंपरा चरखी दादरी के लोगों को एक मंच पर जोड़ने का काम कर रही है. रामलीला के माध्यम से धार्मिक आस्था के साथ-साथ सामाजिक समरसता, आपसी भाईचारे और मर्यादित जीवन के संदेश को भी आगे बढ़ाया जा रहा है.
प्रचार-प्रसार के तरीके
समय के साथ आयोजन के प्रचार-प्रसार के तरीके भी बदले हैं. डिजिटल माध्यमों और लाइव प्रसारण के जरिए रामलीला अधिक लोगों तक पहुंच रही है. इससे वे लोग भी इस आयोजन से जुड़ सकते हैं, जो किसी कारणवश मौके पर उपस्थित नहीं हो पाते.
चरखी दादरी की 101वें वर्ष की रामलीला इस बात की मिसाल है कि जब किसी परंपरा को पीढ़ियां अपनी जिम्मेदारी समझकर आगे बढ़ाती हैं, तो वो केवल इतिहास का हिस्सा नहीं रहती, बल्कि शहर की पहचान बन जाती है. हीरा चौक की यह रामलीला आज भी आस्था, संस्कृति और पूर्वजों की विरासत को जीवंत रखने का संदेश दे रही है.
(चरखी दादरी से सुरेंद्र सिंह की रिपोर्ट)