जिस दिन पिता को खोया, उसी दिन खत्म हुआ बचपन! क्यों इस दिग्गज गायिका ने मोहम्मद रफी के साथ गाना गाने से कर दिया था इनकार?
Lata Mangeshkar Birthday: फरवरी, साल 2022 को इंडियन म्यूजिक की दुनिया में एक ऐसा सन्नाटा पसरा, जिसे शब्दों में बयां करना मुश्किल है. 'भारत की कोकिला' और 'मेलोडी क्वीन' के नाम से मशहूर लता मंगेशकर ने 92 वर्ष की उम्र में मुंबई के ब्रीच कैंडी अस्पताल में अंतिम सांस ली. उन्हें 8 जनवरी 2022 को कोविड-19 से पॉजिटिव पाए जाने के बाद अस्पताल में भर्ती कराया गया था. इलाज के दौरान उनकी हालत गंभीर बनी रही और लंबे समय तक अस्पताल में रहने के कारण उनकी मृत्यु मल्टी-ऑर्गन फेल्योर के कारण हुई.
लता मंगेशकर का जन्म 28 सितंबर, 1929 को इंदौर में हुआ था. संगीत उनके जीवन में बाहर से नहीं आया था, बल्कि वो उनके परिवार की सांसों में बसा हुआ था. उनके पिता पंडित दीनानाथ मंगेशकर जाने-माने शास्त्रीय गायक, रंगमंच कलाकार और संगीत के जानकार थे. लेकिन अप्रैल, साल 1942 में जब दीनानाथ मंगेशकर का निधन हुआ, तब लता महज 13 साल की थीं. पिता की मृत्यु ने उनके बचपन को जैसे एक ही झटके में खत्म कर दिया. परिवार की आर्थिक जिम्मेदारी अचानक उनके कंधों पर आ गई. वो पांच भाई-बहनों में सबसे बड़ी थीं और छोटी उम्र में ही परिवार के लिए कमाने की जिम्मेदारी उठानी पड़ी.
पिता के निधन के बाद लता ने फिल्मों में एक्टिंग और सिंगिंग कर परिवार की मदद करनी शुरू की. उनका शुरुआती दौर बिल्कुल आसान नहीं था. उन्होंने मराठी फिल्म 'किती हसाल' के लिए 1942 में अपना पहला गाना रिकॉर्ड किया. इसके बाद उन्होंने हिंदी फिल्मों में भी कदम रखा और आप की सेवा में के लिए ‘पा लागू कर जोरी रे’ जैसे गीत गाए. शुरुआत में उनकी आवाज को लेकर भी कई तरह की टिप्पणियां हुईं. उस दौर की भारी और अनोखी अलग गायकी के बीच लता की पतली, ऊंची और बेहद साफ आवाज को लेकर कुछ लोगों को उम्मीद नहीं थी कि वो सुरों पर पकड़ बना पाएंगी.
‘आएगा आनेवाला’ से बदल गई तस्वीर
साल 1949 में फिल्म 'महल' का गीत ‘आएगा आनेवाला’ लता मंगेशकर के करियर में अहम मोड़ साबित हुआ. खेमचंद प्रकाश के संगीत में रिकॉर्ड हुए इस गीत ने उनकी आवाज को बड़े लेवल पर लोगों तक पहुंचाया और वो हिंदी फिल्म संगीत की अहम आवाज बनती चली गईं. इसके बाद शंकर-जयकिशन, सचिन देव बर्मन, मदन मोहन, नौशाद, सलिल चौधरी, आर.डी. बर्मन, लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल जैसे अनेक संगीतकारों के साथ उन्होंने यादगार गीत दिए. ‘प्यार किया तो डरना क्या’, ‘अजीब दास्तान है ये’, ‘लग जा गले’, ‘अल्लाह तेरो नाम’, ‘ओ पालनहारे’ और ‘ऐ मेरे वतन के लोगों’ जैसे गीतों ने उनकी आवाज को कई जनरेशन की भावनाओं से जोड़ दिया.
5 गीत, जिन पर मिले बड़े सम्मान
लता मंगेशकर के खाते में कई बड़े अवॉर्ड रहे. फिल्मफेयर की बेस्ट फीमेल महिला प्लेबैक सिंगर कैटेगरी में उन्हें ‘आ जा रे परदेसी’ (फिल्म मधुमती, 1959), ‘कहीं दीप जले कहीं दिल’ (फिल्म बीस साल बाद, 1963), ‘तुम्हीं मेरे मंदिर तुम्हीं मेरी पूजा’ (फिल्म खानदान, 1966) और ‘आप मुझे अच्छे लगने लगे’ (फिल्म जीने की राह, 1970) के लिए सम्मान मिला. इनमें ‘कहीं दीप जले कहीं दिल’ को साल 1963 में फिल्मफेयर का बेस्ट फीमेल प्लेबैक सिंगर के अवॉर्ड से सम्मानित किया गया.
नेशनल फिल्म अवॉर्ड्स की बात करें, तो ‘बीती ना बिताई रैना’ के लिए उन्हें बेस्ट फीमेल प्लेबैक सिंगर का नेशनल अवॉर्ड मिला. बाद में ‘रूठे रूठे पिया’ (कोरा कागज) के लिए भी उन्होंने ये सम्मान हासिल किया. इस तरह इन गीतों ने न सिर्फ पॉपुलैरिटी हासिल की, बल्कि लता की गायकी को बड़े और अहम पुरस्कारों से भी जोड़ा.
लता-रफी: जब दो महान आवाजों के बीच आई दरार
लता मंगेशकर और मोहम्मद रफ़ी की जोड़ी हिंदी फिल्म संगीत की सबसे पॉपुलर सिंगिंग जोड़ियों में रही. दोनों ने साथ में कई यादगार डुएट गाए, लेकिन साल 1960 के दशक में उनके बीच मतभेद भी सामने आए. ये विवाद साल 1961 की फिल्म 'माया' के गीत ‘तस्वीर तेरी दिल में’ की रिकॉर्डिंग से जुड़ा है. खबरों के मुताबिक, इस गीत के एक हिस्से को गाने के तरीके को लेकर दोनों के बीच बहस हुई. इस घटना के बाद उनके संबंधों में तनाव बढ़ा और आगे चलकर दोनों के बीच रॉयल्टी का मुद्दा भी गंभीर विवाद का कारण बना, जो आगे धीरे-धीरे बढ़ता चला गया.
रॉयल्टी को लेकर अलग-अलग थे दोनों के विचार
साल 1962-63 के आसपास लता मंगेशकर ने प्लेबैक सिंगर्स को गानों से मिलने वाली रॉयल्टी में हिस्सा दिए जाने का मुद्दा उठाया. रिपोर्ट्स के अनुसार, लता चाहती थीं कि रफी भी इस मांग का सपोर्ट करें. लेकिन रॉयल्टी की व्यवस्था को लेकर उनकी सोच अलग थी. लता का तर्क था कि गाने की रिकॉर्डिंग और उसकी बिक्री में गायक की भी अहम भूमिका होती है, इसलिए उसे रॉयल्टी में हिस्सा मिलना चाहिए. दूसरी ओर रफी का मत था कि निर्माता द्वारा गाने के लिए तय पैसे दिए जाने के बाद गायक का भुगतान संबंधी दावा खत्म हो जाता है. यही मतभेद धीरे-धीरे दोनों के बीच पर्सनल दूरी में बदल गया.
करीब 3 साल तक नहीं किया गाना रिकॉर्ड
रॉयल्टी के मुद्दे और उससे जुड़े मतभेदों के बाद लता मंगेशकर और मोहम्मद रफी ने करीब दो से तीन साल तक साथ में डुएट रिकॉर्ड नहीं किए. इन सालों में लता ने महेंद्र कपूर जैसे गायकों के साथ काम किया, जबकि रफी ने सुमन कल्याणपुर सहित दूसरे गायिकाओं के साथ गीत रिकॉर्ड किए. बाद में संगीतकार जयकिशन के बीच में आने से दोनों के बीच सुलह हुई और उन्होंने दोबारा साथ गाना शुरू किया. हालांकि इस पूरे विवाद से जुड़ी कुछ बातों पर अलग-अलग खबरें आईं और बाद के बयानों में मतभेद भी मिलते हैं.
आवाज गई, लेकिन गीत रह गए
लता मंगेशकर का जीवन सिर्फ एक आम गायिका की कहानी नहीं थी, बल्कि उस कलाकार की कहानी था जिसने बेहद कम उम्र में परिवार की जिम्मेदारी संभाली और फिर इंडियन सिनेमा के संगीत को अपनी आवाज से नई पहचान दी. उन्हें पद्म भूषण, दादासाहेब फाल्के पुरस्कार, पद्म विभूषण और साल 2001 में भारत रत्न सहित अनेक बड़े सम्मान मिले. उनके निधन के सालों बीत जाने के बाद भी ‘लग जा गले’ में प्रेम, ‘अजीब दास्तान है ये’ में उदासी, ‘अल्लाह तेरो नाम’ और ‘ऐ मेरे वतन के लोगों’ में देशभक्ति सुनाई देती है. यही उनकी आवाज की सबसे बड़ी ताकत थी कि वो सिर्फ गाने नहीं गाती थीं, भावनाओं को आवाज देती थीं. लता दीदी हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनके सुर लोगों के बीच हमेशा सुनाई देते रहेंगे.