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आजकल की भागदौड़ भरी जिंदगी में हर कोई अपने परिवार से दूर रोजी-रोटी की तलाश में निकल पड़ता है. कोई दिल्ली में नौकरी कर रहा है तो कोई मुंबई में अपना घर बसा चुका है. लेकिन जब बात छठ जैसे पावन और महापर्व की आती है, तो अपनों से दूर रहने का दर्द और भी ज्यादा गहरा हो जाता है. मनोज भावुक द्वारा लिखा गया नया भोजपुरी गीत इसी दर्द को बहुत ही सरल और सीधे तरीके से बयां करता है. गाने की शुरुआत ही एक ऐसी मां से होती है जिसका बेटा परदेस में है और लाख कोशिशों के बाद भी इस साल छठ पर घर नहीं लौट पा रहा है.
इस गीत की कहानी असल में हमारे समाज के हर उस घर की कहानी है जहां से कोई न कोई युवा बाहर नौकरी कर रहा है. गीत में दिखाया गया है कि कैसे एक मां ने छठी मइया से दुआ मांगी थी कि उसका बेटा पढ़-लिखकर बड़ा अफसर बन जाए. मन्नत पूरी हो जाती है और बेटा अफसर भी बन जाता है, लेकिन नौकरी की व्यस्तता और दूरियों के कारण वह त्योहार पर मां के पास नहीं आ पाता. मां का दिल तो अपने बच्चे के लिए हर पल धड़कता है और जब इस बार भी बेटा घर नहीं पहुंच पाता, तो वह मायूस होने के बजाय खुद ही छठी मइया की पूजा की तैयारी में जुट जाती है.
कहानी में असली मोड़ तब आता है जब वह अकेली मां अपना भरा हुआ दउरा खुद उठाकर घाट की तरफ निकल पड़ती है. उम्र के इस पड़ाव पर अकेले भारी दउरा लेकर चलना आसान नहीं होता, तभी रास्ते में एक अनजान युवक उनकी मदद के लिए आगे आता है. जब मां उससे पूछती है कि बेटा तुम कौन हो, तो वह लड़का बड़े ही प्यार से जवाब देता है कि एक बेटा... आप हमारी अम्मा जैसी हैं, हम दउरा लेकर चलेंगे घाटे. यह छोटा सा संवाद दिल को छू लेता है और यह अहसास कराता है कि इस दुनिया में खून के रिश्तों के अलावा भी कुछ ऐसे रिश्ते होते हैं जो इंसानियत की डोर से बंधे होते हैं.
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इस बेहतरीन और भावुक गीत को अपनी खूबसूरत आवाज से सजाया है अपूर्वा प्रियदर्शी और शैलेन्द्र मिश्रा ने. गानों के बोल जितने दिल को छूने वाले हैं, उतना ही शानदार इसका संगीत भी है जिसे सुशांत देव ने तैयार किया है. इसका निर्देशन उज्ज्वल पांडेय ने बहुत ही संवेदनशीलता के साथ किया है ताकि स्क्रीन पर दिखने वाला हर एक सीन बिल्कुल असली और घर-परिवार जैसा लगे. गाने में राखी जायसवाल, शुभ तिवारी और हर्षित सिंह की अदाकारी ने चार चांद लगा दिए हैं, जिससे दर्शक खुद को इस कहानी से जुड़ा हुआ महसूस करते हैं.