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लाइव कॉमेडी की इकोनॉमी को समझने के लिए डिजिटल और लाइव एक्सपीरियंस के फर्क को देखना जरूरी है. यूट्यूब वीडियो को ऑडियंस कभी भी, कहीं भी देख सकती है और उसे दोबारा चला सकता है. लेकिन लाइव शो में ऐसा नहीं है. एक तय तारीख, समय और जगह पर पहुंचना पड़ता है. वहां कॉमेडियन और ऑडियंस के बीच डायरेक्ट डायलॉग होता है. कई बार शो के दौरान बीच में ही गलती को सही करना पड़ता है या ऑडियंस इंटरेक्शन का हिस्सा बनना पड़ता है. वहीं अगर अब बात करें शो से होने वाली कमाई के बारे में, तो किसी शो का टिकट प्राइस एक हजार रुपए है, तो ये पूरी रकम सिर्फ कॉमेडियन की जेब में नहीं जाती है. टिकटिंग प्लेटफॉर्म की फीस, वैन्यू का किराया, टैक टीम, साउंड और लाइटिंग, स्टाफ, सिक्योरिटी, मार्केटिंग और एड जैसे खर्च इसमें शामिल हो सकते हैं.
इसके अलावा लागू टैक्स और दूसरे टैक्स भी प्राइस पर असर डालते हैं. प्रमोटर को शो होस्ट करने की लागत और जोखिम उठाना पड़ता है, जबकि कलाकार और उसकी टीम को फीस या रिवैन्यू मिल सकता है. बड़े शो में प्रोडक्शन की लागत भी काफी बढ़ सकती है. यानी टिकट की कीमत को कॉमेडियन की कमाई मानना उसी तरह अधूरा है जैसे किसी फिल्म की टिकट बिक्री को सीधे एक्टर की इनकम मान लेना.
स्टेज पर कॉमेडियन का 60 मिनट का शो दिखाई देता है, लेकिन उस एक घंटे के पीछे महीनों की तैयारी हो सकती है. नए जोक्स लिखना, ओपन माइक्स में उन्हें आजमाना, ऑडियंस का रिएक्शन देखना, पंचलाइन्स बदलना, कमजोर हिस्से हटाना और फिर पूरे सेट को बार-बार तैयार करना इस प्रोसेस का हिस्सा है. किसी नए स्पेशल के लिए कई बार दर्जनों या सैकड़ों छोटे परफॉर्मेंस टेस्ट किए जा सकते हैं. इस लिहाज से सवाल एक जोक की कीमत कितनी है? केवल कलाकार की फीस का सवाल नहीं है. ये क्रिएटिव लैबर की कीमत का सवाल भी है. डिजिटल जनरेशन में ऑडियंस को कंटेंट फ्री मिल सकता है, लेकिन उस कंटेंट को तैयार करने में लगने वाला समय और मेहनत मुफ्त नहीं होती है.

इंडियन स्टैंड-अप कॉमेडी को सिर्फ मुंबई, दिल्ली और बेंगलुरु के नजरिये से देखना अब सही नहीं होगा. जयपुर, पुणे, चंडीगढ़, इंदौर, लखनऊ और अहमदाबाद जैसे शहरों में भी ओपन माइक्स, छोटे कॉमेडी वैन्यू और टूर शोज के लिए मार्केट आगे बढ़ रहा है. लेकिन क्या छोटे शहरों में ऑडियंस की पसंद बड़े शहरों से अलग है? लैंग्वेज, जोक्स समझने का तरीका और टिकट की कीमत इसके अहम साइन हो सकते हैं. हर इलाके और शहर की भाषाओं में होने वाले शो ये भी दिखाते हैं कि कॉमेडी का बाजार सिर्फ अंग्रेजी बोलने वाले शहरी ऑडियंस तक लिमिटेड नहीं है. अब लोकल जोक्स भी किसी कलाकार को नए बाजार में अपनी पहचान बनाने में मदद कर सकते हैं.
सोशल मीडिया ने कॉमेडी को भी पूरी तरह से बदल दिया है. इंस्टाग्राम, यूट्यूब और शॉर्ट-वीडियो प्लेटफॉर्म्स पर मीम्स या कॉमेडी कंटेंट से पहचान बनाने वाला क्रिएटर बाद में पैड लाइव ऑडियंस तक पहुंचने की कोशिश कर सकता है. लेकिन फॉलोअर्स के नंबर्स अपने आप टिकट बिक्री में बदल जाए, ये जरूरी नहीं है. डिजिटल पॉपुलैरिटी और पैड ऑडियंस दो अलग मैट्रिक्स हैं. दूसरी ओर कॉरपोरेट वर्कर के बीच ओपन माइक कल्चर भी तेजी से बढ़ रहा है. बहुत से लोग स्टैंड-अप को अपना करियर बनाने के बजाए साइड एक्टिविटी के रूप में आजमा रहे हैं.

एक तरफ 100-200 सीट वाले इंटीमेट कॉमेडी क्लब हैं, जहां कलाकार को ऑडियंस का रिएक्शन तुरंत मिलता है और रोजाना शोज या मेंबरशिप मॉडल नए बनाए जाते हैं. दूसरी तरफ हजारों ऑडियंस की क्षमता वाले बड़े ऑडिटोरियम हैं, जहां एक शो में बड़ी ऑडियंस तक पहुंचना आसान है. लेकिन वैन्यू और प्रोडक्शन कॉस्ट भी अलग लेवल पर हो सकते हैं. इसी के साथ वूमन कॉमेडियन्स, कपल्स, पैरेंट्स और फैमिली जैसे नए या ज्यादा ग्रुप वाली ऑडियंस को लेकर भी बाजार बदल रहा है.
आज एक सक्सेफुल कॉमेडियन का बिजनेस सिर्फ टिकट बेचने तक ही लिमिटेड नहीं है. यूट्यूब वीडियोज, पॉडकास्ट, इंस्टाग्राम कंटेंट, ओटीटी स्पेशल, लाइव टूर और ब्रांड कोलेब उसके रैवेन्यू के अलग-अलग हिस्से हो सकते हैं. इसी वजह से कॉमेडी को केवल एंटरटेनमेंट नहीं, बल्कि डिजिटल और लाइव एंटरटेनमेंट इकोनॉमी का मिक्सचर देखना जरूरी है. फ्यूचर में कॉमेडी क्लब मेंबरशिप्स और सब्सक्रिप्शन्स जैसे मॉडल भी इस मार्केट का हिस्सा बन सकते हैं.