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बॉलीवुड के दिग्गज अभिनेता नाना पाटेकर के अचानक निधन की खबर से पूरा देश और बॉलीवुड सदमे में है. गोवा स्थित उनके घर पर आज सुबह अचानक तबीयत बिगड़ने के बाद उन्हें मणिपाल अस्पताल ले जाया गया था, जहां डॉक्टरों की टीम ने करीब 45 मिनट तक CPR दिया, लेकिन उन्हें बचाया नहीं जा सका. अस्पताल ने इस मामले को मेडिको लीगल केस (MLC) के तौर पर दर्ज किया है और शव को पोस्टमार्टम के लिए गोवा मेडिकल कॉलेज भेज दिया. इस घटना के बाद से आम लोगों के मन में कई सवाल उठ रहे हैं कि आखिर एक बड़े कलाकार की अचानक मौत के बाद पुलिस केस या MLC दर्ज करने की जरूरत क्यों पड़ी? क्या हर MLC का मतलब कोई साजिश या अपराध होता है? इस पूरी रिपोर्ट में हम समझेंगे कि मेडिकल और कानूनी प्रक्रियाएं ऐसे मामलों में कैसे काम करती हैं.
मणिपाल अस्पताल के ऑन्कोलॉजी डिपार्टमेंट के हेड डॉ. शेखर सालकर के अनुसार, नाना पाटेकर को अस्पताल में मृत अवस्था में ही लाया गया था. सुबह 5:30 बजे उन्हें आधिकारिक रूप से मृत घोषित कर दिया गया. डॉक्टर शेखर सालकर ने बताया कि रात को करीब 2:30 बजे नाना पाटेकर ने अपने एक दोस्त को मैसेज भेजकर बताया था कि उनकी तबीयत ठीक नहीं लग रही है. हालांकि, देर रात होने के कारण दोस्त ने वह मैसेज तुरंत नहीं देखा. बाद में जब दोस्त ने फोन कॉल देखा, तो वे सुबह करीब 4:00 बजे नाना पाटेकर के घर पहुंचे. उस समय नाना पाटेकर को काफी पसीना आ रहा था और उन्होंने उन्हें संभालने की कोशिश की और शुरुआती जरूरी कदम उठाए. उस समय नाना पाटेकर को काफी पसीना आ रहा था, इसलिए उन्होंने उनके केयरटेकर को हॉस्पिटल भेजा. वे हमारी एम्बुलेंस ले गए. जब हमारी इमरजेंसी रिस्पांस टीम वहां पहुंची, तो उन्होंने कार्डियक मसाज शुरू की क्योंकि वे बिल्कुल भी प्रतिक्रिया नहीं दे रहे थे. उन्हें सुबह करीब 4:20 या 4:30 बजे हमारे हॉस्पिटल ले आए. अस्पताल पहुंचने पर भी डॉक्टरों ने करीब 45 मिनट से एक घंटे तक लगातार CPR दिया, लेकिन उन्हें मृत अवस्था में ही लाया गया था. फिर हमें पुलिस केस दर्ज करना पड़ा क्योंकि यह एक MLC (मेडिको-लीगल केस) था. फिर शव को पोस्टमार्टम के लिए गोवा मेडिकल कॉलेज ले जाया गया. चूंकि वे अस्पताल लाए जाने से पहले ही दम तोड़ चुके थे और परिवार का कोई सीधा सदस्य उस वक्त मौजूद नहीं था, इसलिए डॉक्टरों को नियमानुसार पुलिस केस दर्ज करना पड़ा.
मेडिको-लीगल केस दो शब्दों से मिलकर बना है- मेडिकल (चिकित्सा) और लीगल (कानून). जब किसी मेडिकल केस में इलाज के साथ-साथ कानूनी जांच की जरूरत महसूस होती है, तो उसे MLC की कैटेगरी में रखा जाता है. फॉरेंसिक एक्सपर्ट राकेश मिश्रा ने बताया कि मेडिको-लीगल केस उन सभी मेडिकल मामलों में दर्ज किया जाता है जहां कानूनी या पुलिस जांच की जरूरत होती है; जैसे सड़क दुर्घटनाएं, मारपीट या घरेलू हिंसा, आत्महत्या का प्रयास या जहर खाना, आग से जलना, यौन उत्पीड़न, किसी भी तरह की संदिग्ध परिस्थितियों में हुई मौत, या जब मरीज को अस्पताल में मृत अवस्था में लाया जाता है. इन मामलों में अस्पताल के लिए तुरंत पुलिस को सूचना देना अनिवार्य होता है. डॉक्टर मरीज का इलाज करते हैं, लेकिन घटना के कारणों और परिस्थितियों की जांच करना पुलिस की जिम्मेदारी होती है. ऐसे मामलों में डॉक्टर द्वारा तैयार की गई MLC रिपोर्ट कोर्ट में एक बेहद मजबूत कानूनी सबूत मानी जाती है.
यूपी सरकार में कार्यरत डॉ. उदय प्रताप सिंह ने बताया कि एमएलसी का मतलब होता है मेडिको-लीगल केस. इसको कहते हैं कि जब इसमें कोई चोट लगी हो या बीमारी हो या मृत्यु के पीछे कोई ऐसी परिस्थिति हो जिसमें कानूनी या पुलिस जांच की आवश्यकता हो.
फॉरेंसिक एक्सपर्ट राकेश मिश्रा ने कहा कि विसरा सैंपल हमेशा पोस्टमार्टम के दौरान तब कलेक्ट किया जाता है, जब मौत का कारण बाहर से देखकर या साधारण जांच से पता नहीं चलता. विसरा सैंपल सामान्यतः पोस्टमार्टम के दौरान, मृत्यु के बाद, शरीर के आंतरिक अंगों से कलेक्ट किया जाता है. इसे विषाक्तता/रासायनिक जांच के लिए फोरेंसिक विज्ञान प्रयोगशाला (FSL) भेजा जाता है.
जब किसी व्यक्ति की मौत अचानक, बिना किसी लंबी बीमारी के इतिहास के, या बिना किसी डॉक्टर की मौजूदगी के होती है, तो अस्पताल उसे सामान्य प्राकृतिक मृत्यु नहीं मान सकता. नाना पाटेकर के मामले में भी वे घर पर अचानक बेहोश हुए और अस्पताल पहुंचने से पहले ही उनकी मृत्यु हो चुकी थी. जब भी कोई मरीज 'Brought Dead' स्थिति में अस्पताल लाया जाता है, तो डॉक्टर तुरंत मृत्यु का सटीक कारण तय नहीं कर सकते. ऐसे में यह सुनिश्चित करने के लिए कि मौत के पीछे कोई बाहरी कारण, जहर, या अनहोनी नहीं है, कानूनन MLC दर्ज करना जरूरी हो जाता है. यह एक स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर (SOP) है जो हर नागरिक के लिए समान रूप से लागू होता है, चाहे वह कोई आम इंसान हो या कोई बड़ा सेलेब्रिटी.
इस मामले में राकेश मिश्रा का कहना है कि मेडिको लीगल केस को लेकर आम आदमी के बीच में कई भ्रांतियां होती हैं.
"पुलिस के आने तक डॉक्टर इलाज नहीं करेगा", यह बिल्कुल गलत है. परमानंद कटारा केस में सुप्रीम कोर्ट का सख्त आदेश था कि किसी भी डॉक्टर या अस्पताल की पहली जिम्मेदारी इंसान की जान बचाना है. चाहे वह कितना भी बड़ा क्रिमिनल क्यों न हो या एक्सीडेंट का केस हो, डॉक्टर पहले इलाज शुरू करेगा, और कागजी कार्रवाई (MLC और पुलिस को बुलाना) साथ-साथ या बाद में होती रहेगी.
वहीं, "MLC बन गई मतलब अब तो पक्का कोर्ट-कचहरी जाना पड़ेगा", ऐसा नहीं है, MLC सिर्फ एक मेडिकल और लीगल 'रिकॉर्ड' है कि आपको फलां-फलां दिन चोट लगी थी.
"प्राइवेट अस्पताल MLC नहीं बना सकते, इसके लिए तो सरकारी अस्पताल ही जाना पड़ेगा", ऐसा नहीं है, कानून के मुताबिक, देश का कोई भी रजिस्टर्ड प्राइवेट अस्पताल या क्लीनिक MLC बनाने से मना नहीं कर सकता.
फॉरेंसिक एक्सपर्ट राकेश मिश्रा ने बताया कि यह धारणा पूरी तरह से गलत और अवैज्ञानिक है कि "MLC केवल संदिग्ध मौत के मामलों में दर्ज होता है." MLC का 90% से अधिक हिस्सा जीवित मरीजों से जुड़ा होता है. MLC दर्ज होने का अर्थ यह बिल्कुल नहीं है कि मौत संदिग्ध है, बल्कि इसका अर्थ यह है कि मरीज के शरीर पर लगी चोट या उसकी शारीरिक स्थिति संदिग्ध है, और न्याय सुनिश्चित करने के लिए मेडिसिन के साथ-साथ कानून के हस्तक्षेप की आवश्यकता है. जैसे जब किसी व्यक्ति को अस्पताल मृत अवस्था में लाया जाए और मौत का कारण कोई स्पष्ट पुरानी बीमारी (जैसे हार्ट अटैक या कैंसर) न हो.
आम लोगों में अक्सर यह गलतफहमी होती है कि अगर किसी मामले में MLC दर्ज हुआ है या पुलिस आई है, तो जरूर कोई अपराध या गड़बड़ी हुई है. लेकिन ऐसा बिल्कुल नहीं है.

डॉ. उदय प्रताप सिंह ने जानकारी दी कि हार्ट अटैक की कंडीशन कई तरीके की होती है कि क्या उसका कारण है. जरूरी नहीं है कि वह पोस्टमार्टम में दिखाई दे. कभी-कभी कुछ-कुछ बीमारियों की जो हार्ट की बीमारियां होती हैं उनकी वजह से भी हार्ट अटैक हो सकता है, या अचानक उसका बीपी हाई हो जाए, उसकी वजह से भी हार्ट अटैक हो सकता है. अगर हम लोग उसमें पोस्टमार्टम करते हैं, तो उसमें आपके कोरोनरी आर्टरी में ब्लॉकेज भी देख सकते हैं, उसमें एथेरोस्क्लेरोसिस के संकेत मिलेंगे या कोई प्लैक वगैरह कोरोनरी में दिखेगा या पुराना कोई मायोकार्डियल इन्फार्क्शन का निशान भी दिख सकता है. ये तमाम कारण हो सकते हैं.
पोस्टमार्टम एक वैज्ञानिक प्रक्रिया है जिसमें डॉक्टरों और फॉरेंसिक विशेषज्ञों की टीम शरीर की अंदरूनी और बाहरी दोनों तरह से बारीकी से जांच करती है. डॉ. उदय प्रताप सिंह ने बताया कि पोस्टमार्टम में डॉक्टर बाहरी परीक्षण और शरीर का आंतरिक परीक्षण करते हैं. बाहरी परीक्षण में पहचान, उसकी उम्र, लिंग, कपड़ों की क्या स्थिति है, उस पर कोई चोट या निशान तो नहीं है. आंतरिक परीक्षण में सभी अंगों का एग्जामिनेशन किया जाता है- मस्तिष्क का और आपके हृदय का, लिवर का, फेफड़े का, प्लीहा का, गुर्दे इत्यादि का.
इस मामले में डॉ. उदय ने बताया कि यदि पोस्टमार्टम के दौरान जहर (पॉइजनिंग) दिए जाने का संदेह हो या मृत्यु का कारण अस्पष्ट/संदिग्ध लगे, तो विसरा सैंपल को सुरक्षित रख लिया जाता है. इसके तहत शरीर के विभिन्न अंगों जैसे कि लिवर, किडनी का हिस्सा, ब्लड सैंपल, बाइल और पेट के अंदरूनी कंटेंट का सैंपल लेकर जांच के लिए भेजा जाता है.
पुलिस की आगे की कार्रवाई को लेकर डॉ. उदय प्रताप सिंह ने कहा-

डॉ. उदय प्रताप सिंह ने बताया कि प्राकृतिक मृत्यु और जो अचानक मृत्यु या संदिग्ध मौत होती है, उनमें आपस में अंतर करना थोड़ा मुश्किल होता है. ऐसा इसलिए है क्योंकि अचानक हुई मृत्यु और प्राकृतिक मृत्यु हमेशा एक ही चीज नहीं होती हैं. इसमें कभी किसी व्यक्ति की अचानक हृदय रोग से मृत्यु हो गई या उसको अचानक हार्ट अटैक आ गया, तो ऐसी स्थितियों में मेडिको-लीगल जांच की आवश्यकता होती है. इसीलिए हम शुरुआत में यह दावे के साथ नहीं कह सकते कि यह मृत्यु प्राकृतिक है या किसी संदिग्ध कारण से हुई है.