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यश चोपड़ा: इश्क की चादर में लिपटी हिंदुस्तान की कहानी, जिनके सिनेमा में मोहब्बत मजहब से बड़ी थी

यश चोपड़ा को सिर्फ रोमांस का बादशाह कहना उनकी सिनेमाई विरासत को सीमित करना है. ‘धूल का फूल’ से ‘वीर-जारा’ तक उन्होंने प्रेम, इंसानियत, सांप्रदायिकता, बंटवारे और सामाजिक संघर्षों को पर्दे पर उतारा. उनकी फिल्में बताती हैं कि मोहब्बत सिर्फ दो दिलों का रिश्ता नहीं, बल्कि इंसानियत की सबसे खूबसूरत अभिव्यक्ति है.

Written By Amit Singh
Published: Oct 20, 2026, 03:26 PM IST | Updated: Oct 20, 2026, 04:41 PM IST
Image Credit: Yash Raj Films (Yash Chopra - Born: 27 Sep 1932, Died: 21 Oct 2012)
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यश चोपड़ा ने हिंदी सिनेमा को ऐसी ही प्रेम कहानियां दीं, जिन्होंने मोहब्बत को सिर्फ पर्दे पर नहीं, बल्कि एक पूरी पीढ़ी के एहसासों में जिंदा कर दिया.

उनकी फिल्मों में प्रेमी सिर्फ एक-दूसरे का हाथ थामकर नहीं चलते थे. वे सरसों के खेतों, बर्फ से ढकी पहाड़ियों और बारिश में भीगती सड़कों के रास्ते भारतीय दर्शकों के सपनों में दाखिल होते थे.

सफेद साड़ी, रंगीन शिफॉन, गुनगुनाते पहाड़ और अधूरी मोहब्बतें इन सबने मिलकर एक ऐसा सिनेमाई संसार रचा, जिसमें इश्क महज कहानी नहीं, जिंदगी जीने का एक खूबसूरत तरीका था.

यश चोपड़ा को सिर्फ ‘किंग ऑफ रोमांस’ कह देना वैसा ही है, जैसे किसी नदी को देखकर उसके भीतर बहते इतिहास को भुला देना. उनकी फिल्मों के पर्दे पर जितनी मोहब्बत थी, पर्दे के पीछे उतने ही कठिन सवाल भी थे.

धर्म क्या है? इंसान की पहचान किससे तय होती है? समाज की नैतिकता में स्त्री की जगह कहां है? देश के बंटवारे की चोट कितनी पीढ़ियों तक महसूस होती है? और प्रेम की कीमत आखिर किसे चुकानी पड़ती है? यश चोपड़ा की असली कहानी इन सवालों के बीच से गुजरती है.  

इश्क से पहले समाज की नब्ज

27 सितंबर 1932 को लाहौर में जन्मे यश चोपड़ा ने विभाजन की त्रासदी और बदलते भारतीय समाज का दौर देखा. बड़े भाई बीआर चोपड़ा के साथ काम करते हुए उन्होंने सिनेमा की भाषा, पटकथा, संगीत और कलाकारों के चयन की बारीकियां सीखीं.

1959 में बतौर निर्देशक उनकी पहली फिल्म ‘धूल का फूल’ आई. दिलचस्प यह है कि हिंदी सिनेमा को आगे चलकर रोमांस का नया व्याकरण देने वाले इस फिल्मकार की शुरुआत एक ऐसे बच्चे की कहानी से हुई, जिसे समाज उसके जन्म के कारण स्वीकार करने में हिचकता है.

फिल्म का सवाल सीधा था कि बिना विवाह के जन्मे बच्चे का अपराध क्या है? और अगर कोई अपराध है, तो उसकी जिम्मेदारी किसकी है? साहिर लुधियानवी के लिखे गीत ‘तू हिंदू बनेगा न मुसलमान बनेगा, इंसान की औलाद है, इंसान बनेगा’ ने कहानी को सामाजिक संदेश से आगे बढ़ाकर इंसानियत की पुकार बना दिया.

यहां गौर करने वाली बात है कि यश चोपड़ा ने शुरुआत में ही साबित कर दिया था कि दर्शकों को भावुक करने के लिए केवल प्रेमी-प्रेमिका की जरूरत नहीं होती.

कभी एक मां की बेबसी, कभी पिता की जिम्मेदारी से भागने की प्रवृत्ति और कभी एक अनजान व्यक्ति की मानवीय करुणा भी उतनी ही गहरी भावनाएं पैदा कर सकती हैं.

1961 में ‘धर्मपुत्र’ के जरिए उन्होंने विभाजन, धार्मिक कट्टरता और सांप्रदायिक तनाव जैसे विषय उठाए.  शशि कपूर का किरदार धार्मिक पहचान के उन्माद में इस कदर डूब जाता है कि उसे दूसरे धर्म के लोगों से नफरत होने लगती है.

लेकिन जब उसे अपनी ही जन्म-कथा का सच पता चलता है, तब उसकी वैचारिक जमीन हिल जाती है. यह सिर्फ एक किरदार का संकट नहीं था, यह उस सोच पर सवाल था जो इंसान को उसके जन्म और धर्म के खांचे में कैद कर देना चाहती है.

जिस दौर में विभाजन की यादें ताजा थीं, उस समय ऐसे विषय पर फिल्म बनाना आसान नहीं था. फिल्म व्यावसायिक रूप से सफल नहीं हुई, लेकिन आज उसका महत्व इस बात में है कि उसने धार्मिक पहचान और मानवीय रिश्तों के बीच टकराव को बेबाकी से दिखाया.

यश चोपड़ा की शुरुआती फिल्मों में सामाजिक सरोकारों की यह मौजूदगी उनके बाद के रोमांटिक सिनेमा को समझने की भी कुंजी है.

यश चोपड़ा के जीवन का एक कम चर्चित पहलू राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) से उनके शुरुआती जुड़ाव की चर्चा है. द वायर पर छपे लेख के मुताबिक, जालंधर में आसपास के आर्यसमाजी लड़कों की तरह यश चोपड़ा भी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का सदस्य बन गए थे. और शाखाओं, अखाड़ों और कसरतों में सक्रिय भागीदारी करने लगे थे.

हालांकि, उनकी फिल्मों में दिखाई देने वाला वैचारिक संसार इससे बिल्कुल जुदा दिखता है. ‘धूल का फूल’ में धर्म से पहले इंसान को रखने की बात है, जबकि ‘धर्मपुत्र’ धार्मिक कट्टरता के खतरों को सामने रखती है.

बाद के सालों में ‘वीर-जारा’ में भारत और पाकिस्तान के बीच सरहद, नफरत और राजनीतिक तनाव से ऊपर उठते प्रेम को केंद्र में रखा गया.

‘वक्त’ से ‘दीवार’ तक

यश चोपड़ा की ‘वक्त’ ने बिछड़े परिवार की कहानी के जरिए समय, नियति और रिश्तों की अहमियत को बड़े पर्दे पर उतारा. यह हिंदी सिनेमा की शुरुआती चर्चित मल्टीस्टार फिल्मों में भी शामिल थी.

उसके बाद ‘इत्तेफाक’ ने बिना पारंपरिक गीत-संगीत के रहस्य और तनाव पर आधारित कहानी कहने का प्रयोग किया.

1970 के दशक में यश चोपड़ा ने अमिताभ बच्चन के साथ ‘दीवार’, ‘त्रिशूल’ और ‘काला पत्थर’ जैसी फिल्में बनाईं. इन फिल्मों का नायक हमेशा प्रेम में डूबा हुआ खूबसूरत इंसान नहीं था.

वह व्यवस्था से नाराज था, अपने अतीत से घायल था और न्याय पाने के लिए स्थापित नियमों से टकराने को तैयार था.

‘दीवार’ का विजय उस दौर के उस भारतीय की बेचैनी का चेहरा बना, जिसे लगता था कि व्यवस्था ने उसके साथ अन्याय किया है.

यहीं यश चोपड़ा की खासियत सामने आती है. वह समय के साथ अपनी सिनेमाई भाषा बदल सकते थे. एक ओर ‘दीवार’ का गुस्सा था, दूसरी ओर ‘कभी-कभी’ का प्रेम, जिसमें अतीत के रिश्ते वर्तमान के परिवारों और जिम्मेदारियों से टकराते हैं.

‘सिलसिला’ में भी प्रेम कोई सरल सपना नहीं था. उसमें आकर्षण, अपराधबोध, सामाजिक मर्यादा और अधूरेपन का द्वंद्व था.

यानी यश चोपड़ा ने प्रेम को हमेशा आसान नहीं बनाया. कई बार उन्होंने दिखाया कि किसी से प्रेम करना और उसके साथ जीवन बिताना दो अलग बातें हैं. यही उनकी कहानियों को केवल मनोरंजन नहीं, भावनात्मक अनुभव बनाता है.

स्विट्जरलैंड की चर्चा जरूरी

1980 के दशक के आखिर में ‘चांदनी’ ने यश चोपड़ा की रोमांटिक पहचान को नई ऊंचाई दी. श्रीदेवी की उपस्थिति, शिव-हरि का संगीत और बर्फ से ढकी वादियों में प्रेम की अभिव्यक्ति ने हिंदी फिल्म के रोमांस को एक अलग दृश्य-भाषा दी.

इसके बाद ‘लम्हे’, ‘डर’ और ‘दिल तो पागल है’ ने प्रेम के अलग-अलग रूप सामने रखे. ‘लम्हे’ ने उम्र, स्मृति और आकर्षण जैसे जटिल विषयों को छुआ. ‘डर’ में शाहरुख खान का प्रेम जुनून और भय की सीमा तक पहुंच जाता है.

इस फिल्म का महत्व यह भी है कि प्रेम को हमेशा पवित्र और सुंदर बताने के बजाय उसके अस्वस्थ, खतरनाक रूप को भी दिखाया गया. ‘दिल तो पागल है’ ने आधुनिक शहरी युवा की भावनाओं, दोस्ती और प्रेम के चुनाव को अपने केंद्र में रखा.

यश चोपड़ा का रोमांस सिर्फ फूलों और पहाड़ों का रोमांस नहीं था. वह कभी इंतजार था, कभी ईर्ष्या, कभी अधूरा वादा और कभी उस व्यक्ति को खो देने का डर, जिसके बिना जीवन की कल्पना मुश्किल हो जाए.

उनकी फिल्मों में संगीत कहानी से अलग सजावट नहीं था. वह कई बार उन भावनाओं की आवाज बन जाता था जिन्हें किरदार सीधे कह नहीं पाते थे.

इसीलिए उनकी फिल्मों के दृश्य और गीत समय के साथ पुराने जरूर हुए लेकिन भावनाओं की उनकी भाषा अप्रासंगिक नहीं हुई.

ऐसा इश्क जो पर्दे से उतरकर जिंदगी में रह गया

यश चोपड़ा की आखिरी निर्देशित फिल्म ‘जब तक है जान’ 2012 में रिलीज हुई. उसी साल 21 अक्टूबर को उनका निधन हो गया. उनकी यात्रा का अंत हुआ, लेकिन उनके सिनेमा की यात्रा नहीं रुकी.

यश राज फिल्म्स के माध्यम से उन्होंने एक ऐसी फिल्म निर्माण परंपरा भी विकसित की, जिसने हिंदी सिनेमा के व्यावसायिक स्वरूप और उसकी वैश्विक पहचान को प्रभावित किया.

उनकी विरासत को केवल इस बात से नहीं मापा जाना चाहिए कि उन्होंने कितनी हिट फिल्में बनाईं. असली सवाल यह है कि उन्होंने दर्शकों को क्या महसूस करना सिखाया. 

उन्होंने प्रेम में प्रतीक्षा की गरिमा दिखाई, बिछड़ने के दर्द को आवाज दी और यह भी बताया कि इंसान की पहचान उसके धर्म, जन्म या सामाजिक स्थिति से कहीं बड़ी हो सकती है.

शायद इसी वजह से यश चोपड़ा का सिनेमा आज भी हमारे भीतर कहीं बजता है. किसी पुराने गीत की तरह, किसी भूली हुई मोहब्बत की तरह और उस उम्मीद की तरह कि दुनिया चाहे जितनी बदल जाए, दिल में प्रेम के लिए थोड़ी-सी जगह हमेशा बची रहनी चाहिए.

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About the Author

अमित सिंह देश के वरिष्ठ पत्रकारों और डिजिटल मीडिया संपादकों में शामिल हैं. राजनीति, अर्थव्यवस्था, सार्वजनिक नीति और सामाजिक मुद्दों पर लेखन का उन्हें 18 वर्षों से अधिक का अनुभव है. अपने लंबे पत्रकारिता करियर में उन्होंने अनेक महत्वपूर्ण राष्ट्रीय विषयों की रिपोर्टिंग, विश्लेषण और संपादकीय नेतृत्व किया है. उनकी पहचान तथ्यों पर आधारित, संतुलित और गहन विश्लेषणात्मक लेखन के लिए है. वर्तमान में अमित सिंह Zee News की हिंदी वेबसाइट के संपादक हैं. इस भूमिका में वे संपादकीय दिशा तय करने, विशेष कवरेज की रणनीति बनाने और डिजिटल न्यूज़रूम के संचालन का नेतृत्व करते हैं.पत्रकारिता में उत्कृष्ट योगदान के लिए अमित को देश के सबसे प्रतिष्ठित सम्मानों में से एक Ramnath Goenka Excellence in Journalism Awards से सम्मानित किया जा चुका है. यह सम्मान उनकी पेशेवर विश्वसनीयता, खोजी दृष्टि और जनसरोकारों से जुड़े मुद्दों पर प्रभावशाली पत्रकारिता का प्रमाण है.अमित ने अपने करियर के दौरान भारत के अग्रणी मीडिया संस्थानों The Wire, Tehelka, Dainik Jagran, Hindustan और Aaj Tak में महत्वपूर्ण भूमिकाओं में कार्य किया है. उन्हें प्रिंट, टेलीविजन और डिजिटल तीनों माध्यमों में काम करने का अनुभव है. आप अमित सिंह से सीधे amit.singh@india.com पर ईमेल के जरिए संपर्क कर सकते हैं.
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