)
जब भी राजनीति, रक्षा, तेल, कारोबार और कूटनीति की बातें होती हैं, भारत-रूस की दोस्ती का जिक्र होना आम है. लेकिन दोनों देशों के रिश्तों की बस इतनी सी नहीं है कि किसी समझौते की मेज पर लिखा जाए और न ही जो किसी सरकारी दस्तावेज में हो. बल्कि भारत-रूस की कहानी फिल्मों के पर्दे पर लिखी गई थी. आज जब भारत और रूस के रिश्ते एक बार फिर सुर्खियों में हैं. दरअसल, इस बार का ब्रिक्स शिखर सम्मेलन नई दिल्ली में हो रहा है. इसी को लेकर रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन भारत दौरे पर हैं. ऐसे में लगातार भारत और रूस की दोस्ती की चर्चा हो रही है. इसी बीच लगभग सात दशक पुरानी एक फिल्म अचानक सबको याद आने लगी है. इस फिल्म का नाम है 'परदेसी'. साल 1957 में आई इस फिल्म में एक्ट्रेस नरगिस दत्त लीड रोल में बज्र आईं थी. वहीं, फिल्म के पीछे भारत और तत्कालीन सोवियत संघ की साझा कोशिश थी. यह फिल्म महज किसी विदेशी लोकेशन पर शूट की गई भारतीय फिल्म नहीं थी, बल्कि दोनों देशों के फिल्मकारों और तकनीकी टीमों ने मिलकर इसे बनाया था.
इसकी सबसे दिलचस्प बात यह है कि फिल्म 'परदेसी' की कहानी ही एक रूसी यात्री के भारत दौरे आने से शुरू होती है. इसका मतलब है कि फिल्म में भी रूस से भारत की यात्रा थी और फिल्म के बाहर भी भारत और सोवियत संघ पहली बार इतने बड़े स्तर पर मिलकर सिनेमा बना रहे थे. ऐसे में इस फिल्म को सिर्फ नरगिस की फिल्म कह देना, इसके अन्य कलाकार और इसकी कहानी को छोटा कर देना जैसा होगा.
नरगिस की 'परदेसी' में छिपी भारत-रूस की पुरानी कहानी

साल 1957 की रिलीज हुई फिल्म 'परदेसी' में 15वीं सदी के रूसी यात्री अफानासी निकितिन के दौरे के बारे में था. इसमें निकितिन रूस से भारत पहुंचे थे और उन्होंने यहां के समाज, संस्कृति और जीवन को देखा. फिल्म ने इसी यात्रा को कहानी का आधार बनाया. इस फिल्म में, नरगिस ने चंपा का किरदार निभाया था, जबकि रूसी एक्टर ओलेग स्ट्रिजेनोव अफानासी निकितिन की भूमिका में नजर आए. फिल्म का निर्देशन भारत की ओर से ख्वाजा अहमद अब्बास और सोवियत संघ की ओर से वासिली प्रोनिन ने किया था. इसके मेकिंग में अब्बास की नाया संसार इंटरनेशनल और सोवियत संघ के सरकारी स्टूडियो मॉसफिल्म की साझेदारी थी. यह फिल्म निकितिन की भारत यात्रा पर लिखी गई डायरी पर बनी थी. यह हिंदी और रूसी भाषा, दोनों में बनी. रूसी भाषा में फिल्म का नाम था 'होज़दिएनी ज़ा त्री मोरे' यानी Journey Beyond Three Seas.
इस फिल्म को हिंदी और रूसी दोनों भाषाओं में तैयार किया गया था. साथ ही इसमें दोनों ही देशो के तकनीकी लोगों ने भारतीय और रूसी कलाकारों के साथ काम किया. उस दौर में बनी ये फिल्म बाकियों से अलग थी. उस समय ऐसा अंतरराष्ट्रीय सह-निर्माण होना, कोई सामान्य बात नहीं थी. आज भी ये सामान्य नहीं है. तब न आज जैसी आसान हवाई यात्रा थी, न डिजिटल कैमरे थे, न इंटरनेट और न ही एक देश की पूरी टीम दूसरे देश में कुछ घंटों में पहुंच सकती थी. फिर भी अलग भाषा और अलग काम करने के तरीके के बावजूद दो देशों की टीमों ने एक साथ ये अजूबा कर दिखाया और यह काम सिर्फ कलाकारों के लेवल पर नहीं हुआ था. बल्कि कैमरे के पीछे भी भारत और सोवियत संघ साथ खड़े थे.
ऐसे में ये कहना गलत नहीं होगा कि 'परदेसी' की सबसे बड़ी खासियत एक कैमरे के पीछे की दो देशों की साझेदारी थी. फिल्म में एक तरफ भारतीय सिनेमाई अनुभव था, तो दूसरी तरफ सोवियत फिल्म तकनीक और वहां के फिल्मकारों की विशेषज्ञता. वहीं, इसके डिटेलिंग की बात करें तो, फिल्म की सिनेमैटोग्राफी में भारतीय रामचंद्र के साथ सोवियत छायाकार व्लादिमीर निकोलायेव और येवगेनी एंड्रिकानिस जुड़े थे.
इसका मतलब ये कि कैमरा भी एक तरह से दोनों देशों की साझेदारी का हिस्सा ही था. इसके अलावा फिल्म के निर्माण के प्रोसेस में भी दोनों देशों की तरफ से अलग-अलग क्षेत्रों में लोगों की भागीदारी थी. रिसर्च के मुताबिक, इस सह-निर्माण में दो निर्देशक, दो स्क्रिप्टराइटर, दो संगीतकार और दो एडिटर के लेवल पर काम कर रहे थे. फिल्म की शूटिंग भारत और सोवियत संघ दोनों जगहों पर हुई थी.
आज के समय में किसी फिल्म के सेट पर दो देशों की टीम का साथ करना साथ काम करने को अंतरराष्ट्रीय प्रोडक्शन कहा जाता है. लेकिन 1950 के दशक में यह काम कहीं ज्यादा मुश्किल था. तब भाषा की समस्या अलग के साथ-साथ तकनीक और उपकरणों की व्यवस्था भी अलग थी. शूटिंग के लिए भी हजारों किलोमीटर का सफर अलग था. तब जाके पर्दे पर 'परदेसी' आ सकी.
इस फिल्म को भारत-सोवियत सिनेमा के शुरुआती बड़े सह-निर्माणों में गिना जाता है. इसे भारत और सोवियत संघ की पहली साझा फिल्म प्रोडक्शन के तौर पर भी दर्ज किया गया है. इस कहानी में एक और दिलचस्प बात थी. फिल्म की कहानी भारत और रूस के बीच किसी आधुनिक राजनीतिक रिश्ते की नहीं थी. कहानी कई सदियां पीछे जाती थी. यानी दोनों देशों के बीच सांस्कृतिक संपर्क को एक बहुत पुराने ऐतिहासिक सफर के जरिए दिखाया गया.
नरगिस क्यों बनीं इस कहानी का अहम चेहरा?

1950 के दौर में नरगिस की फिल्में 'आवारा' और 'श्री 420' सिर्फ भारत में ही नहीं, बालक सोवियत दर्शकों के बीच भी पहचान बना चुकी थीं. वहीं, राज कपूर और नरगिस की जोड़ी सोवियत संघ में सबसे पॉपुलर जोड़ियों में शुमार थी. जब 'आवारा' वहां इतनी बड़ी हिट बनी तो भारतीय सिनेमा के लिए सोवियत संघ एक बेहद अहम बाजार बन गया. रिपोर्ट्स की मानें तो, 'आवारा' को सोवियत संघ में करोड़ों दर्शकों ने देखा था और फिल्म ने भारतीय कलाकारों को वहां पॉपुलैरिटी दिलाई. ऐसे में नरगिस के लिए यह सिर्फ एक और फिल्म नहीं थी. वह भारतीय सिनेमा की उस पीढ़ी का चेहरा थीं, जिसे सोवियत दर्शक पहले से पहचानते थे. इसलिए एक ऐसी फिल्म में उनका होना काफी मायने रखता था.
'परदेसी' को समझने के लिए यह जानना जरूरी है कि भारत और सोवियत संघ का फिल्मी रिश्ता अचानक 1957 में शुरू नहीं हुआ था. भारतीय फिल्में सोवियत दर्शकों तक पहले ही पहुंच चुकी थीं. ख्वाजा अहमद अब्बास की 'धरती के लाल' सोवियत संघ में रिलीज होने वाली शुरुआती भारतीय फिल्मों में शामिल थी. इसके बाद भारतीय फिल्मों की लोकप्रियता लगातार बढ़ती गई.
फिर आया राज कपूर का दौर

राज कपूर पहले बॉलीवुड के अभिनेता थे, जिन्हें रूस में बिना वीजा के एंट्री मिली थी और वहां उनके सम्मान में स्टैच्यू भी बना. आज भी रूस में राज कपूर साहब की विरासत और उनकी फिल्मों को जिंदा रखने के लिए सांस्कृतिक कार्यक्रम होते रहते हैं. साल 1951 में राज कपूर की फिल्म 'आवारा' रिलीज हुई थी. इस फिल्म में उनका गाना 'सर पे लाल टोपी रूसी फिर भी दिल है हिंदुस्तानी' को रूस में सबसे ज्यादा पसंद किया गया था. रूस में इस फिल्म का प्रीमियर 1954 में रखा गया था. इसे देखने के लिए भीड़ उमड़ पड़ी थी और करीब 6 करोड़ 40 लाख टिकट बाइक थे. फिल्म का क्रेज इतना ज्यादा बढ़ गया है कि 'सर पे लाल टोपी रूसी' वहां का लोकल एंथम बन गया. हर किसी की जुबान पर वही गाना था. बाअद में फिल्म को रूसी अनुवाद के साथ ही रिलीज किया गया.
फिल्म 'आवारा' को इतनी सफलता मिली कि राज कपूर को रूस जाना पड़ा. राज कपूर के पास वीजा नहीं था, लेकिन उनकी लोकप्रियता को देखते हुए उन्हें बिना वीजा के देश में आने की इजाजत मिली. राज कपूर रूस पहुंच गए, लेकिन एयरपोर्ट पर हजारों की भीड़ ने उन्हें घेर लिया है और गाड़ी आगे की दिशा में बढ़ने की बजाय ऊपर की तरफ उठने लगी. ऐसा इसलिए क्योंकि वहां मौजूद उनके चाहने वालों ने गाड़ी को अपने कंधों के सहारे हवा में उठा दिया था. फिल्म 'आवारा' पहली फिल्म थी, जिसे कल्चर इम्पोर्ट के तौर पर पहली बार रूस में रिलीज करने का फैसला किया गया था, जिसके बाद देव आनंद और दिलीप कुमार की फिल्में भी रूस में रिलीज होने लगीं.
राज कपूर की 'मेरा नाम जोकर' (1970) और 'श्री 420' भी रिलीज हुईं. 'मेरा नाम जोकर' में अभिनेता ने रूसी अभिनेत्री सेनिया लावोव्ना रियाबिनकिना के साथ काम किया, जिन्होंने उनकी प्रेमिका मरीना का रोल प्ले किया था. हिंदी फिल्मों को रूस में पसंद किए जाने का एक और महत्वपूर्ण कारण था. रूस में 1947 के समय प्रोपेगैंडा फिल्मों का चलन बहुत ज्यादा हुआ करता था, जो फीकी और नीरस होती थीं. जानबूझकर लोगों के दिमाग में राष्ट्रवाद और देशप्रेम की एकतरफा कहानियों को भरा जाता था और उसके उलट राज कपूर की फिल्मों में सुंदर वादियां और नरगिस के साथ रोमांस ने दर्शकों का दिल जीत लिया था.
फिल्म के म्यूजिक में भी दो देशों की झलक

'परदेसी' के म्यूजिक में भारतीय और सोवियत असर का एक अलग मेल देखने को मिला. भारतीय हिस्से की कमान संगीतकार अनिल बिस्वास के पास थी, जबकि सोवियत पक्ष से बोरिस चाइकोव्स्की जुड़े थे. यह भी उस फिल्म की खासियत थी. फिल्म में एक ओर हिंदी सिनेमा का गीत-संगीत था, जिसमें लता मंगेशकर और मीना कपूर जैसे नाम जुड़े. वहीं, दूसरी ओर सोवियत संगीत परंपरा से आए कलाकार थे. फिल्म में 'ना दिर धिन ताना देरे ना' और 'रसिया रे मन बसिया रे' जैसे गीतों का जिक्र आज भी मिलता है.
लेकिन फिर भी इस फिल्म की एक दिलचस्प विडंबना भी है. जिस फिल्म को आज भी भारत-सोवियत सांस्कृतिक रिश्ते की अहम मिसाल माना जाता है. वह भारत में उस समय बहुत बड़ी सफल नहीं बन पाई. ये फिल्म तब रिलीज हुई जब नरगिस की 'मदर इंडिया' ने जबरदस्त सफलता हासिल की थी. ऐसे में 'परदेसी' उस बड़ी फिल्म की छाया में दब गई.
लेकिन बॉक्स ऑफिस का आंकड़ा हमेशा किसी फिल्म की ऐतिहासिक अहमियत तय नहीं करता. 'परदेसी' के साथ भारत-रूस की फिल्मी साझेदारी ने एक रास्ता जरूर खोल दिया था. इसके बाद भारत-सोवियत साझेदारी की कई और फिल्में भी आईं. 'परदेसी' के बाद भारत और सोवियत संघ के बीच फिल्मों का रिश्ता खत्म नहीं हुआ. बल्कि आगे चलकर यह और दिलचस्प होता गया. इसका सबसे बड़ा उदहारण है, 'अलीबाबा और 40 चोर' और 'सोहनी महिवाल'. इसके बाद आई 'अजूबा'.
यह फॉर्मूला दर्शकों को पसंद आया

फिल्म अमिताभ बच्चन स्टारर फिल्म 'अजूबा' में भारत और सोवियत संघ का रिश्ता एक नए दौर में पहुंच गया. अगर 'परदेसी' को भारत-सोवियत फिल्मी दोस्ती की शुरुआत का प्रतीक माना जाए, तो फिल्म 'अजूबा' को इस रिश्ते के एक बिल्कुल अलग दौर की कहानी है. साला 1991 में रिलीज हुई 'अजूबा' का निर्देशन शशि कपूर और सोवियत फिल्मकार गेनाडी वासिलियेव ने मिलकर किया था. इस फिल्म के निर्माण में भारत की एशिया फिल्म्स और सोवियत संघ के गोर्की फिल्म स्टूडियो की साझेदारी थी. यानी लगभग 34 साल बाद भी कैमरे के पीछे वही कहानी दोहराई जा रही थी. एक तरफ भारतीय फिल्म इंडस्ट्री और दूसरी ओर सोवियत फिल्म स्टूडियो. लेकिन इस समय तक दुनिया काफी बदल चुकी थी.
साल 1957 में नरगिस थीं और एक ऐतिहासिक यात्रा की कहानी थी. जबकि 'अजूबा' में अमिताभ बच्चन जैसे सुपरस्टार थे और कहानी एक बड़े फैंटेसी एडवेंचर की थी. फिल्म की कहानी एक काल्पनिक साम्राज्य की थी. ये उसके राजकुमार के इर्द-गिर्द घूमती थी. इसमें अमिताभ बच्चन के साथ ऋषि कपूर, डिंपल कपाड़िया, शम्मी कपूर, अमरीश पुरी और कई बड़े कलाकार थे. लेकिन असली दिलचस्पी फिल्म के पर्दे से बाहर की कहानी में है.
'अजूबा' से एक नए दौर में पहुंचा भारत और सोवियत संघ का रिश्ता
'अजूबा' की शूटिंग रूस में हुई थी और फिल्म को सोवियत संघ में भारत से पहले रिलीज किया गया था. वहां इसका रूसी संस्करण 'ब्लैक प्रिंस अजूबा' के नाम से आया.यानी जिस देश में कभी राज कपूर और नरगिस के गाने दर्शकों के बीच लोकप्रिय हुए थे. उसी देश में अब अमिताभ बच्चन का 'अजूबा' एक रूसी भाषा के संस्करण में पहुंच रहा था. पहले इस फिल्म को रूस में रिलीज किया गया. फिल्म का रूसी वर्जन सोवियत संघ में 1990 में ही रिलीज हो गया था, जबकि भारत में फिल्म 1991 में रिलीज हुई. बता दें कि उस समय सोवियत संघ अपने आखिरी दौर में था. अगले ही साल यानी 1991 के अंत में सोवियत संघ का अस्तित्व खत्म हो गया.
इस लिहाज से 'अजूबा' भारत और सोवियत सिनेमा की साझेदारी के अंतिम बड़े अध्यायों में से एक बन गई. हालांकि, ये फिल्म भारत में सफल नहीं हो पाई. लेकिन सोवियत संघ में इसे ज्यादा अच्छी प्रतिक्रिया मिली. ऐसे में कहा जा सकता है कि फिर वही कहानी दोहराई गई कि भारत में जिस फिल्म को दर्शकों ने ज्यादा पसंद नहीं किया, उसे सोवियत दर्शकों ने अलग नजर से देखा.
इस फिल्म को लेकर शशि कपूर के परिवार से जुड़ा एक मजेदार किस्सा भी है. एक इंटरव्यू में कुणाल कपूर ने बताया कि टीम के लिए भारत से करीब 650 किलो दाल तक ले जाई गई थी. आज के दौर में यह बात सुनकर हंसी आ सकती हैं, लेकिन उस समय विदेश में लंबी शूटिंग करना कितना बड़ा ऑपरेशन रहा होगा, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है.
राज कपूर से अमिताभ तक, बदलते रहे चेहरे लेकिन रिश्ता बना रहा
भारत और सोवियत संघ के फिल्मी रिश्ते को अगर कलाकारों के जरिए समझें तो यह सफर भी काफी दिलचस्प है.एक दौर में राज कपूर और नरगिस इस रिश्ते का चेहरा बने. फिर मिथुन चक्रवर्ती जैसे सितारों की फिल्में सोवियत दर्शकों तक पहुंचीं. ‘डिस्को डांसर’ जैसी फिल्मों ने भी वहां भारतीय सिनेमा की लोकप्रियता को नई ऊंचाई दी. शोध के अनुसार भारतीय फिल्मों की सोवियत संघ में लोकप्रियता इतनी ज्यादा थी कि कई फिल्मों को वहां करोड़ों दर्शक मिले. लेकिन ‘परदेसी’ और ‘अजूबा’ के बीच सबसे खास चीज सिर्फ कलाकारों की लोकप्रियता नहीं थी.
दोनों देशों के फिल्मकारों को कहानी पर काम करना था. कलाकारों को अलग भाषाओं वाले लोगों के साथ शूट करना था. तकनीकी टीमों को एक-दूसरे के तरीके समझने थे. शूटिंग अलग देशों में करनी थी. और इन सबके बीच फिल्म को दर्शकों तक भी पहुंचाना था. यही वजह है कि भारत-सोवियत फिल्मी रिश्ते को सिर्फ फिल्मों की सूची से समझना मुश्किल है. यह एक तरह का सांस्कृतिक पुल था.
जब सिनेमा 'सॉफ्ट पॉवर' बन गया
आज भले ही 'सॉफ्ट पॉवर' शब्द में किसी विदेश नीति की चर्चा में सुनाई देती हो. लेकिन किसी देश की संस्कृति, सिनेमा, म्यूजिक, खाना या भाषा दूसरे देशों में उसकी छवि को प्रभावित करे तो इसे सॉफ्ट पॉवर कहा जाता है. भारत के मामले में फिल्मों ने यह काम बहुत पहले शुरू कर दिया था. जहां सोवियत संघ में भारतीय फिल्मों की लोकप्रियता ने भारत की एक खास छवि बनाई. वहीं, दर्शकों के लिए भी भारत सिर्फ नक्शे पर मौजूद रहने वाला देश नहीं था. वहां के लोग भारतीय कलाकारों को पहचानने लगे थे.
इसीलिए जब 'परदेसी' जैसी फिल्म में भारत और रूस की कहानी एक साथ आई तो दर्शकों के लिए यह कोई पूरी तरह अनजान दुनिया नहीं थी. यानी आम लोगों के बीच भारत और सोवियत का रिश्ता सरकारों के बीच समझौते से नहीं बना था. यह पर्दे से बना था. शायद यही सिनेमा की सबसे बड़ी ताकत है. जहां, एक फिल्म ऐसी जगह पॉपुलर हो सकती है जहां उसकी भाषा समझ में न आती हो.
आज पुतिन भारत में हैं, तो 1957 की नरगिस क्यों याद आ रही हैं?

सितंबर 2026 में भारत और रूस फिर से चर्चा में हैं. पुतिन भारत पहुंचे हैं और ब्रिक्स शिखर सम्मेलन नई दिल्ली में हो रहा है. दोनों देशों के बीच व्यापार, ऊर्जा, रक्षा, निवेश और तकनीक जैसे मुद्दों पर बातचीत हो रही है. भारत-रूस व्यापार को 2030 तक 100 अरब डॉलर तक ले जाने का लक्ष्य भी सामने रखा गया है. ऐसे में अगर कोई सिर्फ तेल, हथियार या व्यापार की कहानी लिखे तो वह भारत-रूस रिश्ते का एक हिस्सा बताएगा. लेकिन 'परदेसी' और 'अजूबा' जैसी फिल्में हमें दूसरा हिस्सा याद दिलाती हैं. वो हिस्सा, जहां दोनों देशों ने साथ फिल्म बनाई. जहां भारतीय कलाकार रूस गए तो रूसी कलाकार भारत आए.
आज भारत और रूस के रिश्तों की चर्चा जब फिर तेज है, तो इन फिल्मों को याद करना इसलिए जरूरी है क्योंकि यह बताता है कि दोनों देशों की दोस्ती की जड़ें सिर्फ सरकारी समझौतों में नहीं हैं. कभी दोनों देशों की दोस्ती एक गाने में सुनाई दी. तो कभी राज कपूर और नरगिस के किरदारों में दिखाई दी. फिर कभी कोई अफानासी निकितिन भारत पहुंचा तो कई साल बाद अमिताभ बच्चन 'अजूबा' बनकर रूस के सिनेमाघरों तक गए.
ऐसे में यह कहना गलत नहीं होगा कि भारत और रूस की कहानी में कूटनीति के साथ सिनेमा का भी एक पूरा चैप्टर है. और इस चैप्टर का पहला बड़ा पन्ना अगर नरगिस की 'परदेसी' थी. जबकि 'अजूबा' शायद उस दौर का आखिरी बड़ा पन्ना बना. ऐसे में यह समझ आता है कि देशों के रिश्ते सिर्फ कभी-कभी नेताओं की मुलाकातों से नहीं बनते. बल्कि, कुछ रिश्ते पर्दे पर बनते हैं. कुछ रिश्ते गीतों के जरिए आम लोगों तक पहुंचते हैं तो कुछ रिश्ते इतने पुराने होते हैं कि उन्हें याद करने के लिए किसी नए समझौते की जरूरत नहीं पड़ती. बस एक पुरानी फिल्म का नाम काफी होता है.
इन फिल्मों में फिल्माई गई रूस की अलग-अलग लोकेशन
1970 में रिलीज हुई राज कपूर की फिल्म 'मेरा नाम जोकर' रूस में बहुत पसंद की गई थी. राज कपूर रशिया के सिनेमा प्रेमी दर्शकों के लिए भगवान की तरह थे, लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि इस फिल्म में रशियन अभिनेत्री सेनिया लावोव्ना रियाबिनकिना के साथ अभिनेता ने फिल्म के कुछ सीन को मास्को में फिल्माया था.
सलमान खान और स्नेहा उल्लाल की साल 2005 में आई फिल्म ‘लकी: नो टाइम फॉर लव’ के कुछ सीन और रोमांटिक गाने सेंट पीटर्सबर्ग पर शूट किए गए थे.
तमिल एक्शन फिल्म 'धाम धूम' की शूटिंग भी रशिया में हुई थी. इस फिल्म में कंगना रनौत का भी छोटा सा रोल था. फिल्म की शुरुआत ही रशिया के खूबसूरत शहर मास्को से होती है. फिल्म का बहुत सारा हिस्सा रूस के अलग-अलग हिस्सों में फिल्माया गया है.
साल 2022 में रिलीज हुई आर माधवन की रॉकेट्री: द नंबी इफेक्ट' के कुछ सीन को रूस में शूट किया गया था. टीम ने साल 2019 में रूस में शूटिंग की थी और वहां पांच दिन तक खराब मौसम के बाद काम किया था. इसके अलावा, सलमान खान की 'एक था टाइगर' को भी रूस में शूट किया गया था.
साल 2023 में आई शाहरुख खान और दीपिका पादुकोण अभिनीत 'पठान' के कुछ सीन और गानों को रूस की बैकाल झील के पास शूट किया था. फिल्म पर्दे पर सुपरहिट साबित हुई थी. कुछ फिल्में ऐसी भी थीं, जिन्हें भारत और सोवियत संघ ने एक साथ मिलकर बनाया था. साल 1981 में 'एडवेंचर्स ऑफ अली-बाबा एंड द फोर्टी थीव्स' को दोनों देशों के निर्माताओं ने मिलकर बनाया था.
(Ians Input)